# Jinvani: जिनवाणी संग्रह > Our Digital Jinvani ## Posts - [श्री मुनिसुव्रतनाथ पूजा 2022 || New Shri Muni Subratnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-muni-subratnath-pooja/): भारत छन्द -लय-वीर हिमाचल तैं प्राणत स्वर्ग तजो जिनराज, सु राजगृही प्रभु जन्म लियो है। श्री सुखमित्र सुमित्र पिता, पद्मा जननी घर धन्य कियो है॥ हे मुनिसुव्रतनाथ जिनेश्वर !, है हृदयांगन देश हमारो। वेग हरो मम पीर जरा मृति, देर करो नहिं शीघ्र पधारो॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरमुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । जिनगीतिका छन्द सब जल पान से तृष्णा मिटी ना, नीर प्रभु पद में धरूँ। जन्मादि रोगों की व्यथा को, आप चरणों में हरूँ॥ तीर्थेश मुनिसुव्रत हमारे, दोष हर लीजिए। तुम सम […] - [श्री नमिनाथ जिनपूजा 2022 || New Shri Naninath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-naninath-jin-pooja/): पुष्पमंजरी छन्द वीतराग देव आपका सुदर्श पा गया नमीश जैन जिनेश उर धर्म सौख्यदायि मुझको भा गया॥ जिनेश उर पधारिये मृदुल हृदय समाइये मोक्षमार्ग पे चलूँ सुमार्ग को बताइये॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । मोह जीत आपने जनम मरण मिटा दिया। नमीश पूज भक्त ने मिथ्यात्व को हटा लिया॥ शुद्ध नीर अर्पते जरा मरण विनाश हो। नमीश आपके पदों में आत्म का विकास हो॥ ओं ह्रीं श्री नमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान आवरण विनाश ज्ञान पूर्ण पा लिया। नमीश आपने […] - [श्री शंभवनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Sambhavnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-sambhavnath-jin-pooja/): सखी छन्द शंभव जिन शिव सुख पाये, संभव सम्यक् भव भाये। ग्रैवेयक से तुम आये, तीर्थंकर पितु हरषाये॥ मैं करूँ प्रभो आह्वानन, स्वीकारो मम उर आसन। नहिं तुम बिन कोई सहारा, कर दो उद्धार हमारा॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरशंभवनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। श्रद्धा का कूप निराला, सद्ज्ञान नीर सुखकारा । चारित्र सुघट में लाऊँ, संभव जिन पूज रचाऊँ ॥ ओंह्रीँश्रीशंभवनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। भव भव का ताप मिटाया, समता चन्दन अपनाया । हे जिन! तेरे गुण गाऊँ, चउगति के दुख नहिं पाऊँ ॥ […] - [श्री अभिनन्दन जिन पूजा 2022 || New Shri Abhinandan Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-abhinandan-jin-pooja/): क्षमासखी छन्द अभिनन्दन जिनवर देवा, सुर नर मुनि करते सेवा । संवर नृप पिता सुहाये, गृह अवधपुरी में आये ॥ सिद्धार्था माँ कुलवन्ती, तुम जैसे सुत को जनती । प्रभु सोलह स्वप्न दिखाये, सत्रह में प्रवेश पाये ॥ हम पूजा करें तुम्हारी, गुण बगिया महके न्यारी । मम हृदयासन पे आओ, सद्बोध हृदय उपजाओ ॥ ॐ ह्रीं तीर्थंकर अभिनंदननाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । ज्ञानोदय छन्द क्षीरोदधि सम प्रासुक जल ले, अभिनन्दन जिन पूज रहे । जन्म मरण मेटो प्रभु मेरा, जग में […] - [श्री सुमतिनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Sumatinath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-sumatinath-jin-pooja/): ज्ञानोदय छन्द सुमतिनाथ जिन सुमति प्रदाता, बोधि समाधि प्रदान करो। मेरे उर के सिंहासन पर, हे जिनवर पग आन धरो ॥ मातु मंगला नगर विनीता, संजयन्त स्वर तज आये। पिता मेघ प्रभु के प्रांगण में, सुरपति बाजे बजवाये ॥ पंचम तीर्थंकर प्रभु मेरी, विनती को अब स्वीकारो । बिन विलम्ब के हृदय पधारो, मेरा भव दुख निरवारो ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरसुमतिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अष्टपदी छन्द क्षीरोदधि सम शुचि नीर, उर घट में लाये। प्रभु हरो जन्म की पीर, पूजन को आये […] - [श्री पद्मप्रभ जिन पूजा 2022 || New Shri Padmaprabh Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-padmaprabh-jin-pooja/): ज्ञानोदय छन्द धरणी नृप गृह जन्म लिया है, मात सुसीमा हरषाती। ऊर्ध्व उच्च ग्रैवेयक से प्रभु, आते अवनी गुण गाती॥ कौशाम्बी नगरी सुख पाती, इन्द्र महोत्सव करते हैं। ऐसे वीतराग पद्मप्रभ, प्रभु को उर में धरते हैं॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरपद्मप्रभजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । जन्म जरा मृति पर जय पाके, वीतराग सर्वज्ञ बने। ऐसे पद्म जिनेश पदों में, नीर धार दे रोग हनें॥ ओं ह्रीं श्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । पंच रूप संसार जीतकर, प्रभु संसारातीत हुये। ऐसे पद्म जिनेश पदों […] - [श्री सुपार्श्वनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Suparshwanath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-suparshwanath-jin-pooja/): ज्ञानोदय छन्द सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्व जिन, मध्यम ग्रीवक से आये । सुप्रतिष्ठ नृप पृथिवीसेना, नगर बनारस हरषाये ऐसे वीतराग जिनवर की पूजन करने हम आये । मेरे उर के सिंहासन पर, आप विराजो मन भाये ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । आत्म तत्त्व का चिन्तन करके, जन्म मरण को जीत लिया। तभी आपको नीर चढ़ाते, प्रभु सुपार्श्व जिन मीत जिया ॥ ओं ह्रीं श्री सुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। निज जीवास्तिकाय को जाना, पर द्रव्यों से भिन्न भला । तभी सुपार्श्व […] - [श्री चन्द्रप्रभ जिन पूजा 2022 || New Shri Chandra Prabha Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-chandra-prabha-jin-pooja/): ज्ञानोदय महासेन सुत! अष्टम जिनवर, वीतराग तीर्थंकर हो। माँ सुलक्षणा लाल चन्द्रप्रभ! करुणाकर क्षेमंकर हो॥ शत इन्द्रों से वंदित प्रभुवर, समवसरण में राजित हो। द्वादश गण नक्षत्र मध्य में, चन्द्र समान विराजित हो॥ चन्द्रप्रभा सम कान्तिमान् हो, जग में अतिशय सुन्दर हो। आधि व्याधि से रहित चन्द्रप्रभु, परम स्वास्थ्य के मन्दिर हो॥ चन्द्रोदय में पूर्ण चन्द्र सम, चन्द्रनाथ बनकर आये। आज हृदय में आओ भगवन्! भक्त कुमुद मृदु खिल जाये॥ ओं ह्रीं अतिशययुक्त अष्टमतीर्थंकर श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अशोक तरु जिन समीपता […] - [श्री पुष्पदन्त जिन पूजा 2022 || New Shri Pushpdant Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-pushpdant-jin-pooja/): लय- लावनी- नर होनहार होतव्य न तिल भर टरती…… जिन पुष्पदन्त भगवन्त, अन्त किया भव का। हे सुविधिनाथ अब अन्त करो, मम भव का॥ हम   पाप   नाशने, तेरे   दर   पर  आये। शाश्वत सुख  दीजे, द्रव्य  सजा  कर  लाये॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरपुष्पदंतजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । जल पान किया पर तृषा सदा दुख देती । जिनवर की पूजा सभी दुःख हर लेती ॥ इस हेतु सुविधि पूजन में जल ले आये। जन्मों की तृषा मिटाने, भाव जगाये ॥ ओं ह्रीं श्री पुष्पदंतजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति […] - [श्री शीतलनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri SheetalNath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-sheetalnath-jin-pooja/): विद्यार्चना छंद -लय- गुरु विद्यासागर के चरणों में.. विदिशा नगरी भद्दलपुर में, आरण दिवि से अवतार लिया। श्रीमात सुनन्दा पितु दृढ़रथ ने, जिन्हें हृदय से प्यार किया| ऐसे हे शीतलनाथ प्रभो!, तुम दश धर्मों से पार हुये । हम भी दुखसागर पार करें, इस हेतु करें अवतार हिये ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरशीतलनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ द ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । मैं क्रोध अनल में जला प्रभो!, नहिं पाया नीर क्षमा नामी । क्रोधाग्नि शमन को तव पद में, जल चढ़ा रहा शिवपथगामी ॥ हे शीतलनाथ दशम तीर्थंकर!, […] - [श्री श्रेयांसनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Shrayanshnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-shrayanshnath-jin-pooja/): वसंततिलका छंद – तभजज गण दो गुरु श्रेयांस नाथ जिन सिद्ध विशुद्ध स्वामी, आओ मदीय उर में जिनराज नामी। पूजूँ तुम्हें विनय से उर में बिठा के, जाके वसूँ विभव मोक्ष निजात्म ध्याके ॥ ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रेयांसजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । क्षीराब्धि सा सलिल प्रासुक शुद्ध लाये, भृंगार में भर लिये, पद में चढ़ाये । श्रेयांसनाथ जिन सिद्ध सदा समर्चं, निःश्रेय प्राप्ति करने जिन पाद चचूँ ॥ ओं ह्रीं श्री श्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । गोक्षीर सार वर चन्दन घर्ष लाये, श्रद्धा […] - [श्री वासुपूज्य जिनपूजा 2022 || New Shri Vasupujya Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-vasupujya-jin-pooja/): कुसुमलता छन्द महाशुक्र हरि विमान तजकर, जम्बूद्वीप भरत में आय। चम्पापुर वसुपूज्य भूप की रानी जया गर्भ सुखदाय॥ वासुपूज्य है नाम तुम्हारा, प्रथम बाल ब्रह्मचारी ईश। द्वादशवें तीर्थंकर जिनवर, मेरे हृदय बसो जगदीश॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरवासुपूज्यजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । जिनगीतिका छन्द पंचम उदधि सम नीर निर्मल, कनक झारी में भरूँ । जन्मादि जर मरणादि पूरित, अमित भव सागर तरूँ ॥ हे वासुपूज्य जिनेश भगवन्, खबर मेरी लीजिए । कब से भ्रमित हूँ भव विपिन में, राह मुझको दीजिए ॥ ओं ह्रीं […] - [श्री विमलनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Vimalnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-vimalnath-jin-pooja/): रेवती छन्द विमल जिन बारवां दिवि तज, कम्पिला नगर में आये। मातु जयश्यामा कृतधर्मा, पिता जिन बाल को पाये॥ जगत आनन्द में डूबा, खुशी के गीत सब गाये। बने सर्वज्ञ तीर्थंकर, पूजने हम हृदय लाये ओं ह्रीं तीर्थंकरविमलनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । नीर प्रासुक कनक घट में, पूजने नाथ भर लाये । तृषा का रोग मिट जाये, विमल पादाब्ज मन भाये ॥ विमल जिनराज तीर्थंकर, विमलता दीजिए मुझको। पतित आतम बने पावन, शरण में लीजिए मुझको ॥ ओं ह्रीं श्री विमलनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं […] - [श्री अनन्तनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Anantnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-anantnath-jin-pooja/): पुष्पमंजरी छन्द – रजरजर – गण तर्ज-देव आप दर्श से………….. सिंहसेन तात मात सूर्या पुत्र हो गये। हे अनन्तनाथ आप कर्म मुक्त हो गये॥ वीतराग वीतद्वेष आप वीतकाम हो। पूजने बुला रहे हृदै विराजमान हो॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरअनन्तनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । कूप नीर छान के जिवानी कूप में करूँ। अग्नि से अचित्त होय, स्वर्ण पात्र में भरूँ॥ हे अनन्तनाथ ! आप ज्ञान दान दीजिए। कर्म बन्ध से बचूँ कषाय हान कीजिए॥ ओं ह्रीं श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। शुद्ध गन्ध […] - [श्री धर्मनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Dharmnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-dharmnath-jin-pooja/): भारत छन्द -सात भगण दो गुरु धर्म जिनेन्द्र नमो कर जोड़, सुमात प्रभा प्रभु गर्भ सुहाये। भानु पितांगण में सुर इन्दर, गर्भ सुमंगल गान सुनाये॥ काश्यप गोत्र सुवंश महाकुरु देव घनी धन वृष्टि कराये। रत्नपुरी तज दीक्षित धर्म, महाभगवन्त हृदै पधराये॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरधर्मनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । लय-लावनी श्री धर्मनाथ जिनराज मेरी अरज सुनो, कर दो भव दुख से पार, मेरी अरज सुनो। जीवानी कर छना कूप जल, प्रासुक कलश भराय। जन्म जरा मृति रोग निवारन, जिनवर चरण चढ़ाय॥ मेरी ओं ह्रीं […] - [जैन सुगन्ध दशमी व्रत पूजा || Sugandha Dashami Vrat Pooja](https://jinvani.in/sugandha-dashami-vrat-pooja/): दोहा वृषभदेव को आदि दे, शीतल जिन पर्यन्त । मंगलकर जिनवर नमूँ, होवे भव का अन्त ||१|| जिन शासन में व्रत कहे, एक शतक वसु जान । उनके उत्तम फल कहे, गति विधि को पहचान ॥२॥ व्रत सुगंध दशमी महा उनमें एक सुजान । जिनकी महिमा अमित है, श्रुतगोचर सुख खान ॥३॥ यह व्रत मुझको स्वपद दे, पर पद में रति भान । जिस प्रभाव शिवपद लहूँ, पाऊँ भव अवसान ॥४॥ वृषभ आदि शीतल जिना, यहाँ पधारो आप । अहो हमारे मन बसो, मिटे जगत संताप ||५|| ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिशीतलनाथपर्यन्तसर्वजिनेन्द्रसमूह […] - [श्री अजितनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Ajitnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-ajitnath-jin-pooja/): ज्ञानोदय छन्द इन्द्रिय मन को जीत अजित जिन, द्वितीय तीर्थंकर प्यारे । विजय अनुत्तर से आ जन्में, क्षेमंकर जग से न्यारे ॥ पूजन हित आह्वानन करते, मेरे उर में आ जाओ। आप समान बने यह आतम, समकित बोध जगा जाओ ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकर अजितनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । उज्ज्वल जल सम निर्मल मन हो, श्रद्धा गुण की प्याली हो । प्रभो! आपको नीर चढ़ाऊँ, आप दोष से खाली हो ॥ अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी । मन इन्द्रिय को […] - [श्री आदिनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Aadinath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-aadinath-jin-pooja/): मातृकाछन्द-लय झूलना हे ऋषभ देव! तेरी, शरण आ गये, मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये। बड़े बाबा! तुम्हारी, शरण आ गये, मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये ॥ नाभि मरुदेवी सुत, आदि जिन की शरण, नाशती है जरा मृत्यु, भव भव मरण । शोक सागर उभरने, तरणि पा गये. मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये। तुमने दुष्टाष्ट कर्मों को, चूरण किया, तुमने ज्ञानादि गुण को, सुपूरण किया। कर्म से मुक्ति पाने, यहाँ आ गये, मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये। ओं ह्रीं तीर्थंकरआदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् […] - [भूगर्भ प्रकटित अतिशयकारी श्री मुनिसुव्रतनाथ || Bhugarbha Praktit Atishaykari Shri Munisuvratnath Pooja](https://jinvani.in/bhugarbha-praktit-atishaykari-shri-munisuvratnath/): ज्ञानोदय तीर्थ (अजमेर) भारत छन्द -लय-वीर हिमाचल तैं प्राणत स्वर्ग तजो जिनराज, सु राजगृही प्रभु जन्म लियो है। श्री सुखमित्र सुमित्र पिता, पद्मा जननी घर धन्य कियो है॥ हे मुनिसुव्रतनाथ जिनेश्वर !, है हृदयांगन देश हमारो । भूमि सुनिर्गत हे महिमाधर,!, देर करो नहिं शीघ्र पधारो ॥ ओं ह्रीं भूगर्भ प्रकटित ज्ञानोदय तीर्थक्षेत्रस्थ महातिशयकर विघ्नहर मुनिसुव्रतनाथजिनेन्द्र ! अत्र-अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अन मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । जिनगीतिका छन्द जल पान से तृष्णा मिटी ना, नीर प्रभु पद में धरूँ। जन्मादि रोगों की व्यथा को, आप चरणों में हरूँ […] - [जैन तीर्थंकर पूजाएँ || Tirthankar Pooja](https://jinvani.in/tirthankar-pooja/): चतुर्थकालीन सांगानेर वाले बाबा ऋभदेव पूजन रचियता – लालचन्द जी जैन (राकेश) ऋषभदेव हैं धर्म – प्रवर्तक कर्म प्रवर्तक तीर्थंकर, कर्मनाश कर सिद्ध भये हैं, भक्त धन्य हैं दर्शनकर; साँगानेर वाले बाबा की प्रतिमा अतिशयकारी है, पाप नशाती संकट हरती, दर्शन की बलिहारी है, भक्ति भाव से पूजन करते, दीपक ज्योति जलाते हैं, रोते रोते आते हैं जन, हँसते हँसते जाते हैं; प्रभु के दर्शन करने से अब, मम स्वरूप का ज्ञान हुआ, निधत्ति निकाचित कर्म कटे हैं, सम्यक् दर्शन प्राप्त हुआ, ॐ ह्रीं श्री १००८ महाअतिशकारी साँगानेर वाले बाबा आदिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर – अवतर संवौषट् ! अत्र तिष्ठ […] - [जैन चारित्र-शुद्धि व्रत पूजा || Charitra Shuddhi Vrat Pooja](https://jinvani.in/charitra-shuddhi-vrat-pooja/): दोहा शुद्ध  सुगुण  छ्यालीस युत, समोशरण  के  ईश । निज आतम उद्धार हित, नमत चरण में शीश ॥१॥ आत्म-शुद्धि के अर्थ हम, जिनवर पूज रचाय । रत्नत्रय की प्राप्ति हित, श्री जिनेन्द्र गुण गाय ॥२॥ करूँ त्रिविधि शुधियोग से, आह्वानन विधि सार । आवहु तिष्ठहु हृदय में, नाथ त्रिलोक अधार ||३|| सोरठा व्रत चरित्र महान, इस बिन मुक्ति न पावहीं। चारित्र शुद्धि विधान, इसीलिए अर्चन करूँ । ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित-षट्चत्वारिंशद्गुणसहितार्हत्परमेष्ठिन् ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित-षट्चत्वारिंशद्गुणसहितार्हत्परमेष्ठिन् ! अत्र तिष्ठ ठः ठः ठः । ॐ ह्रीं अष्टादशदोषरहित-षट्चत्वारिंशद्गुणसहितार्हत्-परमेष्ठिन् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । (अष्टक) गंगादिक निर्मल […] - [सलूना पूजा - Saloona Pooja](https://jinvani.in/saloona-pooja/): श्रीअकम्पनाचार्यादि सप्तशत मुनि पूजा चाल जोगीरासा पूज्य अकम्पन साधु-शिरोमणि सात- शतक मुनि ज्ञानी । आ हस्तिनापुर के कानन में हुये अचल दृढ़ ध्यानी ॥ दुखद सहा उपसर्ग भयानक सुन मानव घबराये। आत्म-साधना के साधक वे, तनिक नहीं अकुलाये॥ योगिराज श्री विष्णु त्याग तप, वत्सलता-वश आये। किया दूर उपसर्ग, जगत-जन मुग्ध हुए हर्षाये॥ सावन शुक्ला पन्द्रस पावन शुभ दिन था सुख दाता। पर्व सलूना हुआ पुन्यप्रद यह गौरवमय गाथा।। शान्ति, दया, समता का जिनसे नव आदर्श मिला है। जिनका नाम लिये से होती जागृत पुण्य-कला है। करूँ वन्दना उन गुरुपद की वे गुण मैं भी पाऊँ । आह्वानन संस्थापन सन्निधिकरण करूँ […] - [जैन सरस्वती पूजा - Saraswati Pooja](https://jinvani.in/saraswati-pooja/): (दोहा) जनम-जरा-मृतु क्षय करे, हरे कुनय जड़-रीति | भवसागर सों ले तिरे, पूजे जिनवच-प्रीति || ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट् । (त्रिभंगी) क्षीरोदधि गंगा, विमल तरंगा, सलिल अभंगा सुख संगा | भरि कंचनझारी, धार निकारी, तृषा निवारी हित चंगा || तीर्थंकर की ध्वनि, गणधर ने सुनि, अंग रचे चुनि ज्ञानमर्इ | सो जिनवरवानी, शिवसुखदानी, त्रिभुवनमानी पूज्य भर्इ || ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भूत-सरस्वतीदेव्यै जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। करपूर मंगाया, चंदन आया, केशर लाया रंग भरी | शारदपद […] - [KSHAMAVANI POOJA - क्षमावणी पर्व-पूजा](https://jinvani.in/kshamavani-pooja/): कविश्री मल्ल (छप्पय छन्द) अंग-क्षमा जिन-धर्म तनों दृढ़-मूल बखानो |सम्यक्-रतन संभाल हृदय में निश्चय जानो ||तज मिथ्या-विषमूल और चित निर्मल ठानो |जिनधर्मी सों प्रीति करो सब-पातक भानो ||रत्नत्रय गह भविक-जन, जिन-आज्ञा सम चालिए |निश्चय कर आराधना, कर्मराशि को जालिये ||ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप-रत्नत्रय! अत्र अवतर अवतर संवौषट्!(आह्वाननम्)ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप-रत्नत्रय! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्)।ॐ ह्रीं श्री सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूप-रत्नत्रय! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)। नीर सुगन्ध सुहावनो, पदम-द्रह को लाय |जन्म-रोग निरवारिये, सम्यक्-रत्न लहाय ||क्षमा गहो उर जीवड़ा, जिनवर-वचन गहाय |ॐ ह्रीं श्री निशंकितांगाय नम:, निकांक्षितांगाय नम:, निर्विचिकित्सांगाय नम:, निर्मूढ़तायै नम:, उपगूहनांगाय नम:, स्थितिकरणांगाय नम:, वात्सल्यांगाय नम:, प्रभावनांगाय […] - [सम्यकचारित्र पूजा - Samyak Charitra Pooja](https://jinvani.in/samyak-charitra-pooja/): दोहा – विषय-रोग औषध महा, दव-कषाय जल-धार | तीर्थंकर जाको धरे सम्यक् चारित्र सार || ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | सोरठा   नीर सुगन्ध अपार, तृषा हरे मल छय करे | सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा || ॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा |1| जल केशर घनसार, ताप हरे शीतल करे | सम्यक् चारित सार, तेरहविध पूजौं सदा || ॐ त्रयोदशविध सम्यक् चारित्राय चदनं निर्वपामीति स्वाहा |2| अछत अनूप निहार, दारिद नाशे […] - [सम्यग्ज्ञान पूजा - SAMYAK GYAN POOJA](https://jinvani.in/samyak-gyan-pooja/): (दोहा) पंच भेद जाके प्रकट, ज्ञेय-प्रकाशन-भान | मोह-तपन-हर चंद्रमा, सोई सम्यक्ज्ञान || ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान! अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) (सोरठा छन्द) नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल-छय करे | सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा || ॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। जल केसर घनसार, ताप हरे शीतल करे | सम्यग्ज्ञान विचार, आठ-भेद पूजूं सदा || ॐ ह्रीं श्री अष्टविध सम्यग्ज्ञानाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२। अछत अनूप निहार, दारिद नाशे सुख […] - [सम्यग्दर्शन पूजा - SAMYAK DARSHAN POOJA](https://jinvani.in/samyak-darshan-pooja/): (दोहा) सिद्ध अष्ट -गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान । ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक्दर्श प्रधान ।। ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन !अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) (सोरठा) नीर सुगंध अपार, तृषा हरे मल-छय करे | सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा || ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। जल केसर घनसार, ताप हरे शीतल करे | सम्यग्दर्शन सार, आठ-अंग पूजूं सदा || ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शनाय संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२। अछत […] - [श्री विष्णुकुमार महामुनि पूजा - Mahamuni Pooja](https://jinvani.in/mahamuni-pooja/): लावनी छन्द श्री योगी विष्णुकुमार बाल वैरागी, पाई वह पावन ऋद्धि विक्रिया जागी सुन मुनियों पर उपसर्ग स्वयं अकुलाये, हस्तिनापुर वे वात्सल्य-भरे हिय आये || कर दिया दूर सब कष्ट साधना-बल से, पा गये शान्ति सब साधु अग्नि के झुलसे । जन जन ने जय-जयकार किया मन भाया, मुनियों को दे आहार स्वयं भी पाया । हैं वे मेरे आदर्श सर्वदा स्वामी, मैं उनकी पूजा करूँ बनूं अनुगामी । वे दें मुझमें यह शक्ति भक्ति प्रभु पाऊँ, मैं कर आतम कल्याण मुक्त हो जाऊँ ॥ ॐ ह्रः श्रीविष्णुकुमारमुने! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रः विष्णुकुमारमुने! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः […] - [दीपावली-पूजन -विधि (Depawali Pujan Vidhi)](https://jinvani.in/depawali-pujan-vidhi/): जैन धर्म के अनुसार दीपावली विधि अनादि अनंत काल से भरतक्षेत्र में अनंत चौबीसी के तीर्थंकर अनंत- अनंत काल से होते आए हैं, इसी क्रम में इस युग में भी ऋषभनाथ से लेकर महावीर पर्यन्त चौबीस तीर्थंकर हुए। तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के २५६ वर्ष साढ़े तीन माह के बाद अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर को कार्तिक सुदी अमावस्या को मोक्ष प्राप्त हुआ था तथा उनके प्रथम गणधर इन्द्रभूति गौतम को अपराह्लिक काल में उसी दिन केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी इसी के प्रतीक रूप में कार्तिक वदी अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाता है। विधि :- प्रातः काल सूर्योदय के समय […] - [चौसठ ऋद्धि अर्घ्य (चौसठ अर्घ्य चढ़ावें) - Chausath Riddhi Arghya](https://jinvani.in/chausath-riddhi-arghya/): ॐ ह्रीं अवधिज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं मनः पर्ययज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं केवलज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं बीजबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं कोष्ठज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं पदानुसारिणीबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं संभिन्नसंश्रोतृत्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दूरास्वादित्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दूरस्पर्शत्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दूरघ्राणत्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दूरश्रवणत्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दूरदर्शित्वबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं दशपूर्वित्वबुद्धिऋद्धये […] - [सम्मेदशिखर पूजा - Sammed Shikhar Pooja](https://jinvani.in/sammed-shikhar-pooja/): पं. जवाहरदास दोहा ‘श्रीजिन बीस जिनेश के, बीसों शिखर महान । और असंख्य मुनीश जहँ, पहुँचे शिवपद थान ॥ ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सन्निहितं भव भव वषट् । अष्टक (गीतिका छन्द) पदमद्रह को नीर निर्मल हेम झारी में भरों। तृषा रोग निवारने को, चरणतर धारा करों ।। सम्मेदगढ़तैं मुनि असंख्ये, करम हर शिवपुर गये । सो थान परम पवित्र पूजों, तासु फल पुनि संचये ॥ ॐ ह्रीं असंख्यातमुनिसिद्धपददायकाय श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन कपूर मिलाय केसर, नीर सौं […] - [प्रत्येक टोंक के अर्घ्य - पच्चीस टोंक के अर्घ्य](https://jinvani.in/pachchis-tonk-ke-ardhya/): जैन धर्म में तीर्थयात्रा का विशेष महत्व है, और शिखर जी तीर्थ उन पवित्र स्थलों में सर्वोच्च स्थान रखता है जहाँ अनगिनत साधक आत्मकल्याण की राह पर अग्रसर हुए हैं। यह पर्वत स्थान केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और मोक्ष का प्रतीक है। शिखर जी पर कुल पच्चीस प्रमुख टोंक स्थित हैं, जहाँ जैन तीर्थंकरों और अन्य सिद्ध पुरुषों ने तपस्या कर सिद्धत्व की प्राप्ति की। प्रत्येक टोंक पर चढ़ाए जाने वाले अर्घ्य की विधि, भावना और सामग्री का विशेष धार्मिक महत्व होता है। इस लेख में हमने शिखर जी के सभी पच्चीस टोंकों के अर्घ्य का विस्तृत […] - [श्री गिरनार पूजा || Shri Girnar Pooja](https://jinvani.in/shri-girnar-pooja/): दोहा बंदौं नेमि जिनेश पद, नेमि-धर्म-दातार । नेम धुरंधर परम गुरु, भविजन सुख कर्तार ||१|| जिनवाणीको प्रणम कर, गुरु गणधर उर धार । सिद्धक्षेत्र पूजा रचौं, सब जीवन हितकार ॥२॥ उर्जयंतगिरि नाम तस, कह्यो जगत विख्यात । गिरिनारी तासें कहत, देखत मन हर्षात ||३|| द्रुतविलंबित तथा सुन्दरी छन्द गिरि सु उन्नत सुभगाकार है, पंचकूट उत्तंग सुधार है। वन मनोहर शिला सुहावनी, लखत सुंदर मनको भावनी ||४|| अवरकूट अनेक बने तहां, सिद्ध थान सु अति सुन्दर जहां। देखि भविजन मन हर्षावते, सकल जन वंदनको आवते॥५॥ त्रिभंगी छन्द तहँ नेमकुमारा सु व्रत धारा, कर्म विदारा शिव पाई। मुनि कोडि बहत्तर सात शतक […] - [श्री कैलासगिरि पूजा || Shri Kailas Giri Pooja](https://jinvani.in/shri-kailas-giri-pooja/): रोला छन्द श्री कैलाश पहाड़ जगत परधान कहा। आदिनाथ भगवान जहां शिववास लहा है। नागकुमार महाबाल व्याल आदि मुनिराई। गये तिहिं गिरिसों मोक्ष थाप पूजों शिर नाई|| दोहा – श्री कैलाश पहाड़ सों आदिनाथ जिनदेव। मुनी आदि जे शिव गये, थापि करों पद सेव॥ ॐ ह्रीं कैलाशपर्वततः मुक्तिपदप्राप्तश्री आदिनाथस्वामिन् वा नागकुमारादिमुनिसमूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणं। अष्टक (पद्धरि छन्द मात्रा १६ ) नद गङ्ग सु निर्मल नीर लाय, करि प्रासुक मरुकुम्भन भराय। जिन आदि मोक्ष कैलाश थान, मुन्यादि पाद जजुं जोरि पानि॥ ॐ ह्रीं […] - [जैन श्रुतपञ्चमी पूजा || Shrutpanchami Pooja](https://jinvani.in/shrutpanchami-pooja/): सरस्वती की पूजा करने, श्री जिनमन्दिर जायेंगे। भव्य भारती की पूजा में, जीवन सफल बनायेंगे| श्रुत के आराधन से मन में, ज्ञान की ज्योति जलायेंगे। पर्यायों को कर विनष्ट हम, निजस्वरूप को पायेंगे॥ अतः करें आह्वान मात का, दृढ़ता हमको दे देना। सदा रहे बस ध्यान आपका, ये ही सबक हमें देना॥ ॐ ह्रीं श्रीद्रव्यश्रुतषट्खण्डागम ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं । ॐ ह्रीं श्रीद्रव्यश्रुतषट्खण्डागम ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । ॐ ह्रीं श्रीद्रव्यश्रुतषट्खण्डागम ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधि०| अष्टक प्रासुक निर्मल नीर लिये, प्रभु का अभिषेक करायें । गंधोदक निजशीश धारकर, प्रभुवाणी चित लावें […] - [पंच मेरु पूजा || Panch Meru Pooja](https://jinvani.in/panch-meru-pooja/): कविवर ज्ञानतराय गीता छंद तीर्थंकरों के न्हवन जलतें भये तीरथ शर्मदा, तातें प्रदच्छन देत सुर गन पंच मेरुन की सदा | दो जलधि ढाई द्वीप में सब गनत-मूल विराजहीं, पूजौं असी जिनधाम प्रतिमा होहि सुख दुख भाजहीं || ॐ ह्रीं पंचमेरूसम्बन्धि अस्सी जिनचैत्यालयस्थजिनप्रतिमा-समूह! अत्र अवतर अवतरसंवौषट् | ॐ ह्रीं पंचमेरूसम्बन्धि अस्सी जिनचैत्यालयस्थजिनप्रतिमा-समूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं पंचमेरूसम्बन्धि अस्सी जिनचैत्यालयस्थजिनप्रतिमा-समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | अष्टक शीतल-मिष्ट-सुवास मिलाय, जल सों पूजौं श्रीजिनराय | महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय || पाँचों मेरु असी जिनधाम, सब प्रतिमा जी को करौं प्रणाम | महासुख होय, देखे […] - [रत्नत्रय पूजा - RATNATRAYA POOJA](https://jinvani.in/ratnatraya-pooja/): कविश्री द्यानतराय (दोहा) चहुँगति-फनि-विष-हरन-मणि, दु:ख-पावक जल-धार | शिव-सुख-सुधा-सरोवरी, सम्यक्-त्रयी निहार || ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) अष्टक (सोरठा छन्द) क्षीरोदधि उनहार, उज्ज्वल-जल अति-सोहनो | जनम-रोग निरवार, सम्यक् रत्नत्रय भजूँ || ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रयाय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। चंदन-केसर गारि, परिमल-महा-सुगंधमय | जनम-रोग निरवार, सम्यक् रत्नत्रय भजूँ || ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रयाय भवताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२। तंदुल अमल चितार, बासमती-सुखदास के | जनम-रोग निरवार, सम्यक् […] - [दस लक्षण पूजा - Das Lakshan Pooja](https://jinvani.in/das-lakshan-pooja/): कविवर ज्ञानतराय आडिल्ल उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव है, सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं | आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दस सार हैं, चहुँगति दुखते काढि मुक्ति करतार हैं || ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट ! ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: ! ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ! अष्टक हेमाचलकी धार,मुनि-चित सम शीतल सुरभि | भव-.आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा || ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाये जलं निर्वपामिति स्वाहा| चन्दन केसर गार, होय सुवास दसों दिशा| भव-.आताप निवार, दस-लच्छन पूजौं सदा|| ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय संसारताप-विनाशनाये चन्दनं निर्वपामिति स्वाहा| अमल अखंडित सार, तंदुल चन्द्र समान शुभ | […] - [जलाभिषेक वा प्रक्षाल-पाठ || Jalabhishek Path](https://jinvani.in/jalabhishek-path/): जय-जय भगवंते सदा, मंगल मूल महान।वीतराग सर्वज्ञ प्रभु,नमौ जोरि जुगपान।। (ढाल मंगल की,छंद अडिल्ल और गीता) श्रीजिन जगमें ऐसो को बुधवंत जू। जो तुम गुण वरननि करि पावै अंत जू।।इंद्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनी।कहि न सकै तुम गुणगण हे त्रिभुवनधनी।। अनुपम अमित तुम गुणनि-वारिधि,ज्यों अलोकाकाश है। किमि धरै हम उर कोषमें सो अकथ-गुण-मणि-राश है।पै निज प्रयोजन सिद्धि की तुम नाम में ही शक्ति है। यह चित्त में सरधान यातैं नाम में ही भक्ति है।।१।। ज्ञानावरणी दर्शन,आवरणी भने।कर्म मोहनी अंतराय चारों हने।।लोकालोक विलोक्यो केवलज्ञान में।इंद्रादिक मुकुट नये सुरथान में।। तब इंद्र जान्यो अवधितैं,उठि सुरन-युत बंदत भयो।तुम पुन्यको प्रेरयो हरी ह्वै मुदित […] - [नित्य पूजा पीठिका | Nitya Puja Pithika](https://jinvani.in/nitya-puja-pithika/): नित्य पूजा पीठिका ॐ जय जय जय नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं,   णमो  लोए  सव्व साहूणं॥ “चत्तारि मंगलं अरहंत मंगलं सिद्ध मंगलं साहु मंगलं                           केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा अरहंत लोगुत्तमा सिद्ध लोगुत्तमा साहु  लोगुत्तमा  केवलिपण्णत्तो  धम्मो लोगुत्तमो । चत्तारि सरणं  पव्वज्जामि अरहंत  सरणं पव्वज्जामि सिद्ध सरणं  पव्वज्जामि साहु  सरणं पव्वज्जामि केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि । ॐ ह्रीं अनादिमूलमन्त्रेभ्यो नमः (पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि ) ॐ नमोऽर्हते स्वाहा (पुष्पाञ्जलिं क्षिपामि) अपवित्रः पवित्रो वा सुस्थितो दुःस्थितोऽपि वा। ध्यायेत्पञ्चच-नमस्कारं, सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१॥ अपवित्रः पवित्रो […] - [परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ | Paramarshi Swasti Mangal Path](https://jinvani.in/paramarshi-swasti-mangal-path/): परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ (प्रत्येक श्लोक के बाद पुष्प क्षेपण करें ) (उपजातिच्छन्दः) नित्याप्रकम्पाद्भुतकेवलौघाः, स्फुरन्मनःपर्ययशुद्धबोधाः दिव्यावधि-ज्ञानबलप्रबोधाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥१॥ कोष्ठस्थ-धान्योपम-मेकबीजं, संभिध-संश्रोतृपदानुसारि । चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||२|| संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन घ्राण-विलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञानबलाब्रहन्तः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||३|| प्रज्ञाप्रधानाः श्रमणाः समृद्धाः, प्रत्येक-बुद्धाः दशसर्वपूर्व: । प्रवादिनोऽष्टाङ्गनिमित्तविज्ञाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||४|| जङ्घानलश्रेणि- फलाम्बु-तन्तु प्रसून बीजाङ्कुर – चारणाह्वाः । नभोऽङ्गणस्वैरविहारिणश्च, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||५|| अणिनि दक्षाः कुशला महिम्नि, लघिम्नि शक्ताः कृतिनो गरिणि । मनो-वपु-र्वाग्बलिनश्च नित्यं, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||६|| सकामरूपित्ववशित्वमैश्यं, प्राकाम्यमन्तर्द्धिमथाप्तिमाप्ताः । तथाऽप्रतीघातगुणप्रधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||७|| दीप्तं च तप्तं च महत्तथोग्रं, घोरं तपो […] - [श्री बाहुबली पूजा – Shri Bahubali Swami Pooja](https://jinvani.in/shri-bahubali-swami-pooja/): कर्म-अरिगण जीत के, दरशायो शिव-पंथ | सिद्ध-पद श्रीजिन लह्यो, भोगभूमि के अंत || समर-दृष्टि-जल जीत लहि, मल्लयुद्ध जय पाय | वीर-अग्रणी बाहुबली, वंदौं मन-वच-काय || ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलीजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (आह्वाननं) ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलीजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (स्थापनम्)। ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलीजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्)। (अष्टक) जन्म-जरा-मरणादि तृषा कर, जगत-जीव दु:ख पावें | तिहि दु:ख दूर-करन जिनपद को, पूजन-जल ले आवें || परम-पूज्य वीराधिवीर जिन, बाहुबली बलधारी | तिनके चरण-कमल को नित-प्रति, धोक त्रिकाल हमारी || ॐ ह्रीं श्रीबाहुबली-परमयोगीन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१। यह संसार मरुस्थल-अटवी, तृष्णा-दाह भरी है | तिहि दु:खवारन चंदन […] - [अर्ध्यावली पूजा - Arghyawali Puja](https://jinvani.in/arghyavali-puja/): बीस तीर्थंकर जल फल आठों दर्व अरघ कर प्रीति धरी है, गणधर इन्द्रनिहू-तैं श्रुति पूरी न करी है। धानत सेवक जानके (हो) जगतें लेहु निकार, सीमन्धर जिन आदि दे बीस विदेह मँझार। (श्री जिनराज हो भव तारण तरण जहाज॥) ॐ ह्रीं श्रीसीमन्धरादिविद्यमानविंशतितीर्थङ्करेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति०। कृत्रिमाकृत्रिम जिनबिम्ब कृत्याकृत्रिमचारुचैत्यनिलयान् नित्यं त्रिलोकीगतान्, वन्दे भावन-व्यन्तरान् द्युतिवरान् कल्पामरावासगान्।। सद्-गन्धाक्षत-पुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फलैर् नीराद्यैश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शान्तये॥ (सात करोड़ बहत्तर लाख, सु-भवन जिन पाताल में। मध्यलोक में चारसौ अट्ठावन, जजों अघमल टाल के॥ अब लखचौरासी सहस सत्याणव, अधिक तेईस रु कहे। बिन संख ज्योतिष व्यन्तरालय, सब जजों मन वच ठहे II) ॐ ह्रीं कृत्रिमाकृत्रिमजिनबिम्बेभ्योऽर्घं […] - [शांतिपाठ - Shanti Path](https://jinvani.in/shantipath/): Shanti Path in Hindi ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपा-लसन्तं श्रीवृषभादिमहावीरपर्यन्त- चतुर्विंशतितीर्थङ्करपरमदेवं आद्यानां आद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे . …….नाम्नि नगरे मासानामुत्तमे …… मासे …… शुभपक्षे …….. तिथौ …….. वासरे मुन्यार्यिका श्रावक-श्राविकाणां सकलकर्मक्षयार्थं अनर्घ्यपद- प्राप्तये सम्पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा। शांतिनाथ ! मुख शशि-उनहारी, शील-गुण-व्रत, संयमधारी | लखन एकसौ-आठ विराजें, निरखत नयन-कमल-दल लाजें ||१|| अर्थ– हे शांतिनाथ भगवान् ! आपका चन्द्रमा के समान निर्मल मुख है। आप शील गुण, व्रत और संयम के धारक हैं। आपकी देह में 108 शुभ-लक्षण हैं। और आपके नेत्रों को देखकर कमल-दल भी शरमा जाते हैं ।१। पंचम-चक्रवर्ति-पदधारी, सोलम-तीर्थंकर सुखकारी | इन्द्र-नरेन्द्र-पूज्य जिननायक, नमो! शांतिहित शांतिविधायक ||२|| अर्थ– सुख […] - [नन्दीश्वर द्वीप पूजा - Nandishwar Dweep Pooja](https://jinvani.in/nandishwar-dweep-pooja/): कविश्री द्यानतराय (आडिल्ल छन्द) सरब-परव में बड़ो अठार्इ परव है| नंदीश्वर सुर जाहिं लेय वसु दरब है|| हमें सकति सो नाहिं इहाँ करि थापना| ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र मम सत्रिहितो भव भव वषट्! (सत्रिधिकरणम्) कंचन मणि मय भृंगार, तीरथ नीर भरा | तिहुँ धार दर्इ निरवार, जामन मरन जरा || नंदीश्वर श्रीजिन धाम, बावन पूज करूं | वसु दिन प्रतिमा अभिराम, आनंद भाव धरूं || ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षु द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमाभ्य: जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। […] - [सोलह कारण पूजा || Solah Karan Pooja](https://jinvani.in/solah-karan-pooja/): कविवर द्यानतराय (अडिल्ल) सोलह कारण भाय तीर्थंकर जे भये | हरषे इन्द्र अपार मेरुपै ले गये || पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसौं| हमहू षोडश कारन भावैं भावसौं || ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | अष्टक (चौपाई आंचलीबद्ध) कंचन-झारी निरमल नीर पूजों जिनवर गुन-गंभीर| परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो || दरशविशुद्धि भावना भाय सोलह तीर्थंकर-पद-दाय| परम गुरु हो जय जय नाथ परम गुरु हो || ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि० […] - [नवदेवता जिनपूजा || Nav Devta JinPuja](https://jinvani.in/nav-devta-jinpuja/): जिनगीतिका (तर्ज-प्रभु पतित पावन……!) अरहंत सिद्धाचार्य पाठक, साधु जन के पद नमूँ, जिनधर्म जैनागम जिनेश्वर, मूर्ति जिनगृह में रमूँ । नवदेव मुझको वैद्य सम हों, जन्म मृति जर रुज हरें, जिन नाम पद मम औषधी हों, माथ पर पद रज धरें ॥ ओं ह्रीं अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुजिनधर्मजिनागमजिनचैत्य चैत्यालय देवताः अत्र अव अवतरत संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः स्थापनम् ! अत्र मम सन्निहिताः भवत भवत वषट् सन्निधीकरणम् ! दश अष्ट दोष विनष्ट करके, वीतरागी हो गये, सर्वज्ञ तीर्थंकर बने तब, हम तुम्हारे हो गये । अरिहंत जिनवर आप्त को भज, जन्म मृत्यु जरा हरें, इस हेतु निर्मल नीर लेकर, देव […] - [समुच्चय पूजा । Samuchchay Puja](https://jinvani.in/samuchchay-puja/): देवशास्त्र गुरु नमन करि, बीस तीर्थङ्कर ध्याय।सिद्ध शुद्ध राजत सदा, नमूँ चित्त हुलसाय॥ ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवन्तः, श्री अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठिन:, श्री विद्यमान विंशति तीर्थंकरेभ्यः अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्।   ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवंतेभ्यः, श्रीविद्यमानविंशतितीर्थङ्करा:, श्रीअनन्तानन्त सिद्धपरमेष्ठिन:, अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ: स्थापनम्।   ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवंतेभ्यः, श्रीविद्यमानविंशतितीर्थंकरा:, श्रीअनन्तानन्त सिद्धपरमेष्ठिन: अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट्। अष्टक अनादिकाल से जग में स्वामिन्, जल से शुचिता को माना।शुद्ध निजातम सम्यक् रत्नत्रय-निधि को नहिं पहचाना।अब निर्मल रत्नत्रय जल ले, श्री देव शास्त्र गुरु को ध्याऊँ।विद्यमान श्री बीस तीर्थङ्कर, सिद्ध प्रभु के गुण गाऊँ॥ ॐ ह्रीं श्री देव […] - [देव-स्तुति (अहो जगत-गुरु) || Dev Stuti](https://jinvani.in/dev-stuti/): कविवर भूधरदास ढाल परमादी अहो जगत-गुरु! देव’ ! सुनिए अरज हमारी। तुम प्रभु दीनदयाल, मैं दुखिया संसारी ॥१॥ इस भव-वन में वादि, काल अनादि गमायो। भ्रभ्यो चहूँ गति माँहिं, सुख नहिं दुख बहु पायो ॥२॥ कर्म-महारिपु जोर, एक न कान करैं जी। मनमाने दुख देहिं, काहू सौं नाहिं डरैं जी ॥३॥ कबहुँ इतर निगोद, कबहूँ नरक दिखावैं। सुर-नर-पशु-गति मौहिं, बहुविध नाच नचावैं ॥४॥ प्रभु! इनको परसंग, भव-भव माँहिं बुरो जी। जे दुख देखे देव! तुमसौं नाहिं दुरो जी ॥५॥ एक जनम की बात, कहि न सकों सब स्वामी। तुम अनन्त परजाय, जानत अन्तरजामी ॥६॥ मैं तो एक अनाथ, ये मिल […] - [लघु चैत्यभक्ति (वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु)](https://jinvani.in/laghu-chaitya-bhakti/): इन्द्रवज्रा वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु, नन्दीश्वरे यानि च मन्दरेषु । यावन्ति चैत्यायतनानि लोके, सर्वाणि वन्दे जिनपुङ्गवानाम् ॥ मालिनी अवनितल-गतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां, वन-भवन-गतानां दिव्य-वैमानिकानाम्। इह मनुज – कृतानां देवराजार्चितानां जिनवर-निलयानां भावतोऽहं स्मरामि॥ शार्दूलविक्रीडितम् जम्बूधातकि- पुष्करार्ध-वसुधा क्षेत्रत्रये ये भवा – श्चन्द्राम्भोजशिखण्डिकण्ठकनक प्रावृड्घनाभा जिनाः। सम्यग्ज्ञान – चरित्र – लक्षणधरा, ‘दग्धाष्टकर्मेन्धनाः, भूतानागत-वर्तमानसमये, तेभ्यो जिनेभ्यो नमः॥ स्रग्धरा श्रीमन्मेरौ कुलाद्रौ, रजतगिरिवरे, शाल्मलौ जम्बुवृक्षे वक्षारे चैत्यवृक्षे, रतिकर रुचके, कुण्डले मानुषाङ्के। इष्वाकारेऽञ्जनाद्रौ, दधिमुखशिखरे, व्यन्तरे स्वर्गलोके ज्योतिर्लोकेऽभिवन्दे, भुवनमहितले, यानि चैत्यालयानि॥ शार्दूलविक्रीडितम् द्वौ कुन्देन्दु तुषारहार धवलौ, द्वाविन्द्रनील प्रभौ, द्वौ बन्धूक- सम-प्रभौ जिनवृषौ द्वौ च प्रियङ्गुप्रभौ शेषाः षोडश-जन्ममृत्युरहिताः संतप्तहेम प्रभा- स्ते सज्ज्ञानदिवाकराः सुरनुताः सिद्धिं प्रयच्छन्तु नः॥ अंचलिका इच्छामि भंते! चेइयभत्ति – काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं […] - [सिद्धपूजा (द्रव्याष्टकम्) || SiddhaPuja](https://jinvani.in/siddhapuja-dravyashtakam/): ऊर्ध्वाधरयुतं     सबिन्दु-सपरं,    ब्रह्मस्वरावेष्टितं, वर्गापूरित-दिग्गताम्बुजदलं, तत्सन्धि-तत्त्वान्वितम् । अन्तःपत्रतटेष्वनाहतयुतं,             ह्रींकारसंवेष्टितं, देवं   ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो, वैरीभकण्ठीरवः ॥   ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । अनुष्टुप् निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् वन्देऽह     परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥ सिद्धयन्त्रस्थापनम् वसन्ततिलका सिद्धौ निवासमनुगं परमात्मगम्यं, ‘हान्यादिभावरहितं भववीत-कायम् । रेवापगावरसरोयमुनोद्भवानां,      नीरैर्यजे   कलशगैर्वर-सिद्धचक्रम् ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । आनन्दकन्दजनकं घनकर्ममुक्तं,   सम्यक्त्वशर्मगरिमं जननार्तिवीतम्। सौरभ्यवासित-भुवं हरि-चन्दनानां, गन्धैर्यजे परिमलैर्वर – सिद्धचक्रम्॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं […] - [सिद्धपूजा (भावाष्टकम्) || SiddhaPuja](https://jinvani.in/siddhapuja-bhavashtakam/): निज-मनो-मणि-भाजनभारया शम-रसैक-सुधारसधारया । सकल-बोध-कला-रमणीयकं सहज – सिद्धमहं परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व० सहज-कर्म-कलङ्क-विनाशनै-रमल भाव- सुवासित-चन्दनैः । अनुपमान-गुणावलि-नायकं      सहज-सिद्धमहं परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्व० सहज-भाव- सुनिर्मलतण्डुलैः सकलदोष- ‘विलास – विशोधनैः । अनुपरोध-सुबोध-निधानकं    सहज-सिद्धमहं    परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्व. स्वाहा समयसार – सुपुष्प – सुमालया सहज- ‘कर्मक-रेणु-विशोधया । परम-योग- बलेन   वशीकृतं   सहज-सिद्धमहं   परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्व. स्वाहा अकृतबोध – सुदिव्य-निवेद्यकैर्विहित-जातिजरामरणान्तकैः । निरवधि- प्रचुरात्म- गुणालयं सहज – सिद्धमहं परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति सहज-रत्नरुचि-प्रतिदीपकैः रुचि – विभूति-तमः प्रविनाशनैः […] - [सिद्धपूजा (भावाष्टक) हीराचंद जी | SiddhaPuja Heerachand Ji](https://jinvani.in/siddhapuja-heerachand-ji/): (अडिल्ल छन्द) अष्ट-करम करि नष्ट अष्ट-गुण पाय के, अष्टम-वसुधा माँहिं विराजे जाय के | ऐसे सिद्ध अनंत महंत मनाय के, संवौषट् आह्वान करूँ हरषाय के || ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्) ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्) (छन्द त्रिभंगी) हिमवन-गत गंगा आदि अभंगा, तीर्थ उतंगा सरवंगा | आनिय सुरसंगा सलिल सुरंगा, करि मन चंगा भरि भृंगा || त्रिभुवन के स्वामी त्रिभुवननामी, अंतरयामी अभिरामी | शिवपुर-विश्रामी निजनिधि पामी, सिद्ध जजामी सिरनामी || ॐ ह्रीं श्री अनाहत-पराक्रमाय […] - [सिद्ध पूजा (भाषा) द्यानतराय || Siddha Puja](https://jinvani.in/siddha-puja-bhasha/): (पं. द्यानतराय) परमब्रह्म परमातमा, परमज्योति ‘परमेश । परम निरंजन परम शिव, नमो परम सिद्धेश ॥         ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव अष्टक (सोरठा) मोह तृषा दुख देइ, सो तुमने जीती प्रभो जल-सौं पूजों नेह, मेरा रोग मिटाइयो | ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्म-जरा-मृत्यु- विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । हम भव- आतप माहिं, तुम न्यारे संसार तैं कीजे शीतल छाँहि, चन्दन सों पूजा करों ॥ ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने संसारताप – विनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति० हम औगुन […] - [दर्शन - स्तुति (सकल-ज्ञेय) || Darshan Stuti](https://jinvani.in/darshan-stuti-sakal/): कविवर दौलतराम दोहा सकल-ज्ञेय-ज्ञायक   तदपि   निजानन्द-रस-लीन। सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि-रज-रहस-विहीन॥ पद्धरि जय वीतराग-विज्ञान पूर, जय मोह तिमिर को हरन सूर। जय ज्ञान अनन्तानन्त धार, दृग-सुख-वीरज-मण्डित अपार॥ जय परम शान्त मुद्रा समेत, भविजन को निज अनुभूति हेत। भवि भागन बच-जोगे वशाय, तुम धुनि है सुनि विभ्रम नशाय॥ तुम गुण चिन्तत निज-पर-विवेक, प्रगटै, विघटैं आपद अनेक। तुम जगभूषण दूषणवियुक्त, सब महिमायुक्त विकल्पमुक्त॥ अविरुद्ध  शुद्ध  चेतनस्वरूप  परमात्म  परम  पावन  अनूप। शुभ अशुभ विभाव अभाव कीन, स्वाभाविक परिणतिमय अछीन॥ अष्टादश दोष विमुक्त धीर, स्व-चतुष्टयमय राजत गम्भीर। मुनि-गणधरावि सेवत महन्त, नव- केवल-लब्धि – रमा धरन्त॥ तुम शासन सेय अमेय जीव, शिव गये जाँहिं जैहैं […] - [बीस तीर्थंकर पूजा (दीप अढ़ाई मेरु) || Bees Tirthankar Puja](https://jinvani.in/bees-tirthankar-puja/): पं. द्यानतराय दीप अढ़ाई मेरु पन ‘अब तीर्थंकर बीस । तिन सबकी पूजा करूँ मन वच तन धरि शीस ॥ ॐ ह्रीं श्रीविद्यमानविंशतितीर्थङ्कराः ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीविद्यमानविंशतितीर्थङ्कराः ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीविद्यमानविंशतितीर्थङ्कराः ! अत्र मम सन्निहिता भवत भवत वषट् । रोला इन्द्र फणीन्द्र नरेन्द्र, वंद्य पद निर्मल धारी। शोभनीक संसार, सार गुण हैं अविकारी॥ दोहा क्षीरोदधि सम नीर सौं, पूजों तृषा निवार। सीमंधर जिन आदि दे, बीस विदेह मँझार॥ (श्री जिनराज हो भव तारण तरण जिहाज॥) ॐ ह्रीं श्रीविद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । तीन लोक के जीव पाप-आताप सताये। […] - [Acharya Shri 108 Samay Sagar Ji Maharaj](https://jinvani.in/samay-sagar-ji-maharaj/): आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज का जीवन परिचय आचार्य श्री समय सागर जी महाराज का जन्म कर्नाटक के बेलगांव में 27 अक्टूबर 1958 को हुआ था। वे आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पहले शिष्य भी हैं। समय सागर जी महाराज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गृहस्थ जीवन के भाई भी हैं। समय सागर जी महाराज ने केवल 17 साल की उम्र में ही क्षुल्लक दीक्षा ले ली थी। बचपन से ही आचार्य श्री समय सागर जी की रुचि धर्म और कर्म में ही रही। बचपन में माता पिता ने इनका नाम शांतिनाथ जी जैन रखा था। […] - [जैन धर्म में राखी क्यों मनाई जाती है? (Jain Raksha Bandhan)](https://jinvani.in/jain-raksha-bandhan/): जय जिनेंद्र मित्रों आज हम बात करेंगे जैन धर्म में रक्षाबंधन के महत्व की, जैन धर्म में रक्षाबंधन का क्या महत्व है जैन धर्म में राखी क्यों मनाई जाती है? और क्या जैन धर्म में भी यह भाई के द्वारा बहन की रक्षा का पर्व यह भाई-बहन के रिश्ते तक ही सीमित है। जैन धर्म में रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? : त्याग और धर्म-रक्षा की कहानी यह उस समय की बात है, जब उज्जैन नगरी में राजा श्री वर्मा का शासन था। उनके चार मंत्री थे – बलि, नमुचि, प्रह्लाद और बृहस्पति। ये मंत्री जैन धर्म से द्वेष रखते थे, […] - [श्री मल्लिनाथ चालीसा - Shri Mallinath Chalisa](https://jinvani.in/shri-mallinath-chalisa/): Shri Mallinath Chalisa मोहमल्ल मद-मर्दन करते, मन्मथ दुर्द्धर का मद हरते ।। धैर्य खड्ग से कर्म निवारे, बालयति को नमन हमारे ।। बिहार प्रान्त ने मिथिला नगरी, राज्य करें कुम्भ काश्यप गोत्री ।। प्रभावती महारानी उनकी, वर्षा होती थी रत्नों की ।। अपराजित विमान को तजकर, जननी उदर वसे प्रभु आकर ।। मंगसिर शुक्ल एकादशी शुभ दिन, जन्मे तीन ज्ञान युन श्री जिन ।। पूनम चन्द्र समान हों शोभित, इन्द्र न्हवन करते हो मोहित ।। ताण्डव नृत्य करें खुश होकर, निररवें प्रभुकौ विस्मित होकर ।। बढे प्यार से मल्लि कुमार, तन की शोभा हुई अपार ।। पचपन सहस आयु प्रभुवर […] - [श्री पद्मप्रभु चालीसा - Shri Padamprabhu Chalisa](https://jinvani.in/shri-padamprabhu-chalisa/): श्री पद्मप्रभु चालीसा (Shri Padamprabhu Chalisa) जैन धर्म के छठे तीर्थंकर, भगवान पद्मप्रभु की भक्ति का एक अद्भुत स्रोत है। लाल कमल (Red Lotus) के समान आभा वाले भगवान पद्मप्रभु को शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। शीश नवा अर्हंत को सिद्धन करुं प्रणाम|उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम||सर्व साधु और सरस्वती जिन मन्दिर सुखकार|पद्मपुरी के पद्म को मन मन्दिर में धार|| जय श्रीपद्मप्रभु गुणधारी, भवि जन को तुम हो हितकारी |देवों के तुम देव कहाओ, पाप भक्त के दूर हटाओ || तुम जग में सर्वज्ञ कहाओ, छट्टे तीर्थंकर कहलाओ |तीन काल तिहुं जग को जानो, सब बातें […] - [શ્રી ભક્તામર સ્તોત્રમ્ - Bhaktamar Stotra in Gujarati](https://jinvani.in/bhaktamar-stotra-in-gujarati/): (વસંતતિલકાવૃતમ્) ભક્તામર પ્રણત મૌલિ મણિ પ્રભાણા- મુદ્યોતકં દલિત પાપ તમો વિતાનમ્ ; સમ્યક્ પ્રણમ્ય જિન પાદ યુગં-યુગાદા- વાલમ્બનં ભવ જલે પતતાં જનાનામ્.।।૧।। યઃ સંસ્તુતઃ સકલ વાડ્મય તત્વ બોધા- દુદભૂત બુદ્ધિ પટુભિઃ સુરલોક નાથૈઃ; સ્તોત્રૈ ર્જગત્ત્રિતય ચિત્ત હરૈ રુદારૈઃ- સ્તોષ્યે કિલાહ મપિ તં પ્રથમં જિનેન્દ્રમ્.।। ૨ ।। બુદ્ધયા વિનાપિ વિબુધા ર્ચિત પાદ પીઠ ! સ્તોતું સમુદ્યત મતિ ર્વિગત ત્રપોડહમ્; બાલં વિહાય જલ સંસ્થિત મિન્દુ બિમ્બ- મન્યઃ ક ઈચ્છતિ જનઃ સહસા ગ્રહીતુમ્.।। ૩ ।। વકતું ગુણાન્ ગુણ સમુદ્ર ! શશાંક-કાન્તાન્; કસ્તે ક્ષમઃ સુર ગુરુ પ્રતિમોડપિ બુદ્ધયા ?; કલ્પાન્ત કાલ પવનોદ્ધત નક્ર ચક્રં- કો વા તરીતુ મલ મમ્બુ નિધિં ભુજાભ્યામ્ ? ⁠।। ૪ ।। સોડહં તથાપિ તવ ભક્તિ વશાન્મુનીશ, […] - [Acharya Shri Vidya Sagar Ji Maharaj - Jivan Parichay](https://jinvani.in/acharya-shri-vidya-sagar-ji-maharaj-jivan-parichay/): (राष्ट्रसंत)आचार्य विद्यासागर का प्रारंभिक जीवन राष्ट्रसंत आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का जन्म कर्नाटक के बेलगाँव जिले के गाँव चिक्कोड़ी में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा), 10 अक्टूबर 1946 को हुआ था। पिता- श्री मल्लप्पाजी अष्टगे तथा माता- श्रीमती अष्टगे के आँगन में जन्मे विद्याधर (घर का नाम पीलू) को आचार्य श्रेष्ठ ज्ञानसागरजी महाराज का शिष्यत्व पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी अजमेर में आषाढ़ सुदी पंचमी विक्रम संवत्‌ २०२५ को लगभग २२ वर्ष की आयु में संयम धर्म के परिपालन हेतु उन्होंने पिच्छी कमंडल धारण करके मुनि दीक्षा धारण की थी। नसीराबाद (अजमेर) में गुरुवर ज्ञानसागरजी ने […] - [Bhagwan Sambhavnath(सम्भवनाथ)](https://jinvani.in/bhagwan-sambhavnath/): भगवान सम्भवनाथ का जीवन परिचय भगवान संभवनाथ(Sambhavnath) जी जैन धर्म के तृतीय तीर्थंकर थे। इनके पिता का नाम जितारी था तथा माता का नाम सुसेना था, प्रभु का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में मार्गशीर्ष चतुर्दशी को हुआ था। केवल ज्ञान की प्राप्ति उन्होंने दीक्षा लेकर मुक्ति के पथ पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया, ओर अपने पुत्र को अपने राज्य का संचालन करने के लिए कहा। हालाँकि शुरू में वह तैयार नहीं थे, लेकिन जब राजा ने जोर दिया तो उनके बेटे ने जिम्मेदारी ली और अपना राज्य उसे सौंप दिया। तब राजा ने श्री स्वयंप्रभा सूरि से दीक्षा ली। […] - [Bhagwan Aadinath (ऋषभदेव) जैन धर्म के पहले तीर्थंकर](https://jinvani.in/bhagwan-aadinath/): भगवान ऋषभदेव जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें। जो संसार सागर (जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। तीर्थंकर के पांच कल्याणक होते हैं। भगवान ऋषभनाथ जी को आदिनाथ भी कहा जाता है। भगवान ऋषभदेव वर्तमान हुडाअवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर हैं। भगवान ऋषभदेव का जन्म एक इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ था। उन्हें ऋषभनाथ, ऋषभदेव, आदिब्रह्मा, पुरुदेव और वृषभदेव भी कहा जाता है। भगवान आदिनाथ का जीवन परिचय भगवान आदिनाथ का जन्म (Rishabhdev) भगवान ऋषभनाथ का जन्म भारत के पावन शहर अयोध्या की भूमि पर हुआ था। वही अयोध्या भूमि जहाँ […] - [Diwali Poojan - दिवाली पूजा](https://jinvani.in/jain-diwali-poojan/): जैन मत में दीपावली के पावन पर्व पर धन-लक्ष्मी की बजाए ज्ञान-लक्ष्मी या वैराग्य-लक्ष्मी का पूजन अतिमहत्वपूर्ण माना गया है। इसके पीछे प्रमुख एवं मूलभूत कारण यह है कि दीपावली अर्थात कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के पश्चात अमावस्या की प्रातः स्वाति नक्षत्र उदित होने पर भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया। उनके कैवल्य ज्ञान को भगवान गौतम गणधर ने गृहीत कर भगवान महावीर के दिव्य संदेश का प्रकाशपुंज संसार में आलोकित किया, इसलिए ज्ञान-लक्ष्मी या वैराग्य-लक्ष्मी का पूजन प्रशस्त है। किंतु वर्तमान अर्थप्रधान युग में लक्ष्मी न केवल आवश्यक है वरन वांछनीय भी। अतः ज्ञान-लक्ष्मी, वैराग्य-लक्ष्मी व धन-लक्ष्मी का पूजन दीपावली […] - [Daslakshan Parva || दस लक्षण पर्व क्या है?](https://jinvani.in/daslakshan-parva-kya-hai/): दस लक्षण पर्व क्या है – What is Daslakshan Parva  दशलक्षण पर्व जैनों का सबसे महत्वपूर्ण एवं महान पर्व है। दशलक्षण पर्व हम लोक युगारंभ के उद्देश्य से मनाते है। जब पंचमकाल के बाद इस सृष्टि का प्रलय काल आएगा, सृष्टि विनष्ट होगी उसके बाद सुकाल के समय में 7 -7 दिन की 7 सुवृष्टियाँ होती हैं यानी 49 दिन होते हैं, वो 49 दिन आवण बढ़ी एकम से लेकर भादो चौध तक होते हैं और 50वें दिन से जब सृष्टि की शुरुआत हुई तो हमने उसे युगारंभ माना और उसकी शुरुआत हमने धर्म की सारी दुनिया में लोग अलग-अलग […] - [भक्तामर स्तोत्र की महिमा || BHAKTAMAR MAHIMA ||](https://jinvani.in/bhaktamar-stotra-mahima/): पं. हीरालाल जैन ‘कौशल’ श्री भक्तामर का पाठ, करो नित प्रातः। भक्ति मन लाई, सब संकट जाये नशाई॥ जो ज्ञान-मान-मतवारे थे, मुनि मानतुंग से हारे थे। उन चतुराई से नृपति लिया, बहकाई ॥ सब ॥१॥ मुनि जी को नृपति बुलाया था, सैनिक जा हुक्म सुनाया था। मुनि वीतराग को आज्ञा नहीं सुहाई ॥ सब ॥२॥ उपसर्ग घेर तब आया था, बलपूर्वक पकड़ मंगवाया था। हथकड़ी बेड़ियों से तन दिया बंधाई ॥ सब ॥३॥ मुनि काराग्रह भिजवाए थे, अड़तालीस ताले लगाये थे। क्रोधित नृप बहार पहरा दिया बिठाई ॥ सब ॥४॥ मुनि शान्तभाव अपनाया था, श्री आदिनाथ को ध्याया था। हो […] - [Acharya Vandana - जैन आचार्य वंदना](https://jinvani.in/acharya-vandana/): श्रीसिद्धभक्ति अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्रीसिद्धभक्तिकायोत्सर्गं कुर्वेऽहम्। (९ बार णमोकार ) सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं। अगुरुलहु-मव्वावाहं, अ_गुणा होंति सिद्धाणं॥ १॥ तवसिद्धे, णय-सिद्धे, संजम-सिद्धे, चरित्त-सिद्धे य। णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि॥ २॥ इच्छामि भंते। सिद्ध-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्म -णाण-सम्म-दंसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं, अ_विह-कम्म-विप्पमुक्काणं-अ_गुण-संपण्णाणं उड्ढलोय- मत्थयम्मि पइ_ियाणं तव-सिद्धाणं, णय-सिद्धाणं, संजम-सिद्धाणं,चरित्त-सिद्धाणं अतीदा-णागद-व_माण-कालत्तय-सिद्धाणं सव्वसिद्धाणं णिच्चकालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि, णमंसामि-दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं समाहिमरणं जिणगुण संपत्ति होउ मज्झं। श्रुत भक्ति अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकलकर्मक्षयार्थं,भाव-पूजा-वन्दनास्तव-समेतं श्रीश्रुतभक्तिकायोत्सर्गं कुर्वेऽहम्। (९ बार णमोकार) कोटिशतं द्वादश चैव कोट्यो, लक्षाण्यशीतिस्त्र््यऽधिकानि चैव। पञ्चाश-दष्टौ च सहस्रसंख्यमेतच्छुतं पञ्चपदं नमामि॥१॥ अरहंत-भासियत्थं-गणहर-देवेहिं गंथियं सम्मं पणमामि भत्ति-जुत्तो, सुद-णाणमहोवहिं सिरसा॥२॥ इच्छामि भंते ! सुदभत्ति-काउसग्गो कओ तस्सालोचेउं […] - [BARAH BHAVNA - बारह भावना(मंगतराय)](https://jinvani.in/barah-bhavna-mangatray/): वंदूँ श्री अरिहंतपद, वीतराग विज्ञान|वरणूँ बारह भावना, जग-जीवन-हित जान||१|| (विष्णुपद छंद) कहाँ गये चक्री जिन जीता, भरतखंड सारा|कहाँ गये वह राम-रु-लक्ष्मण, जिन रावण मारा||कहाँ कृष्ण-रुक्मिणि-सतभामा, अरु संपति सगरी|कहाँ गये वह रंगमहल अरु, सुवरन की नगरी ||२|| नहीं रहे वह लोभी कौरव, जूझ मरे रन में|गये राज तज पांडव वन को, अगनि लगी तन में||मोह-नींद से उठ रे चेतन, तुझे जगावन को|हो दयाल उपदेश करें गुरु, बारह-भावन को||३|| १. अनित्य भावना सूरज-चाँद छिपे-निकले, ऋतु फिर-फिर कर आवे|प्यारी आयु ऐसी बीते, पता नहीं पावे||पर्वत-पतित-नदी-सरिता-जल, बहकर नहिं डटता|स्वांस चलत यों घटे, काठ ज्यों आरे-सों कटता||४|| ओस-बूँद ज्यों गले धूप में, वा अंजुलि-पानी|छिन-छिन यौवन […] - [BARAH BHAVNA - बारह भावना(श्री भूध्ररदास)](https://jinvani.in/barah-bhavna/): कविश्री भूध्ररदास (अनित्य भावना) राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार|मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार ||१|| (अशरण भावना) दल-बल देवी-देवता, मात-पिता-परिवार|मरती-बिरिया जीव को, कोई न राखनहार ||२|| (संसार भावना) दाम-बिना निर्धन दु:खी, तृष्णावश धनवान|कहूँ न सुख संसार में, सब जग देख्यो छान ||३|| (एकत्व भावना) आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय|यों कबहूँ इस जीव को, साथी-सगा न कोय ||४|| (अन्यत्व भावना) जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय|घर-संपति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय ||५|| (अशुचि भावना) दिपे चाम-चादर-मढ़ी, हाड़-पींजरा देह|भीतर या-सम जगत् में, अवर नहीं घिन-गेह||६|| (आस्रव भावना) मोह-नींद के जोर, जगवासी घूमें सदा|कर्म-चोर चहुँ-ओर, सरवस लूटें […] - [भक्तामर स्तोत्र (भाषा) Bhaktamar Stotra Hindi](https://jinvani.in/bhaktamar-stotra-hindi/): श्री प. हेमराज जी आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार।धरम-धुरंधर परमगुरु, नमों आदि अवतार॥ सुर-नत-मुकुट रतन-छवि करैं,अंतर पाप-तिमिर सब हरैं।जिनपद बंदों मन वच काय,भव-जल-पतित उधरन-सहाय॥1॥ श्रुत-पारग इंद्रादिक देव,जाकी थुति कीनी कर सेव।शब्द मनोहर अरथ विशाल,तिस प्रभु की वरनों गुन-माल॥2॥ विबुध-वंद्य-पद मैं मति-हीन,हो निलज्ज थुति-मनसा कीन।जल-प्रतिबिंब बुद्ध को गहै,शशि-मंडल बालक ही चहै॥3॥ गुन-समुद्र तुम गुन अविकार,कहत न सुर-गुरु पावै पार।प्रलय-पवन-उद्धत जल-जन्तु,जलधि तिरै को भुज बलवन्तु॥4॥ सो मैं शक्ति-हीन थुति करूँ,भक्ति-भाव-वश कछु नहिं डरूँ।ज्यों मृगि निज-सुत पालन हेतु,मृगपति सन्मुख जाय अचेत॥5॥ मैं शठ सुधी हँसन को धाम,मुझ तव भक्ति बुलावै राम।ज्यों पिक अंब-कली परभाव,मधु-ऋतु मधुर करै आराव॥6॥ तुम जस जंपत जन छिनमाहिं,जनम-जनम […] - [श्रीमन्मानतुङ्गाचार्य कृत 'भक्तामरस्तोत्र' Bhaktamar Stotra Sanskrit](https://jinvani.in/bhaktamar-stotra/): श्रीमन्मानतुङ्गाचार्य कृत भक्तामर स्तोत्र, Jain dharm ke अद्भुत रत्नों में से एक है Shri Bhaktamar Stotra, जो Acharya Manatunga द्वारा Sanskrit भाषा में रचित एक अद्वितीय स्तोत्र माना जाता है. यह केवल कविता नहीं, बल्कि ek aisi spiritual sadhana hai, जिसमें श्रद्धा, विश्वास और आत्मबल का अनूठा संगम देखने को मिलता है. “भक्त” और “अमर”—इन दो शब्दों से बना ‘Bhaktamar’ literally means “Amar Bhakti wali Stuti”, जो विशेष रूप से भगवान Adinath (Rishabhdev) की महिमा का गुणगान करती है. Is stotra ka har ek shlok इतनी शक्ति और positivity से भरा है कि साधक को ना केवल मानसिक बल मिलता […] - [जैन स्तुति पाठ - Stuti Paath](https://jinvani.in/stuti-paath/): तुम तरणतारण भवनिवारण भविक मन आनन्दनो। श्रीनाभिनन्दन जगतवंदन आदिनाथ निरञ्जनो॥१॥ तुम आदिनाथ अनादि सेऊँ सेय पद पूजा करूँ। कैलाशगिरि पर रिषभ जिनवर पदकमल हिरदै धरूं॥२॥ तुम अजितनाथ अजीत जीते अष्टकर्म महाबली। यह विरद सुनकर सरन आयो कृपा कीज्यो नाथजी॥३॥ तुम चन्द्रवदन सु चन्द्रलच्छन चन्द्रपुरी परमेश्वरो। महासेननन्दन जगतवंदन चन्द्रनाथ जिनेश्वरो॥४॥ तुम शान्ति पाँच कल्याण पूजूं शुद्ध मन वच काय जू। दुर्भिक्ष चोरी पापनाशन विघन जाय पलाय जू॥५॥ तुम बालब्रह्म विवेकसागर भव्यकमल विकाशनो। श्री नेमिनाथ पवित्र दिनकर पापतिमिर विनाशनो॥६॥ जिन तजी राजुल राजकन्या कामसेन्या वश करी। चारित्ररथ चढ़ भये दूलह जाय शिवसुन्दरि वरी||७|| कंदर्प दर्प सु सर्पलच्छन कमठ शठ निर्मद कियो अश्वसेननन्दन […] - [विसर्जन पाठ(हिन्दी) - Visarjan Paath](https://jinvani.in/visarjan-paath/): दोहा बिन जाने वा जानके, रही टूट जो कोय। तुम प्रसाद तैं परमगुरु, सो सब पूरन होय॥ पूजनविधि जानूँ नहीं, नहिं जानूँ आह्वान। और विसर्जन हू नहीं, क्षमा करहु भगवान॥ मन्त्रहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव। क्षमा करहु राखहु मुझे, देहु चरण की सेव॥ आये जो जो देवगण, पूजे भक्ति प्रमान। ते अब जावहू कृपाकर, अपने – अपने थान॥ (निम्न श्लोक पढ़कर विसर्जन करना चाहिये) श्री जिनवर की आशिका, लीजे शीश चढ़ाय। भव-भव के पातक कटें, दुःख दूर हो जाय॥ (यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र जपना चाहिये) ***** दीपावली पूजन -विधि श्री महावीर स्वामी जी जिन पूजा श्री पार्श्वनाथ जिन […] - [श्री पंच परमेष्ठी पूजा (णमोकारमंत्रव्रतसहित्) | Shri Panch Parmesthi Puja](https://jinvani.in/shri-panch-parmesthi-puja/): समपदी चौपाई अरिहंतों को नमन हमारा, सिद्ध चक्र का जय-जयकारा । आचार्यों को वंदन प्यारा, पाठक मुनि का अर्चन न्यारा आह्वानन कर हृदय बिठाना, सन्निधि पाकर पूज रचाना। णमोकार व्रत एक सहारा, पापों से मिलता छुटकारा ओं ह्रीं णमोकारमंत्रस्थित –अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम्! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधीकरणम्! लय- नंदीश्वर पूजन आदर्श पंच गुरुराज, जल सम गुणकारी । अर्पित करते जल आज, भविजन हितकारी ॥ परमेष्ठी पन सुखकार शिव सुख साधक हैं । व्रत मंगलमय णमोकार, पाप विनाशक है ॥ ह्रीं णमोकारमंत्रस्थित अर्हदादिपंचपरमेष्ठिभ्यो नमः जलं निर्वपामीति स्वाहा। तुम वीतराग […] - [विनय पाठ || Vinay Path](https://jinvani.in/vinay-path/): इह विधि ठाडो होय के, प्रथम पढ़ै जो पाठ; धन्य जिनेश्वर देव तुम, नाशे कर्म जु आठ. |1| अनंत चतुष्टय के धनी, तुम ही हो सिरताज; मुक्ति-वधू के कन्त तुम, तीन भुवन के राज. |2| तिंहु जग की पीड़ा हरन, भवदधि-शोषणहार; ज्ञायक हो तुम विश्व के, शिव सुख के करतार. |3| हरता अघ अंधियार के, करता धर्म प्रकाश; थिरता पद दातार हो, धरता निजगुण रास. |4| धर्मामृत उर जल धिसों, ज्ञान भानु तुम रूप; तुमरे चरण सरोज को, नावत तिंहु जग भूप. |5| मैं बंदौ जिन देव को, कर अति निर्मल भाव; कर्म बंध के छेदने, और न कछू उपाव.|6| […] - [जिन शान्तिधारा || Shantidhara](https://jinvani.in/shantidhara/): ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय-द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ओं ह्रीं क्रों अस्माकं पापं खण्डय खण्डय जहि-जहि दह-दह पच-पच पाचय पाचय ओं नमो अर्हन् झं झ्वीं क्ष्वीं हं सं झं वं ह्व: प: ह: क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्ष: क्ष्वीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रैं ह्रों ह्रौं ह्रं ह्र: द्रां द्रीं द्रावय द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ठ: ठ: अस्माकं ———– श्रीरस्तु वृद्धिरस्तु तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु शान्तिरस्तु कान्तिरस्तु कल्याणमस्तु स्वाहा। एवं अस्माकं ———— कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वविघ्न-निवारणार्थं श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञपरमेष्ठि-परमपवित्राय […] - [माघनन्दिमुनिकृताभिषेक-पाठ](https://jinvani.in/maghanandimuni-kritabhishek/): श्रीमन्नतामरशिरस्तट-रत्न-दीप्ति-तोयावभासि-चरणाम्बुज-युग्ममीशम् अर्हन्तमुन्नत-पद-प्रदमाभिनम्य, तन्मूर्तिषूद्यदभिषेक-विधिं करिष्ये ॥१॥अथ पौर्वाह्णिकदेव-वन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा- वन्दनास्तव-समेतं श्रीपञ्चगुरुभक्ति-पुरस्सरं कायोत्सर्गं करोम्यहम् ( यह पढ़कर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ें)याः कृत्रिमास्तदितराः प्रतिमा जिनस्य, संस्नापयन्ति पुरुहूत-मुखादयस्ताः । सद्भाव-लब्धि समयादि-निमित्तयोगात्, तत्रैवमुज्ज्वलधिया कुसुमं क्षिपामि ||२|| (यह पढ़कर थाली में पुष्पाञ्जलि छोड़कर अभिषेक की प्रतिज्ञा करें।) श्रीपीठक्लृप्ते विशदाक्षतौघैः, श्रीप्रस्तरे पूर्णशशाङ्क कल्पे । श्रीवर्तके चन्द्रमसीति वार्तां सत्यापयन्तीं श्रियमालिखामि ||३||ॐ ह्रीं अर्ह श्रीकारलेखनं करोमि । कनकाद्रि-निभं कम्रं पावनं पुण्यकारणम् । स्थापयामि परं पीठं जिनस्नपनाय भक्तितः ॥|४||ॐ ह्रीं श्रीपीठस्थापनं करोमि ।( यह पढ़कर अभिषेक की थाली में सिंहासन स्थापित करें ) भृङ्गार- चामर- सुदर्पण -पीठ- कुम्भ-ताल-ध्वजातप- निवारक – भूषिताग्रे वर्धस्व-नन्द-जय-पाठपदावलीभिः, सिंहासने जिन ! भवन्तमहं श्रयामि ||५|| […] - [णामोकार महामंत्र पूजा || Namokar MahaMantra Puja](https://jinvani.in/namokar-mahamantra-puja/): आर्यिका ज्ञानमति माता जी गीता छन्दअनुपम अनादि अनंत है, यह मंत्रराज महान् है |सब मंगलों में प्रथम मंगल, करता अघ की हान है ||अरिहन्त सिद्धाचार्य पाठक, साधुओं की वंदना |इस शब्दमय परब्रह्म को, थापूँ करूँ नित अर्चना ||१||          ओं ह्रीं श्री अनादिऽनिधनपंचनमस्कारमंत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)ओं ह्रीं श्री अनादिऽनिधन पंचनमस्कारमंत्र ! अत्रा तिष्ट तिष्ट ठ: ठ: (स्थापनम्)                     ओं ह्रीं श्री अनादिऽनिधन पंचनमस्कारमंत्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) अथाष्टक (भुजंगप्रयात छन्द)महातीर्थ  गंगा नदी  नीर लाऊँ |महामंत्र की नित्य पूजा  रचाऊँ ||णमोकार  मंत्राक्षरों  को  […] - [देव शास्त्र गुरु पूजा - 1 || Dev Shastra Guru Puja](https://jinvani.in/dev-shastra-guru-puja/): जिनगीतिका शुचि ध्यान से  त्रेसठ  प्रकृति  हन,  वीतरागी हो गये, दृग ज्ञान सुख वीरज चतुष्टय, गुण अनंत  निजी  लिये। तीर्थेश बन उपदेश दे, अनगिन भविक निज सम किये, जिनदेव  श्रुत  गुरु  बोध  डालो, आज  मेरे  भी  हिये ॥ ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरु समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ! सदृष्टि बिन जन्मान्ध जैसा, जन्म वन भ्रमता फिरा, शिवराह  बिन  गुमराह होता, दुःख  सहता मैं निरा वसु अंग युत सम्यक्त्व पाने, भक्ति जल मन में भरूँ, जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरू ॥ ओं […] - [श्री देव शास्त्र गुरु पूजा || Dev Shastra Guru Pooja](https://jinvani.in/dev-shastra-guru-pooja/): Jain Pooja Dev Shastra Guru केवल-रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अन्तर, उस श्री जिनवाणी में होता, तत्त्वों का सुंदरतम दर्शन । सद्दर्शन-बोध-चरण-पथ पर, अविरल जो बढ़ते हैं मुनिगण, उन देव परम आगम गुरु को, शत शत वंदन शत शत वंदन ॥         ॐ ह्रीं श्री देव शाष्त्र गुरुसमूह अत्र अवतर २ सम्वौषट आव्हानं ॐ ह्रीं श्री देव शाष्त्र गुरुसमूह अत्र तिष्ठ २ ठः २ स्थापनं     ॐ ह्रीं श्री देव शाष्त्र गुरुसमूह अत्र मम संहितो भव २ वषट इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यामयी कंचन काया । यह सब कुछ जड़ की क्रीडा […] - [देवशास्त्र गुरु पूजन(प्रथम देव अरहंत) || Dev Shastra Guru Pujan](https://jinvani.in/dev-shastra-guru-pujan/): पं. द्यानतराय अडिल्ल प्रथम देव अरहंत सुश्रुत सिद्धान्त जू गुरु निर्ग्रथ महंत मुकतिपुर-पंथ जू । तीन रतन जगमाँहिं सु “ये भवि ध्याइये, तिनकी भक्ति प्रसाद परम पद पाइये ॥ दोहा पूजों पद अरहंत के, पूजों गुरुपद सार । पूजों देवी सरस्वती, नित प्रति अष्ट प्रकार ।। ॐ ह्रीं श्रीदेव-शास्त्र-गुरुसमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीदेव-शास्त्र- गुरुसमूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीदेव-शास्त्र-गुरुसमूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् । हरिगीतिका छन्द सुरपति उरग नरनाथ तिन-करि, वन्दनीक सुपदप्रभा, अति शोभनीक सुवरण उज्ज्वल, देख छवि मोहित सभा। वर नीर क्षीर-समुद्र घट भरि, अग्र तसु बहु […] - [दर्शन-स्तुति (प्रभु पतित-पावन) || Darshan Stuti](https://jinvani.in/darshan-stuti-pati/): कविवर बुधजन प्रभु पतित-पावन मैं अपावन चरन आयो सरन जी, यों विरद आप निहार स्वामी मेंट जामन मरन जी। तुम ना पिछान्यो आन मान्यो देव विविध प्रकार जी, या बुद्धि सेती निज न जान्यो भ्रम गिन्यो हितकार जी ॥१॥ भव-विकट-वन में करम वैरी ज्ञान-धन मेरो हर्यो, तब इष्ट भूल्यो भ्रष्ट होय अनिष्ट गति धरतो फिर्यो । धन घड़ी यों धन दिवस यों ही धन जनम मेरो भयो, अब भाग मेरो उदय आयो दरस प्रभु जी को लख लयो ॥२॥ छबि वीतरागी नगन मुद्रा दृष्टि नासा पै धरैं, वसु प्रातिहार्य अनन्त गुणजुत कोटि रवि – छबि को हरैं । मिट गयो […] - [दर्शन पच्चीसी(तुम निरखत) || Darshan Pacchisi](https://jinvani.in/darshan-pacchisi/): तुम निरखत मोकों मिली, मेरी सम्पति आज। कहाँ चक्रवति-संपदा कहाँ स्वर्ग-साम्राज ॥१॥ तुम वन्दत जिनदेव जी, नित नव मंगल होय। विघ्न कोटि ततछिन टरैं, लहहि सुजस सब लोय ॥२॥ तुम जाने बिन नाथ जी, एक स्वास के माँहि। जन्म-मरण अठदस किये, साता पाई नाहि ॥३॥ आप बिना पूजत लहे, दुःख नरक के बीच। भूख प्यास पशुगति सही, कर्यो निरादर नीच ||४|| नाम उचारत सुख लहै, दर्शनसों अघ जाय। पूजत पावै देव पद, ऐसे हैं जिनराय ||५|| चंदत हूँ जिनराज मैं, धर उर समताभाव।  तन-धन-जन जगजाल तैं धर विरागता भाव || ६ || सुनो अरज हे नाथ जी, त्रिभुवन के आधार। […] - [Mangal Gaan || मंगल गान(आचार्य श्री विधासागर द्वारा रचित)](https://jinvani.in/mangal-gaan/): मंगल गान (आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी द्वारा रचित) हे ! शान्त सन्त अरहन्त अनन्त ज्ञाता, हे ! शुद्ध-बुद्ध जिन सिद्ध अबद्ध धाता। आचार्यवर्य उवझाय सुसाधु सिन्धु, मैं बार-बार तुम पाद – पयोज बन्दूँ ।। १॥ है मूलमंत्र नवकार सुखी बनाता, जो भी पढ़े विनय से अघ को मिटाता। है आद्य मंगल यही सब मंगलों में, ध्याओ इसे न भटको जग-जंगलों में ।। २ ।। सर्वज्ञदेव अरहन्त परोपकारी, श्री सिद्ध वन्द्य परमातम निर्विकारी। श्री केवली कथित आगम साधु प्यारे, ये चार मंगल, अमंगल को निवारे ।। ३ ।। श्री वीतराग अरहन्त कुकर्मनाशी, श्री सिद्ध शाश्वत सुखी शिवधाम वासी। श्री केवली […] - [दर्शन - स्तुति (अति पुण्य) || Darshan Stuti](https://jinvani.in/darshan-stuti-ati/): सखी अति पुण्य उदय मम आया, प्रभु तुमरा दर्शन पाया। अब तक तुमको बिन जाने, दुख पाये निज गुण हाने। हरिगीतिका पाये अनन्ते दुःख अब तक, जगत को निज जानकर। सर्वज्ञ भाषित जगत हितकर, धर्म नहिं पहिचान कर॥ भव बंधकारक सुख प्रहारक, विषय में सुख मानकर। निज पर विवेचक ज्ञानमय, सुखनिधि सुधा नहिं पानकर ॥१॥ सखी- हरिगीतिका तव पद मम उर में आये, लखि कुमति विमोह पलाये। निज ज्ञान कला उर जागी, रुचि पूर्ण स्वहित में लागी॥ रुचि लगी हित में आत्म के, सतसंग में अब मन लगा। मन में हुई अब भावना, तव भक्ति में जाऊँ रँगा॥ प्रिय वचन […] - [दर्शन पाठ(दर्शनं देवदेवस्य) || Darshan Paath Sanskrit](https://jinvani.in/darshan-paath/): दर्शनं  देवदेवस्य  दर्शनं  पापनाशनम् दर्शनं स्वर्गसोपानं दर्शनं मोक्षसाधनम् ||१|| दर्शनेन  जिनेन्द्राणां  साधूनां  वन्दनेन च। न चिरं तिष्ठते पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम् ॥२॥ वीतराग  मुखं  दृष्ट्वा,  पद्म-राग-  समप्रभम्। जन्म-जन्म कृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति ||३|| दर्शनं  जिनसूर्यस्य,  संसारध्वान्त- नाशनम्। बोधनं चित्तपद्मस्य, समस्तार्थ- प्रकाशनम् ||४|| दर्शनं  जिनचन्द्रस्य,  सद्धर्मामृत- वर्षणम्। जन्मदाह विनाशाय, वर्धनं सुखवारिधेः ॥५॥ जीवादितत्त्वप्रतिपादकाय, सम्यक्त्वमुख्याष्ट-गुणार्णवाय’। प्रशान्तरूपाय दिगम्बराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय ||६॥ चिदानन्दैक-रूपाय,  जिनाय  परमात्मने। परमात्म-प्रकाशाय, नित्यं सिद्धात्मने नमः ॥७॥ अन्यथा  शरणं  नास्ति, त्वमेव  शरणं  मम। तस्मात् कारुण्यभावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर ! ॥८॥ न हि त्राता न हि त्राता, न हि त्राता जगत्त्रये। वीतरागात् परो देवो, न भूतो न भविष्यति ॥९॥ जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्जिने […] - [णमोकार महामन्त्र || Namokar Mantra in Hindi Meaning](https://jinvani.in/namokar-mantra/): Namokar Mantra Hindi Meaning णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं॥ ‘चत्तारि मंगलं अरहंत मंगलं सिद्ध मंगलं साहु मंगलं केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा अरहंत लोगुत्तमा सिद्ध लोगुत्तमा साहु लोगुत्तमा केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि अरहंत सरणं पव्वज्जामि सिद्ध सरणं पव्वज्जामि साहु सरणं पव्वज्जामि केवलिपण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि। एसो पंच णमोयारो, सव्वपावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं होइ मंगलं॥ णमोकार महामन्त्र हिन्दी, Namokar Mantra in Hindi नमो अरिहंताणम मैं उस प्रभु को नमन करता हूं, जिसने सभी दुश्मनों का नाश कर दिया है, क्रोध-मान-माया-लोभ, राग-द्वेष, रूपी दुश्मनों का नाश कर दिया है । नमो सिद्धाणं मैं […] - [जैन स्तोत्र - सुप्रभात स्तोत्रम् || Suprabhat Stotram](https://jinvani.in/suprabhat-stotram/): शार्दूलविक्रीडितम् यत्स्वर्गावतरोत्सवे यदभवज्जन्माभिषेकोत्सवे,यद्दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिलज्ञानप्रकाशोत्सवे ।यन्निर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः, पूजाद्भुतं तद्भवैः,सङ्गीतस्तुतिमङ्गलैः प्रसरतां, मे सुप्रभातोत्सवः ॥१॥ वसन्ततिलकाछन्दः श्रीमन्- नतामर – किरीट-मणिप्रभाभि- रालीढपाद-युग ! दुर्द्धर-कर्मदूर ।श्रीनाभिनन्दन ! जिनाजित! शम्भवाख्य !त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ॥२॥छत्रत्रय-प्रचल-चामर- वीज्यमान ! देवाभिनन्दनमुने ! सुमते ! जिनेन्द्र ! पद्मप्रभारुणमणि-द्युति-भासुराङ्ग !त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ॥३॥ अर्हन्! सुपार्श्व! कदली-दलवर्ण-गात्र, प्रालेय-तारगिरि-मौक्तिक-वर्णगौर !चन्द्रप्रभ ! स्फटिक-पाण्डुर-पुष्पदन्त !त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ॥४॥ब्र. जयकुमार निशांत ब्र. जिनेश मलैयासंतप्त काञ्चनरुचे! जिनशीतलाख्य !श्रेयन् ! विनष्ट-दुरिताष्ट-कलङ्क-पङ्क !बन्धूक-बन्धुररुचे! जिनवासुपूज्य !त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ||५||उद्दण्ड-दर्पक-रिपो ! विमलामलाङ्ग !,स्थेमन्ननन्तजिदनन्त-सुखाम्बुराशे !दुष्कर्म – कल्मष – विवर्जित-धर्मनाथ ! त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ||६||देवामरी – कुसुम-सन्निभ-शान्तिनाथ !कुन्थो ! दयागुण-विभूषण-भूषिताङ्ग ! देवाधिदेव ! भगवन्नर-तीर्थनाथ !त्वद्ध्यानतोऽस्तु सततं मम सुप्रभातम् ॥७॥ […] - [प्रातः कालीन स्तुति || Prat Kaleen Stuti](https://jinvani.in/prat-kaleen-stuti/): प्रातः कालीन स्तुति वीतराग सर्वज्ञ हितङ्कर, भविजन की अब पूरी आश।ज्ञानभानु का उदय करो मम, मिथ्यातम का होय विनाश।।जीवों की हम करुणा पाल, झूठ वचन नहि कह कदा। परधन कबहूँ न हरहूँ स्वामी, ब्रह्मचर्य व्रत रखें सदा।।तृष्णा लोभ बढ़े न हमारा, तोष सुधा नित पिया करें।श्रीजिन धर्म हमारा प्यारा, तिसकी सेवा किया करें।।दूर भगावें बुरी रीतियाँ, सुखद रीति का करें प्रचार।मेल मिलाप बढावे हम सब, धर्मोन्नति का करें प्रसार।।सुख-दुख में हम समता धारें, रहें अचल जिमि सदा अटल।न्यायमार्ग को लेश न त्यागें, वृद्धि करें निज आतमबल।।अष्ट कर्म जो दुख हेतु हैं, तिनके क्षय का करें उपाय।नाम आपका जपें निरन्तर, विघ्न […] - [श्री मंगलाष्टक स्तोत्रं(अर्थ के साथ) || Shri Mangalashtak Stotram](https://jinvani.in/shri-mangalashtak-stotram/): मंगलाष्टक स्तोत्र जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, शक्तिशाली और प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसका पाठ प्रायः हर शुभ अवसर, विशेष रूप से पंचकल्याणक, तीर्थंकर जन्मोत्सव, और पूजा आयोजनों में किया जाता है। यह स्तोत्र सिर्फ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि हर श्लोक में ऐसा आध्यात्मिक प्रभाव है जो जीवन में मंगलमयता और सकारात्मकता लाता है। मंगलाष्टक स्तोत्र की विशिष्टता इस स्तोत्र में पंच परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) एवं चौबीस तीर्थंकरों समेत जैन धर्म के साठ-तीन महापुरुषों का गुणगान किया गया है। ऐसा माना जाता है कि मंगलाष्टक स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति को मानसिक बल, आध्यात्मिक शुद्धता और […] - [श्री महावीर चालीसा - Shri Mahaveer Chalisa](https://jinvani.in/shri-mahaveer-chalisa/): महावीर चालीसा जैन धर्म में विशेष स्थान रखता है। महावीर चालीसा भगवान महावीर स्वामी के प्रति भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने वाला एक लोकप्रिय स्तोत्र है। यह चालीसा जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जीवन, उनकी शिक्षाओं और उनके आदर्शों का वर्णन करती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आंतरिक शुद्धता और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। महावीर स्वामी ने अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और अचौर्य जैसे पंचमहाव्रतों का प्रचार किया। महावीर चालीसा में उनके इन्हीं गुणों और उपदेशों को सरल शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। यह चालीसा भक्तों को उनके आदर्श जीवन का अनुसरण करने […] - [श्री आदिनाथ चालीसा - Shri Aadinath Chalisa](https://jinvani.in/shri-aadinath-chalisa/): शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन को, करुं प्रणाम | उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम || सर्व साधु और सरस्वती जिन मन्दिर सुखकार | आदिनाथ भगवान को मन मन्दिर में धार || -: चौपाई :- जै जै आदिनाथ जिन स्वामी, तीनकाल तिहूं जग में नामी | वेष दिगम्बर धार रहे हो, कर्मों को तुम मार रहे हो || हो सर्वज्ञ बात सब जानो सारी दुनियां को पहचानो | नगर अयोध्या जो कहलाये, राजा नाभिराज बतलाये || मरुदेवी माता के उदर से, चैत वदी नवमी को जन्मे | तुमने जग को ज्ञान सिखाया, कर्मभूमी का बीज उपाया || कल्पवृक्ष जब लगे बिछरने, जनता […] - [श्री नमिनाथ चालीसा - Shri Naminath Chalisa](https://jinvani.in/shri-naminath-chalisa/): श्री नमिनाथ चालीसा सतत पूज्यनीय भगवान, नमिनाथ जिन महिभावान । भक्त करें जो मन में ध्याय, पा जाते मुक्ति-वरदान । जय श्री नमिनाथ जिन स्वामी, वसु गुण मण्डित प्रभु प्रणमामि । मिथिला नगरी प्रान्त बिहार, श्री विजय राज्य करें हितकर । विप्रा देवी महारानी थीं, रूप गुणों की वे खानि थीं । कृष्णाश्विन द्वितीया सुखदाता, षोडश स्वप्न देखती माता । अपराजित विमान को तजकर, जननी उदर वसे प्रभु आकर । कृष्ण असाढ़- दशमी सुखकार, भूतल पर हुआ प्रभु- अवतार । आयु सहस दस वर्ष प्रभु की, धनु पन्द्रह अवगाहना उनकी । तरुण हुए जब राजकुमार, हुआ विवाह तब आनन्दकार । […] - [श्री नेमिनाथ चालीसा - Shri Neminath Chalisa](https://jinvani.in/shri-neminath-chalisa/): Shri Neminath Chalisa श्री जिनवाणी शीश धार कर, सिध्द प्रभु का करके ध्यान । लिखू नेमि- चालीसा सुखकार, नेमिप्रभु की शरण में आन । समुद्र विजय यादव कूलराई, शौरीपुर राजधानी कहाई । शिवादेवी उनकी महारानी , षष्ठी कार्तिक शुक्ल बरवानी । सुख से शयन करे शय्या पर, सपने देखें सोलह सुन्दर । तज विमान जयन्त अवतारे, हुए मनोरथ पूरण सारे । प्रतिदिन महल में रतन बरसते, यदुवंशी निज मन में हरषते । दिन षष्ठी श्रावण शुक्ला का, हुआ अभ्युदय पुत्र रतन का । तीन लोक में आनन्द छाया, प्रभु को मेरू पर पधराश । न्हवन हेतु जल ले क्षीरसागर, मणियो […] - [Shri Chandraprabhu Chalisa - श्री चन्द्रप्रभु चालीसा](https://jinvani.in/shri-chandraprabhu-chalisa/): श्री चन्द्रप्रभु चालीसा वीतराग सर्वज्ञ जिन, जिन वाणी को ध्याय | लिखने का साहस करुं, चालीसा सिर नाय |1| देहरे के श्रीचन्द्र को, पूजौं मन वच काय | ऋद्धि सिद्धि मंगल करें, विघ्न दूर हो जाय |2| जय श्रीचन्द्र दया के सागर, देहरे वाले ज्ञान उजागर |3| शांति छवि मूरति अति प्यारी, भेष दिगम्बर धारा भारी |4| नासा पर है दृष्टि तुम्हारी, मोहनी मूरति कितनी प्यारी |5| देवों के तुम देव कहावो, कष्ट भक्त के दूर हटावो |6| समन्तभद्र मुनिवर ने ध्याया, पिंडी फटी दर्श तुम पाया |7| तुम जग में सर्वज्ञ कहावो, अष्टम तीर्थंकर कहलावो |8| महासेन के राजदुलारे, […] - [श्री मुनिसुव्रतनाथ चालीसा - Shri Munisuvrath Chalisa](https://jinvani.in/shri-munisuvrath-chalisa/): Shri Munisuvrath Chalisa अरिहंत सिद्ध आचार्य को करुं प्रणाम | उपाध्याय सर्वसाधू करते स्वपर कल्याण || जिनधर्म, जिनागम, जिनमंदिर पवित्र धाम | वीतराग की प्रतिमा को कोटि-कोटि प्रणाम || जय मुनिसुव्रत दया के सागर | नाम प्रभु का लोक उजागर || सुमित्रा राजा के तुम नन्दा | मां शामा की आंखो के चन्दा || श्यामवर्ण मूरत प्रभू की प्यारी | गुणगान करें निशदिन नर नारी || मुनिसुव्रत जिन हो अन्तरयामी | श्रद्धा भाव सहित तुम्हें प्रणामी || भक्ति आपकी जो निशदिन करता | पाप ताप भय संकट-हरता || प्रभू ; संकटमोचन नाम तुम्हारा | दीन दुखी जीवों का सहारा || कोई दरिद्री […] - [भगवान शान्तिनाथ(Shantinath)](https://jinvani.in/bhagwan-shantinath/): तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ का जीवन परिचय शांतिनाथ(Shantinath) का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुआ था। तब भरणी नक्षत्र था। उनके पिता का नाम विश्वसेन था, जो हस्तिनापुर के राजा थे और माता का नाम महारानी ऐरा था। जैन ग्रंथो में शांतिनाथ को कामदेव जैसा स्वरुपवान बताया गया है। पिता के बाद शांतिनाथ हस्तिनापुर के राजा बने। जैन ग्रन्थो के अनुसार उनकी ९६ हजार रानियां थीं। भगवान की यौवन अवस्था आने पर उनके पिता ने कुल, रूप, अवस्था, शील, कान्ति आदि से विभूषित अनेक कन्याओं के साथ उनका विवाह कर दिया। इस तरह भगवान के जब कुमार काल के पच्चीस हजार वर्ष […] - [भगवान कुंथुनाथ(Kunthunath)](https://jinvani.in/bhagwan-kunthunath/): तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ का जीवन परिचय कुन्थुनाथ जी(Kunthunath) जैनधर्म के सत्रहवें तीर्थंकर हैं। इनका जन्म हस्तिनापुर में हुआ था। पिता का नाम शूरसेन (सूर्य) और माता का नाम श्रीकांता (श्री देवी) था। बिहार में पारसनाथ पर्वत के सम्मेद शिखर पर इन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। प्रभु कुंथुनाथ जी जैन धर्म के 17वें तीर्थंकर हैं। प्रभु कुंथुनाथ जी का जन्म वैशाख कृष्ण प्रतिपदा को हस्तिनापुर में हुआ था। उनके पिता का नाम शूरसेन और माता का नाम श्री कांता था। प्रभु की देह का रंग स्वर्ण के समान था , प्रभु थुनाथ जी का प्रतीक बक कुंरा था । भगवान कुंथुनाथ का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह  बकरा है। जन्म स्थान – हस्तिनापुर […] - [भगवान अरनाथ(Arnath)](https://jinvani.in/bhagwan-arnath/): तीर्थंकर भगवान अरनाथ(Arnath) का जीवन परिचय केवल ज्ञान की प्राप्ति भगवान अरनाथ का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह मछली है। जन्म स्थान – हस्तिनापुर (जि. मेरठ) जन्म कल्याणक – मगसिर शु.१४ केवल ज्ञान स्थान – कार्तिक शु. १२, सहेतुक वन दीक्षा स्थान – सहेतुक वन हस्तिनापुर पिता – महाराजा सुदर्शन माता – महारानी मित्रसेना देहवर्ण – तप्त स्वर्ण सदृश मोक्ष – चैत्र कृ. अमावस्या, सम्मेद शिखर पर्वत भगवान का वर्ण – क्षत्रिय (इश्वाकू वंश) लंबाई/ ऊंचाई- 30 धनुष आयु – ८४ हज़ार वर्ष वृक्ष –  आम्र वृक्ष यक्ष – श्री महेन्द्र देव यक्ष यक्षिणी – श्री विजया देवी यक्षी प्रथम गणधर […] - [भगवान मल्लिनाथ(Mallinath)](https://jinvani.in/bhagwan-mallinath/): तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ का जीवन परिचय मल्लिनाथ जी(Bhagwan Mallinath) उन्नीसवें तीर्थंकर है। जिन धर्म भारत का प्राचीन सम्प्रदाय हैं जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर भगवान श्री मल्लिनाथ जी का जन्म मिथिलापुरी के इक्ष्वाकुवंश में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को अश्विन नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम माता रक्षिता देवी और पिता का नाम राजा कुम्भराज था। इनके शरीर का वर्ण नीला था जबकि इनका चिन्ह कलश था। इनके यक्ष का नाम कुबेर और यक्षिणी का नाम धरणप्रिया देवी था। जैन धर्मावलम्बियों के अनुसार भगवान श्री मल्लिनाथ जी स्वामी के गणधरों की कुल संख्या 28 थी, जिनमें अभीक्षक स्वामी इनके […] - [भगवान नमिनाथ(Naminath)](https://jinvani.in/bhagwan-naminath/): तीर्थंकर भगवान नमिनाथ का जीवन परिचय नमिनाथ जी(Bhagwan Naminath) जैन धर्म के इक्कीसवें तीर्थंकर हैं। उनका जन्म मिथिला के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजपरिवार में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अश्विनी नक्षत्र में हुआ था। इनकी माता का नाम विप्रा रानी देवी और पिता का राजा विजय था केवल ज्ञान की प्राप्ति भगवान ने वकुलवृक्ष के नीचे बैठकर मगसिर शु. ११ के दिन सायंकाल में केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया। भगवान नमिनाथ का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह नील कमल है। जन्म स्थान –मिथिलानगरी जन्म कल्याणक – आषाढ़ कृ.१० केवल ज्ञान स्थान – मगसिर शु. ११, चैत्रवन […] - [तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ(Neminath)](https://jinvani.in/bhagwan-neminath/): तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ का जीवन परिचय भगवान श्री अरिष्टनेमी(Bhagwan Neminath) अवसर्पिणी काल के बाईसवें तीर्थंकर हुए। इनसे पूर्व के इक्कीस तीर्थंकरों को प्रागैतिहासिककालीन महापुरुष माना जाता है। आधुनिक युग के अनेक इतिहास विज्ञों ने प्रभु अरिष्टनेमि को एक ऐतिहासिक महापुरुष के रूप में स्वीकार किया है। भगवान अरिष्टनेमि का जन्म यदुकुल के ज्येष्ठ पुरूष दशार्ह-अग्रज समुद्रविजय की भार्या शिवा देवी की रत्नकुक्षी से श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन हुआ। समुद्रविजय शौर्यपुर के शासक थे। जरासंध से विवाद के कारण समुद्रविजय यदुवंशी परिवार सहित सौराष्ट्र प्रदेश में समुद्र तट के निकट द्वारिका नामक नगरी बसाकर रहने लगे। श्रीकृष्ण के नेतृत्व में […] - [श्री वासुपूज्य चालीसा - Shri Vasupujya Chalisa](https://jinvani.in/shri-vasupujya-chalisa/): Shri Vasupujya Chalisa बासु पूज्य महाराज का चालीसा सुखकार । विनय प्रेम से बॉचिये करके ध्यान विचार । जय श्री वासु पूज्य सुखकारी, दीन दयाल बाल ब्रह्मचारी । अदभुत चम्पापुर राजधानी, धर्मी न्यायी ज्ञानी दानी । वसू पूज्य यहाँ के राजा, करते राज काज निष्काजा । आपस मेँ सब प्रेम बढाने, बारह शुद्ध भावना भाते । गऊ शेर आपस ने मिलते, तीनों मौसम सुख मेँ कटते । सब्जी फल घी दूध हों घर घर, आते जाते मुनी निरन्तर । वस्तु समय पर होती सारी, जहाँ न हों चोरी बीमारी । जिन मन्दिर पर ध्वजा फहरायें, घन्टे घरनावल झन्नायेँ । शोभित […] - [भगवान मुनिसुव्रतनाथ(Munisubratnath)](https://jinvani.in/bhagwan-munisubratnath/): तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ का जीवन परिचय मुनिसुव्रतनाथ(Bhagwan Munisubratnath) या मुनिसुव्रत जैन धर्म के २० वें तीर्थंकर माने गए हैं। उनके पिता का नाम सुमित्र और माता का नाम पद्यावती था। ये भगवान राम के समकालीन माने गये हैं। उनका जन्म राजगृह (राजगिर) मे हुआ था।  केवल ज्ञान की प्राप्ति एक वर्ष बीत जाने पर नील वन में चंपक वृक्ष के नीचे पौष शु. १५ के दिन केवलज्ञान को प्राप्त हो गये। भगवान मुनिसुव्रतनाथ का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह  कछुआ है। जन्म स्थान –राजगृही (जिला नालंदा) जन्म कल्याणक – कार्तिक शु० पू० केवल ज्ञान स्थान – पौष शु. १५, नील […] - [भगवान धर्मनाथ(Dharmnath)](https://jinvani.in/bhagwan-dharmnath/): तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ का जीवन परिचय पूर्व धातकीखंडद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में नदी के दक्षिण तट पर एक वत्स नाम का देश है, उसमें सुसीमा नाम का महानगर है। वहाँ पर राजा दशरथ राज्य करता था। एक बार वैशाख शुक्ला पूर्णिमा के दिन सब लोग उत्सव मना रहे थे उसी समय चन्द्रग्रहण पड़ा देखकर राजा दशरथ का मन भोगों से विरक्त हो गया। उसने दीक्षा लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करके अन्त में सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हो गया। केवल ज्ञान की प्राप्ति तदनन्तर छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर दीक्षावन में सप्तच्छद […] - [भगवान अनन्तनाथ(Anantnath)](https://jinvani.in/bhagwan-anantnath/): तीर्थंकर भगवान अनन्तनाथ का जीवन परिचय धातकीखंडद्वीप के पूर्व मेरू से उत्तर की ओर अरिष्टपुर नगर में पद्मरथ राजा राज्य करता था। किसी दिन उसने स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के समीप जाकर वंदना-भक्ति आदि करके धर्मोपदेश सुना और विरक्त हो दीक्षा ले ली। ग्यारह अंगरूपी सागर का पारगामी होकर तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अन्त में सल्लेखना से मरण कर अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में इन्द्रपद प्राप्त किया। केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थावस्था के दो वर्ष बीत जाने पर चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन केवलज्ञान उत्पन्न हो गया। भगवान अनन्तनाथ का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह सेही है। जन्म स्थान […] - [भगवान विमलनाथ(Vimalnath)](https://jinvani.in/bhagwan-vimalnath/): तीर्थंकर भगवान विमलनाथ का जीवन परिचय रानी जयश्यामा ने ज्येष्ठ कृ.१० के दिन उस आरणेन्द्र को गर्भ में धारण किया एवं माघ शुक्ल 4 के दिन भगवान विमलनाथ(Vimalnath) को जन्म दिया। पश्चिम धातकीखंड द्वीप में मेरू पर्वत से पश्चिम की ओर सीता नदी के दक्षिण तट पर रम्यकावती नाम का एक देश है। उसके महानगर में पद्मसेन राजा राज्य करता था। किसी एक दिन राजा पद्मसेन ने प्रीतिंकर वन में स्वर्गगुप्त केवली के समीप धर्म का स्वरूप जाना और यह भी जाना कि ‘मैं तीसरे भव में तीर्थंकर होऊँगा।’ उस समय उसने ऐसा उत्सव मनाया कि मानों मैं तीर्थंकर ही हो […] - [भगवान शीतलनाथ(Sheetalnath)](https://jinvani.in/bhagwan-sheetalnath/): तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ का जीवन परिचय पुष्करवरद्वीप के पूर्वार्ध भाग में मेरू पर्वत के पूर्व विदेह में सीता नदी के दक्षिण तट पर ‘वत्स’ नाम का एक देश है, उसके सुसीमा नगर में पद्मगुल्म नाम का राजा रहता था। किसी समय बसन्त ऋतु की शोभा समाप्त होने के बाद राजा को वैराग्य हो गया और आनन्द नामक मुनिराज के पास दीक्षा लेकर विपाकसूत्र तक अंगों का अध्ययन किया, तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करके आरण नामक स्वर्ग में इन्द्र हो गया। इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में मलयदेश के भद्रपुर नगर का स्वामी दृढ़रथ राज्य करता था, उनकी महारानी का नाम […] - [भगवान वासुपूज्य(Vasupujya)](https://jinvani.in/bhagwan-vasupujya/): तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य का जीवन परिचय इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चम्पानगर में ‘अंग’ नाम का देश है जिसका राजा वसुपूज्य(Vasupujya) था और रानी जयावती थी। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के दिन रानी ने पूर्वोक्त इन्द्र को गर्भ में धारण किया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन पुण्यशाली पुत्र को उत्पन्न किया। इन्द्र ने जन्म उत्सव करके पुत्र का ‘वासुपूज्य’ नाम रखा। जब कुमार काल के अठारह लाख वर्ष बीत गये, तब संसार से विरक्त होकर भगवान जगत के यथार्थस्वरूप का विचार करने लगे। केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर भगवान ने कदम्ब वृक्ष […] - [भगवान श्रेयांसनाथ(Shreyanshnath)](https://jinvani.in/bhagwan-shrayanshnath/): तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का जीवन परिचय Bhagwan Shrayanshnath श्रेयांसनाथ, जैन धर्म में वर्तमान अवसर्पिणी काल के ११वें तीर्थंकर थे। श्रेयांसनाथ जी के पिता का नाम विष्णु और माता का वेणुदेवी था। उनका जन्मस्थान सिंहपुर(वाराणसी) और निर्वाणस्थान संमेदशिखर माना जाता है। इनका चिन्ह गैंडा है। श्रेयांसनाथ के काल में जैन धर्म के अनुसार अचल नाम के प्रथम बलदेव, त्रिपृष्ठ नाम के प्रथम वासुदेव और अश्वग्रीव नाम के प्रथम प्रतिवासुदेव का जन्म हुआ। ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके समाधिमरणपूर्वक अच्युत स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में अच्युत नाम का इन्द्र हुआ। केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थ अवस्था […] - [Bhagwan Mahaveer Swami](https://jinvani.in/bhagwan-mahaveer-swami/): भगवान महावीर स्वामी भगवान महावीर (Bhagwan Mahaveer Swami) जैन धर्म के चौंबीसवें (24वें) तीर्थंकर थे। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 540 वर्ष पूर्व), वैशाली गणराज्य के कुण्डग्राम में अयोध्या इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। 12 वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ जिसके पश्चात् उन्होंने समवशरण में ज्ञान प्रसारित किया। 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी […] - [Bhagwan Parshvanath (पार्श्वनाथ)](https://jinvani.in/bhagwan-parshvanath/): भगवान पार्श्वनाथ का जीवन परिचय भगवान पार्श्वनाथ(Parshvanath) जैन धर्म के तेइसवें (23वें) तीर्थंकर हैं। तीर्थंकर पार्श्वनाथ का जन्म आज से लगभग 2 हजार 9 सौ वर्ष पूर्व वाराणसी के भेलूपुर में हुआ था। वाराणासी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय क्षत्रिय राजा थे। उनकी रानी वामा ने पौष कृष्‍ण एकादशी के दिन महातेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसके शरीर पर सर्पचिह्म था। वामा देवी ने गर्भकाल में एक बार स्वप्न में एक सर्प देखा था, इसलिए पुत्र का नाम ‘पार्श्व’ रखा गया। केवल ज्ञान की प्राप्ति भगवान पार्श्वनाथ 30 वर्ष की आयु में ही गृह त्याग कर संन्यासी हो गए। 83 दिन […] - [Bhagwan Ajitnath(अजितनाथ)](https://jinvani.in/bhagwan-ajitnath/): भगवान अजितनाथ का जीवन परिचय भगवान अजितनाथ(Ajitnath) जैन धर्म के २४ तीर्थकरो में से वर्तमान अवसर्पिणी काल के द्वितीय तीर्थंकर है। अजितनाथ का जन्म अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय राजपरिवार में माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में हुआ था। इनके पिता का नाम जितशत्रु और माता का नाम विजया था। अजितनाथ का चिह्न हाथी था। भगवान अजिताथ की कुल आयु 72 लाख पूर्व की थी। केवल ज्ञान की प्राप्ति बारह वर्ष की छद्मस्थ अवस्था के बाद पौष शुक्ल एकादशी के दिन सायं के समय रोहिणी नक्षत्र में सहेतुक वन में सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे केवलज्ञान को प्राप्त कर सर्वज्ञ हो गये। […] - [भगवान अभिनन्दननाथ(Abhinandannath)](https://jinvani.in/bhagwan-abhinandannath/): तीर्थंकर भगवान अभिनन्दननाथ का जीवन परिचय जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर भगवान अभिनन्दननाथ(Abhinandannath) हैं। भगवान अभिनन्दननाथ जी को अभिनन्दन स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। अभिनन्दननाथ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को हुआ था। अयोध्या में जन्मे अभिनन्दननाथ जी की माता सिद्धार्था देवी और पिता राजा संवर थे। इनका वर्ण सुवर्ण और चिह्न बंदर था। इनके यक्ष का नाम यक्षेश्वर और यक्षिणी का नाम व्रजशृंखला था। अपने पिता की आज्ञानुसार अभिनन्दननाथ जी ने राज्य का संचालन भी किया। लेकिन जल्द ही उनका सांसारिक जीवन से मोह भंग हो गया […] - [भगवान पुष्पदंतनाथ(Puphpdant)](https://jinvani.in/bhagwan-puphpdant/): तीर्थंकर भगवान पुष्पदंतनाथ का जीवन परिचय तीर्थंकर सुविधिनाथ, जो पुष्पदन्त(Puphpdant) के नाम से भी जाने जाते हैं, वर्तमान काल के 9वें तीर्थंकर है। इनका चिन्ह ‘मगर’ हैं। किसी दिन भूतहित जिनराज की वंदना करके धर्मोपदेश सुनकर विरक्तमना राजा दीक्षित हो गया। ग्यारह अंगरूपी समुद्र का पारगामी होकर सोलहकारण भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया और समाधिमरण के प्रभाव से प्राणत स्वर्ग का इन्द्र हो गया। पंचकल्याणक वैभव-इस जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की काकन्दी नगरी में इक्ष्वाकुवंशीय काश्यप गोत्रीय सुग्रीव नाम का क्षत्रिय राजा था, उनकी जयरामा नाम की पट्टरानी थी। उन्होंने फाल्गुन कृष्ण नवमी के दिन ‘प्राणतेन्द्र’ को गर्भ […] - [भगवान चन्द्रप्रभु(Chandrapabhu)](https://jinvani.in/bhagwan-chandrapabhu/): तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु का जीवन परिचय श्री चंद्रप्रभु(Chandrapabhu) भगवान जैन धर्म के २४ तीर्थकरो में से वर्तमान काल के आठवें तीर्थंकर है। श्री चंदा प्रभु भगवान का गर्भ कल्याणक चैत्र कृष्णा पंचमी को ज्येष्ठा नक्षत्र में, चंद्र प्रभु का जन्म चन्द्रपुर नगर के राजपरिवार में पौष कृष्णा ग्यारस को अनुराधा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री महासेन राजा और माता का नाम श्रीमती लक्ष्मण देवी था। चंद्र प्रभु का चिह्न चन्द्रमा है। श्री चंद्र प्रभु भगवान का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ। श्री चंद्र प्रभु भगवान के शरीर का वर्ण चन्द्रमा के समान श्वेत है, श्री चंद्र प्रभु भगवान […] - [भगवान सुपार्श्वनाथ(Suparshvnath)](https://jinvani.in/bhagwan-suparshvnath/): तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का जीवन परिचय भगवान सुपार्श्वनाथ(suparshvnath) वर्तमान अवसर्पिणी काल के सातवें तीर्थंकर थे। इनका जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बनारस नाम की नगरी थी उसमें सुप्रतिष्ठित महाराज राज्य करते थे। उनकी पृथ्वीषेणा रानी के गर्भ में भगवान भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन आ गये। अनन्तर ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन उस अहमिन्द्र पुत्र को उत्पन्न किया। इन्द्र ने जन्मोत्सव के बाद सुपार्श्वनाथ नाम रखा। केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थ अवस्था के नौ वर्ष व्यतीत कर फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन केवलज्ञान प्राप्त किया। पद्मप्रभ भगवान का इतिहास भगवान का चिन्ह – उनका चिन्ह स्वास्तिक है। जन्म स्थान –काशी […] - [भगवान सुमतिनाथ(Sumatinath)](https://jinvani.in/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5sumatinath/): तीर्थंकर भगवान सुमतिनाथ का जीवन परिचय भगवान सुमतिनाथ(Sumatinath) जी वर्तमान काल के पांचवें तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें, जो संसार सागर(जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। सुमतिनाथ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में चैत्र शुक्ल ११ को हुआ था। अयोध्या में जन्मे सुमतिनाथ जी की माता सुमंगला और पिता मेघरथ थे। केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थ अवस्था में बीस वर्ष बिताकर सहेतुक वन में प्रियंगु वृक्ष के नीचे चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन केवलज्ञान को प्राप्त किया। इनकी सभा में एक सौ सोलह गणधर, […] - [भगवान पद्मप्रभ(Padamprabh)](https://jinvani.in/bhagwan-padamprabhu/): तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का जीवन परिचय भगवान पद्मप्रभ(Padamprabh) जी वर्तमान काल के छठवें तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें, जो संसार सागर(जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। पद्मप्रभ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में कार्तिक कृष्ण १३ को हुआ था। कोशाम्बी में जन्मे पद्मप्रभ जी की माता सुसीमा और पिता श्रीधर धरण राज थे।  किसी दिन भोगों से विरक्त होकर पिहितास्रव जिनेन्द्र के पास दीक्षा धारण कर ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन कर तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया। अन्त में ऊर्ध्व ग्रैवेयक के […] - [श्री बड़े बाबा विधान - Shri Bade Baba Vidhan](https://jinvani.in/shri-bade-baba-vidhan/): पूज्य आर्यिका श्री विज्ञानमति माताजी कृत (दोहा) पूज्य बड़े बाबा तुम्हें, कोटि-कोटि परणाम। थुति करता हूँ चाव से, मिट जावे भव नाम ॥ (पद्धरी) जय पूज्य बड़े बाबा महान, तुम दर्शन से हो पाप हान। सब दोष विनाशक धीर वीर, मम दोष विनाशो गुण गरीर॥ मैं दरशन कर जो नन्द पाय, वो कह सकता ना शब्द माय। है गद-गद वाणी पुलक देह, है केवल तुममें मम सनेह॥ मैं हर्षित होकर नाच नाच, मम इष्ट पूज्य हो आप साँच । मैं ठुमक ठुमक कर दऊँ ताल, मैं चलना चाहूँ आप चाल॥ मैं हरिहर आदिक देव देख, ना तुष्ट हुआ हूँ हे […] - [Nirvan Kshetra Pooja - निर्वाण क्षेत्र पूजा](https://jinvani.in/nirvan-kshetra-pooja/): (कविवर ज्ञानतराय जी) परमपूज्य चौबीस, जिहँ जिहँ थानक शिव गये| सिद्धभूमि निशदीस, मन-वच-काय पूजा करों| ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रा:! अत्र अवतर अवतर संवौषट आह्वाह्न्म | ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रा:! अत्र तिष्ठ: ठ: ठ: स्थापनम| ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रा:! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणम| शुचि छीर दधि सम नीर निर्मल, कनकझारी में भरों | संसार पार उतार स्वामी, जोरकर विनती करों || सम्मेदगढ़ गिरनार चम्पा, पावापुर कैलाश कौं | पूजौं सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास कौं || ॐ ह्रीं श्रीचतुर्विंशति तीर्थंकर निर्वाणक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा| केशर कपूर सुगंध चन्दन, सलिल शीतल विस्तरों | भवताप […] - [पंच बालयति तीर्थंकर पूजा – Panch Baalyati Tirthankar Pooja](https://jinvani.in/%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be/): Panch Baalyati Tirthankar Pooja Lyrics (दोहा) श्री जिन पंच अनंग-जित, वासुपूज्य मल्लि नेम | पारसनाथ सु वीर अति, पूजूँ चित-धरि प्रेम || ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्) ओं ह्रीं श्री पंचबालयति-तीर्थंकरा: अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) अथाष्टक शुचि शीतल सुरभि सुनीर, लायो भर झारी, दु:ख जामन मरन गहीर, या कों परिहारी | श्री वासुपूज्य मल्लि नेमि, पारस वीर अति, नमूं मन वच तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति || ओं ह्रीं श्री वासुपूज्य-मल्लिनाथ-नेमिनाथ-पार्श्वनाथ-महावीर पंचबालयति- तीर्थंकरेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। चंदन केशर कर्पूर, जल में […] - [श्री निर्वाण क्षेत्र लड्डू पूजा - Nirvan Laddu Pooja](https://jinvani.in/nirvan-laddu-pooja/): दोहा बंदौ श्री भगवान् को, भाव भगति सिर नाय । पूजा श्री निर्वाण की, सिद्धक्षेत्र सुखदाय ।।१।। द्वीप अढाई के विषै, सिद्धक्षेत्र को जान। तिनको मैं वंदन करौं, भव भव होइ सहाय।।२।। अथ स्थापना (अडिल्ल छन्द) परम महा उत्कृष्ट मोक्ष मंगल सही, आदि अनादि संसार भानि मुक्ति लही। तिनिके चरन अरु क्षेत्र जजों शिवदायही। आव्हानन विधि ठानि बार त्रय गायही ।।१।। ॐ ह्रीं भरत क्षेत्रस्य आर्य खण्ड सम्बन्धी सिद्ध क्षेत्र अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननं । ॐ ह्रीं भरत क्षेत्रस्य आर्य खंड सम्बन्धी सिद्ध क्षेत्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापन्म । ॐ ह्रीं भरत क्षेत्रस्य आर्य खंड सम्बन्धी सिद्ध क्षेत्र अत्र […] - [श्री ऋषि मण्डल पूजा - Shri Rishi Mandal Pooja](https://jinvani.in/shri-rishi-mandal-pooja/): चौबिस जिनपद प्रथम नमि, दुतिय सुगणधर पाय। त्रितिय पंच परमेष्ठि को, चौथे शारद माय।। मन वच तन ये चरन युग, करहुँ सदा परनाम। ऋषि मण्डल पूजा रचों, बुधि बल द्यो अभिराम।। -अडिल्ल छंद- चौबिस जिन वसु वर्ग पंच गुरु जे कहे। रत्नत्रय चव देव चार अवधी लहे।। अष्ट ऋद्धि चव दोय सूर ह्रीं तीन जू। अरहंत दश दिग्पाल यंत्र में लीन जू।। -दोहा- यह सब ऋषिमण्डल विषै, देवी देव अपार। तिष्ठ तिष्ठ रक्षा करो, पूजूँ वसु विधि सार।। ॐ ह्रीं वृषभादिचौबीसतीर्थंकर, अष्ट वर्ग, अर्हंंतादि पंचपद, दर्शनज्ञानचारित्र- रूपरत्नत्रय, चतुर्निकाय देव, चार प्रकार अवधि धारक श्रमण, अष्ट ऋद्धि, चौबीस सूर, तीन ह्रीं […] - [Saluna Parv Pooja - सलूना पर्व पूजा](https://jinvani.in/saluna-parv-pooja/): पूज्य अकम्पन साधु-शिरोमणि, सात-शतक मुनि ज्ञानी | आ हस्तिनापुर के कानन में, हुए अचल दृढ़- ध्यानी ||१|| दु:खद सहा उपसर्ग भयानक, सुनकर मानव घबराये | आत्म-साधना के साधक वे, तनिक नहीं भी अकुलाये ||२|| योगिराज श्री विष्णु त्याग तप, वत्सलता-वश आये | किया दूर उपसर्ग जगत्-जन, मुग्ध हुए और हर्षाये ||३|| सावन शुक्ला पन्द्रस पावन, शुभ-दिन था सुखदाता | पर्व सलूना हुआ पुण्य-प्रद, यह गौरवमय-गाथा ||४|| शांति दया समता का, जिनसे नव-आदर्श मिला है | जिनका नाम लिये से होती, जागृत पुण्य-कला है ||५|| करूँ वंदना उन गुरुपद की, वे गुण मैं भी पाऊँ | आह्वानन संस्थापन सन्निधिकरण करूँ हर्षाऊँ […] - [मंगलाष्टक मराठी - Mangalashtak in Marathi](https://jinvani.in/mangalashtak-in-marathi/): स्वस्ति श्री गणनायकं गजमुखम, मोरेश्वरम सिद्धीधम । बल्लाळो मुरुडम विनायकमहम चिन्तामणि स्थेवरम। लेण्याद्री गिरीजात्मकम सुरवरदम विघ्नेश्वरम् ओझरम । ग्रामो रांजण संस्थीतम गणपति। कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।१।। गंगा सिंधु सरस्वतीच यमुना,गोदावरी नर्मदा । कावेरी शरयू महेंद्रतनया शर्मण्वति वेदीका । शिप्रा वेञवती महासूर नदी,ख्याता गया गंडकी। पुर्णा पुर्ण जलै, समुद्र सरीता। कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।२।। लक्ष्मी कैस्तुभ परिजातक सुरा धन्वंतरीश्वचंद्रमा। गाव कामदुधा सरेश्वर गजो, रंभादिदेवांगना । अश्क सप्त मखो विषम हरिधनु शंखो मृतम चांबुधे । रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनम,कुर्वतु वो मंगलम। कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।३।। Also Read: Mangalashtak in Marathi रामो राजमणी सदा विजयते रामम्। रमेशम भजे रामेणाभिहता […] - [निर्वाण कांड - Nirvan Kand](https://jinvani.in/nirvan-kand/): जैन धर्म निर्वाण कांड (दोहा) वीतराग वन्दौं सदा, भाव सहित सिर नाय| कहूं काण्ड निर्वाण की, भाषा सुगम बनाये || (चौपाई) अष्टापद आदीश्वर स्वामि, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि| नेमिनाथ स्वामी गिरनार, वन्दौं भाव भगति उर धार ||1|| चरम तीर्थकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामि महावीर| शिखर समेद जिनेसुर बीस, भावसहित वन्दौं निश दीस ||2|| वरदत्तराय रु इन्द मुनिंद, सायरदत्त आदि गुणवृन्द| नगर तारवर मुनि उठकोडी, वन्दौं भाव सहित कर जोडी ||3|| श्रीगिरनार शिखर विख्यात, कोडी बहत्तर अरु सौ सात| सम्बु प्रद्युम्न कुमर द्वै भाय, अनिरुध आदि नमूं तसु पाय ||4|| रामचन्द्र के सुत द्वै वीर, लाडनरिंद आदि गुणधीर| पांच कोडी मुनि मुक्ति […] - [जैन सप्तर्षि पूजा - Saptarishi Pooja](https://jinvani.in/saptarishi-pooja/): कवि श्री मनरंगलाल (छप्पय छन्द) प्रथम नाम श्रीमन्व दुतिय स्वरमन्व ऋषीश्वर | तीसर मुनि श्रीनिचय सर्वसुन्दर चौथो वर || पंचम श्रीजयवान विनयलालस षष्ठम भनि | सप्तम जयमित्राख्य सर्व चारित्र-धाम गनि || ये सातों चारण-ऋद्धि-धर, करूँ तास पद थापना | मैं पूजूँ मन-वचन-काय कर, जो सुख चाहूँ आपना || ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर-श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर – श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर- श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र मम सत्रिहितो भव भव वषट्! (सत्रिधिकरणम्) (गीता छन्द) शुभ-तीर्थ-उद्भव-जल अनूपम, मिष्ट शीतल लायके | भव-तृषा-कंद-निकंद-कारण, शुद्ध-घट भरवायके || मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ | […] - [Uttam Kshama Quotes in Hindi](https://jinvani.in/uttam-kshama-quotes-in-hindi/): Uttam Kshama Quotes in Hindi क्षमा मांगना और दिल से क्षमा करना ही सच्ची क्षमा है। सिर्फ दूर-दूर के रिश्तों में हल्की सी जान पहचान में या जिनसे मधुर संबंध हो उनसे क्षमा की लेन देन कर हम स्वयं को धोखा देते है। क्षमा से कमालो गंवाए हुए को, क्षमा से हंसा लो रुलाए हुए को। उत्तम क्षमा ***** छोटा सा संसार गलतिया अपार आपके पास है क्षमा का अधिकार कर लीजिये निवेदन स्वीकार उत्तम क्षमा ***** जाने अनजाने में हम से कोई भूल हुई या हमने आपका दिल दुखाया हो तो मन, वचन, काया से “उत्तम क्षमा” समभाव रखते […] - [तत्त्वार्थ सूत्र अर्थ - Tattvartha Sutra](https://jinvani.in/tattvartha-sutra/): संस्कृत तत्त्वार्थ सूत्र अर्थ हिंदी मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृतां। ज्ञातारं विश्वतत्वानां बंदे तद्गुणलब्धये।। त्रैकाल्यं द्रव्यषट्कं नवपदसहितं जीवषट्कायलेश्या:। पंचान्ये चास्तिकाया व्रतसमितिगतिज्ञानचारित्रभेदाः।। इत्येतन्मोक्षमूलं त्रिभुवनमहितैः प्रोक्तमर्हद्भिरीशैः। प्रत्येति श्रद्दधाति स्पृशति च मतिमान् यः स वै शुद्धदृष्टिः।।१।। सिद्ध जयप्पसिद्धे, चउविहाराहणाफलं पत्ते। वंदित्ता अरहंते, वोच्छं आराहणा कमसो।।२।। उज्झोवणमुज्झवणंणिव्बाहणं साहणं च णिच्छरणं। दसणणाण चरित्तं तवाणमाराहणा भणिया।।३।। ।।अध्याय 1।। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।।१।। सम्यग्दर्शन, सम्यगान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मुक्ति के मार्ग हैं। तत्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्।।२।। तत्वभूत पदार्थों के विषय में श्रद्धा करना सो सम्यग्दर्शन है। (पदार्थों का यथार्थ ज्ञान होना सो सम्यगान है तथा आत्मा के स्वरूपकी प्राप्ति के लिए सम्यक् प्रवृति करना सो सम्यक् चारित्र है।) तन्निसर्गादधिगमाद्वा।।३।। वह […] - [तुम से लागी लगन || Tum se Lagi Lagan](https://jinvani.in/tum-se-lagi-lagan/): (मणिक लाल पाटनी ‘पंकज’) तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा, मेटो मेटो जी संकट हमारा।॥टेक॥ निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेह तजूँ, जीवन सारा, तेरे चरणों में बीत हमारा ॥1॥ अश्वसेन के राजदुलारे, वामा देवी के सुत प्राण प्यारे। सबसे नेह तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा ॥ मेटो मेटो जी संकट हमारा॥2॥ इंद्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए। आशा पूरो सदा, दुःख नहीं पावे कदा, सेवक थारा ॥ मेटो मेटो जी संकट हमारा॥3॥ जग के दुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है। मेटो जामन […] - [छह ढाला || Chah Dhala](https://jinvani.in/chhah-dhala/): कविवर दौलतराम जी कृत मंगलाचरण (सोरठा) तीन भुवन में सार, वीतराग विज्ञानता । शिवस्वरूप शिवकार, नमहुँ त्रियोग सम्हारिकैं॥ —–पहली ढाल—– जे त्रिभुवन में जीव अनन्त, सुख चाहैं दु:खतैं भयवन्त । तातैं दु:खहारी सुखकार, कहैं सीख गुरु करुणा धार॥(1) ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनो कल्यान। मोह-महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि॥(2) तास भ्रमण की है बहु कथा, पै कछु कहूँ कही मुनि यथा। काल अनन्त निगोद मंझार, बीत्यो एकेन्द्री-तन धार॥(3) एक श्वास में अठदस बार, जन्म्यो मर्यो भर्यो दु:ख भार। निकसि भूमि-जल-पावकभयो,पवन-प्रत्येक वनस्पति थयो॥(4) दुर्लभ लहि ज्यों चिन्तामणि, त्यों पर्याय लही त्रसतणी। लट पिपीलि अलि आदि […] - [श्री मज्जिनसहस्रनाम स्तोत्र - Shri Majjinasahasranama Stotra](https://jinvani.in/shri-majjinasahasranama-stotra/): जिनस्तोत्रम् (प्रस्तावना) स्वयंभूवे नमस्त्युभ्यमुत्पाद्यात्मान मात्मनि। स्वात्मनैव तथोद्भूत वृत्तयेऽचिन्त्यवृत्तये ॥१॥ अन्वयार्थ : हे भगवन् ! आपने स्वयम् अपने आत्मा को प्रकट किया है, अर्थात् आप अपने आप उत्पन्न हुए हैं, इसलिए आप स्वयंभू कहलाते हैं। आपको आत्मवृत्ति अर्थात् आत्मा में ही लीन अथवा तल्लीन रहने योग्य चारित्र तथा अचिन्त्य महात्म्य की प्राप्ति हुई है, इसलिये आपको मेरा नमस्कार हो। नमस्ते जगतां पत्ये लक्ष्मीभर्त्रे नमोस्तु ते। विदावरं नमस्तुभ्यं नमस्ते वदतांवर ॥२॥ अन्वयार्थ : आप जगत के स्वामी हैं, इसलिये आपको मेरा नमस्कार हो, आप अंतरंग तथा बहिरंग दोनों लक्ष्मी के स्वामी हैं, इसलिये आपको मेरा नमस्कार हो । आप विद्वानों मे और […] - [श्री पारसनाथ स्तोत्रं संस्कृत - Shri Parasnath Stotra](https://jinvani.in/parasnath-stotra/): पार्श्वनाथ स्तोत्र जैन धर्म के बहुत ही प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक है। इसकी रचना कविश्री द्यानतराय द्वारा की गई है। यह स्तोत्र भगवान पार्श्वनाथ की स्तुति में लिखा गया है, जो चौबीस जैन तीर्थंकरों में से तेईसवें तीर्थंकर माने जाते हैं। इस स्तोत्र में पार्श्वनाथ भगवान के चमत्कारिक गुणों, उनके प्रति श्रद्धा, और उनकी आराधना से मिलने वाले कल्याणकारी फलों का सुंदर वर्णन मिलता है। पार्श्वनाथ स्तोत्र न सिर्फ व्यक्ति के मानसिक एवं आध्यात्मिक बल को मजबूत करता है, बल्कि इसे पढ़ने-सुनने से भय, रोग, दरिद्रता, और विभिन्न प्रकार के कष्ट भी दूर हो जाते हैं। Parasnath Stotra Sanskrit […] - [श्री पारसनाथ जी की आरती || Parasnath Bhagwan Aarti](https://jinvani.in/parasnath-bhagwan-aarti/): चिंतामणि पारसनाथ भगवान की आरती  ओं जय पारस देवा स्वामी जय पारस देवा ! सुर नर मुनिजन तुम चरणन की करते नित सेवा| पौष वदी ग्यारस काशी में आनंद अतिभारी, अश्वसेन वामा माता उर लीनों अवतारी| ओं जय.. श्यामवरण नवहस्त काय पग उरग लखन सोहैं, सुरकृत अति अनुपम पा भूषण सबका मन मोहैं| ओं जय.. जलते देख नाग नागिन को मंत्र नवकार दिया, हरा कमठ का मान, ज्ञान का भानु प्रकाश किया| ओं जय.. मात पिता तुम स्वामी मेरे, आस करूँ किसकी, तुम बिन दाता और न कोर्इ, शरण गहूँ जिसकी| ओं जय.. तुम परमातम तुम अध्यातम तुम अंतर्यामी, स्वर्ग-मोक्ष […] - [समाधीमरण पाठ (लघु) - Samadhi Maran Path](https://jinvani.in/samadhi-maran-path-chota/): गौतम स्वामी वन्दों नामी मरण समाधि भला है। मैं कब पाऊँ निशदिन ध्याऊँ गाऊँ वचन कला है॥ देव-धर्म-गुरु प्रीति महादृढ़ सप्त व्यसन नहिं जाने। त्यागे बाइस अभक्ष्य संयमी बारह व्रत नित ठाने॥१॥ चक्की उखरी चूलि बुहारी पानी त्रस न विराधे। बनिज करै परद्रव्य हरे नहिं छहों करम इमि साधे॥ पूजा शा गुरुन की सेवा संयम तप चहु दानी। पर-उपकारी अल्प-अहारी सामायिक-विधि ज्ञानी॥२॥ जाप जपै तिहूँ योग धरै दृढ़ तन की ममता टारै। अन्त समय वैराग्य सम्हारै ध्यान समाधि विचारै॥ आग लगै अरु नाव डुबै जब धर्म विघन है आवे। चार प्रकार अहार त्याग के मंत्र सु मन में ध्यावै॥३॥ रोग […] - [समाधि मरण पाठ- Samadhi Maran Path](https://jinvani.in/samadhi-maran-path/): बंदौं श्री अरहंत परम गुरु, जो सबको सुखदाई |इस जग में दुःख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई ||अब मैं अरज करूं प्रभु तुमसे, कर समाधि उर मांहीं|अंत समय में यह वर मांगूं, सो दीजै जगराई ||1|| भव-भव में तनधार नये मैं, भव-भव शुभ संग पायो |भव-भव में नृपरिद्धि लई मैं, मात-पिता सुत थायो ||भव-भव में में तन पुरुष तनों धर, नारी हूँ तन लीनों|भव-भव में में मैं हुवो नपुंसक, आतम गुण नहि चीनों ||2|| भव-भव में सुर पदवी पाई, ताके सुख अति भोगे|भव-भव में में गति नरकतनी धर, दुःख पायो विधि योगे||भव-भव में में तिर्यंच योनि धर, पाये […] - [समाधि भावना - JAIN SAMADHI BHAVNA](https://jinvani.in/samadhi-bhavna/): समाधि भावना (Samadhi Bhavna) जैन दर्शन का वह सर्वोच्च आध्यात्मिक चिंतन है जो मनुष्य को न केवल ‘जीने की कला’, बल्कि ‘मरने की कला’ (Art of Dying) भी सिखाता है। इसे अक्सर जीवन के अंतिम समय में या सल्लेखना (Santhara) के दौरान सुनाया जाता है, ताकि आत्मा पूर्ण शांति, होश और समता भाव के साथ देह का त्याग कर सके। कविश्री शिवराज दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ| देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ|| शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ | समता का भाव धरकर, सबसे क्षमा कराऊँ|| दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ| […] - [जैन आलोचना पाठ - Alochana Path](https://jinvani.in/alochana-path/): जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा और आत्म-कल्याण है। इस कठोर संयम मार्ग पर चलते हुए, श्रावक-श्राविकाओं से जाने-अनजाने में मन, वचन या काया से अनेक भूलें हो जाती हैं। इन भूलों और पापों का परिमार्जन (सफाई) करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी आत्म-शुद्धि की परम प्रक्रिया का नाम ‘जैन आलोचना पाठ’ (Jain Alochana Path) है। (कवि जौहरिलाल) वंदौं पाँचों परम गुरु, चौबीसों जिनराज।करूँ शुद्ध आलोचना, शुद्धिकरण के काज॥१॥ सुनिये जिन अरज हमारी, हम दोष किये अति भारी।तिनकी अब निर्वृत्ति काजा, तुम सरन लही जिनराजा॥२॥ इक वे ते चउ इन्द्री वा, मनरहित-सहित जे जीवा।तिनकी नहिं करुणा धारी, […] - [श्रावक-प्रतिक्रमण (लघु) | Shravak Pratikraman Laghu](https://jinvani.in/shravak-pratikraman-laghu/): ॐ नमः सिद्धेभ्यः| ॐ नमः सिद्धेभ्यः| ॐ नमः सिद्धेभ्यः|चिदानन्दैकरुपाय जिनाय परमात्मने|परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नमः|| अर्थ – उन श्री जिनेन्द्र परमात्मा सिद्धत्मा को नित्य नमस्कार है जो चिदानन्द रुप हैं, अष्ट कर्मों को जीत चुके हैं, परमात्मा स्वरुप हैं और परमात्मा तत्त्व को प्रकाशित करने वाले हैं|पाँच मिथ्यात्व, बारह अवत, पन्द्रह योग, पच्चीस कषाय इस प्रकार सत्तावन आस्रव का पाप लगा हो मेरा वह सब पाप मिथ्या होवे| नित्य निगोद सात लाख, इतर निगोद सात लाख, पृथ्वीकाय सात लाख, जलकाय सात लाख, अग्निकाय सात लाख, वायुकाय सात लाख, वनस्पतिकाय दस लाख, दो इन्द्रिय दो लाख, तीन इन्द्रिय दो लाख, चार इन्द्रिय […] - [श्रावक प्रतिक्रमण - Shravak Pratikraman](https://jinvani.in/shravak-pratikraman/): दव्वे खेत्ते काले भावे य कयावराहसोहणयं। जिंदणगरहणजुत्तो मणवककायेण पडिक्कमणं।। गाथार्थ – निन्दा और गहपूर्वक मन-वचन-काय के द्वारा द्रव्य, – क्षेत्र, काल और भाव के विषय में किए गए अपराधों का शोधन करना प्रतिक्रमण है। जीवे प्रमाद – जनिताः प्रचुराः प्रदोषाः, यस्मात्प्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रयान्ति। तस्मात्तदर्थ – ममलं गृहि – बोधनार्थं, वक्ष्ये विचित्र – भव- कर्म- विशोधनार्थम् ।। अर्थ – जिस प्रतिक्रमण से, जीव के द्वारा प्रमाद से उत्पन्न होने वाले अनेक दोष क्षय को प्राप्त होते हैं, तथा अनेक भवों में उपार्जित कर्मों का क्षणमात्र में नाश होता है। इसलिए गृहस्थों की ज्ञान कराने के लिए मैं ऐसे निर्मल प्रतिक्रमण को […] - [श्री शांतिनाथजी भगवान् आरती - Shri Shantinath Ji Bhagwan ki Aarti](https://jinvani.in/shri-shantinath-ji-bhagwan-ki-aarti/): जय जिनवर देवा प्रभु जय जिनवर देवा| शांति विधाता शिवसुख दाता शांतिनाथ देवा ||टेक|| ऐरा देवी धन्य जगत में जिस उर आन बसे| विश्वसेन कुल नभ में मानो पूनम चन्द्र लसे ||१|| || जय जिनवर देवा || कृष्ण चतुर्दशी जेठ मास की आनंद कर तारी| हथानापुर में जन्म महोत्सव ठाठ रचे भारी ||२|| || जय जिनवर देवा || बाल्यकाल की लीला अदभुत सुरनर मन भाई| न्याय नीति से राज्य कियो चिर सबको सुखदाई ||३|| || जय जिनवर देवा || पंचम चक्री काम द्वाद-शम सोल्हम तीर्थंकर| त्रय पदधारी तुम्ही मुरारी ब्रह्मा शिवशंकर ||४|| || जय जिनवर देवा || भवतन भोग समझ […] - [श्री शांतिनाथ भगवान की आरती | Shree Shantinath Bhagwan Ki Aarti](https://jinvani.in/shree-shantinath-bhagwan-ki-aarti/): जय शांतिनाथ स्वामी, प्रभु जय शांतिनाथ स्वामी। जय शांतिनाथ स्वामी, प्रभु जय शांतिनाथ स्वामी। मन वच तन से, तुमको वन्दु (२) जय अन्तरयामी प्रभु जय अन्तरयामी जय शांतिनाथ स्वामी, प्रभु जय शांतिनाथ स्वामी। गर्भ जनम जब हुआ आपका (२) तीन लोक हर्षे स्वामी तीन लोक हर्षे इन्द्र कियो अभिषेक शिखर पर (२) शिव मग के स्वामी बोलो शिव मग के स्वामी। जय शांतिनाथ स्वामी, प्रभु जय शांतिनाथ स्वामी। पंचम चक्री भये आप ही (२) षट खंड के स्वामी, प्रभु षट खंड के स्वामी राज विभव के भोगे प्रभु जी (२) कामदेव नामी, बोलो कामदेव नामी। जय शांतिनाथ स्वामी, प्रभु जय […] - [Shri Shantinath Bhagwan ki Aarti - श्री शांतिनाथ भगवान की आरती](https://jinvani.in/shri-shantinath-bhagwan-ki-aarti/): शान्ति अपरम्पार है- आनन्द अपार है। शान्तिनाथ भगवान की आरती बारम्बार है।। शान्ति अप० पहली आरती पहले पद की, तीर्थंकर पद धारी की।। तीर्थंकर० वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, छियालीस गुण धारी की।। छियालीस० शान्ति अपरम्पार है आनन्द अपार है। दूजी आरती दूजे पद की, चक्रवर्ती पद धारी की।। चक्रवर्ती ० चौदह रत्न नवो निधि छोड़े, चौरासी लख हाथी जी।। चौरासी० शान्ति अपरम्पार है आनन्द अपार है। तीजी आरती तीजे पद की, काम देव पद धारी की।। काम देव० सहस्त्र छियानवे रानी तजकर, हुए दिगम्बर धारी जी।। हुए दिग० शान्ति अपरम्पार है आनन्द अपार है।। कर्म काट सम्मेद शिखर से मुक्ति कंत […] - [MAHAVIRASHTAK STOTRA - महावीराष्टक स्तोत्र](https://jinvani.in/mahavirashtak-stotra/): यदीये चैतन्ये मुकुर इव भावाश्चिदचित:, समं भान्ति ध्रौव्य-व्यय-जनि-लसन्तोन्तरहिता:| जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटनपरो भानुरिव यो, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||१|| अताम्रं यच्चक्षु: कमल-युगलं स्पन्द-रहितम्, जनान्कोपापायं प्रकटयति बाह्यान्तरमपि| स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमयी वातिविमला, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||२|| नमन्नाकेन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलम्, लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम्| भवज्ज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे||३|| यदर्चा-भावेन प्रमुदित-मना दर्दुर इह, क्षणादासीत्स्वर्गी गुण-गण-समृद्ध: सुख-निधि:| लभन्ते सद्भक्ता: शिव-सुख-समाजं किमु तदा, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||४|| कनत्स्वर्णाभासोऽप्यपगत-तनुर्ज्ञान-निवहो, विचित्रात्माप्येको नृपति-वर-सिद्धार्थ-तनय:| अजन्मापि श्रीमान् विगत-भव-रागोऽद्भुत-गतिर्, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||५|| यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय-कल्लोल-विमला, वृहज्ज्ञानाभ्भोभिर्जगति जनतां या स्नपयति| इदानीमप्येषा बुध-जन-मरालै: परिचिता, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ||६|| अनिर्वारोद्रेकस्त्रिभुवन-जयी काम-सुभट:, कुमारावस्थायामपि निज-बलाद्येन विजित:| स्फुरन्नित्यानन्द-प्रशम-पद-राज्याय स जिन:, महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु […] - [आरती श्री शांतिनाथ भगवान की - Aarti Shree Shantinath Bhagwan](https://jinvani.in/aarti-shree-shantinath-ji-bhagwan-ki/): || शांतिनाथ भगवान की आरती || शांतिनाथ भगवान की हम आरती उतारेंगे| आरती उतारेंगे हम आरती उतारेंगे| आरती उतारेंगे हम आरती उतारेंगे| शांतिनाथ भगवान की हम आरती उतारेंगे| हस्तिनापुर में जनम लिये हे प्रभु देव करे जयकारा हो| जन्म महोत्सव करें कल्याणक, नाचे झूमे गाये हो| ऐसे अवतारी की अब हम आरती उतारेंगे| शांतिनाथ भगवान की हम आरती उतारेंगे| धन्य है माता ऐरा देवी तुम्हें जो गोद उठाईं है| विश्वसेन के कुलदीपक ने ज्ञान की ज्योति जगाई है| ऐसे अवतारी की अब हम आरती उतारेंगे| शांतिनाथ भगवान की हम आरती उतारेंगे| पंचम चक्रवर्ती पद पाये, जग सुख बढा अपार था| […] - [मेरी भावना पाठ - Meri Bhavna](https://jinvani.in/jain-meri-bhavna/): जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया, बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥1॥ विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं, स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुख-समूह को हरते हैं। ॥2॥ रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे, नहीं […] - [आत्म-कीर्तन - ATAM KIRTAN](https://jinvani.in/jain-atam-kirtan/): कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम| मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं हूँ वह हैं भगवान्| अन्तर यही ऊपरी जान, वे विराग मैं राग-वितान||१|| मम-स्वरूप है सिद्ध-समान, अमित-शक्ति-सुख-ज्ञान-निधान| किन्तु आश-वश खोया ज्ञान, बना भिखारी निपट अजान||२|| सुख-दु:खदाता कोई न आन, मोह-राग ही दु:ख की खान| निज को निज, पर को पर जान, फिर दु:ख का नहिं लेश निदान||३|| जिन,शिव,ईश्वर, ब्रह्मा, राम, विष्णु, बुद्ध, हरि जिसके नाम| राग-त्याग पहुँचूं निज-धाम, आकुलता का फिर क्या काम||४|| होता स्वयं जगत् परिणाम, मैं जग का करता क्या काम| दूर हटो पर-कृत परिणाम, सहजानन्द रहूँ अभिराम||५|| हूँ स्वतंत्र निश्चल […] - [श्री महावीर स्वामी जी जिन पूजा - Shree Mahaveer Swami Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-mahaveer-swami-jin-pooja/): कविश्री वृन्दावनदास (मत्त-गयंद छन्द) श्रीमत वीर हरें भव-पीर, भरें सुख-सीर अनाकुलताई | केहरि-अंक अरीकर-दंक, नयें हरि-पंकति-मौलि सुहाई || मैं तुमको इत थापत हूं प्रभु! भक्ति-समेत हिये हरषाई | हे करुणा-धन-धारक देव! इहाँ अब तिष्ठहु शीघ्रहि आई || ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव: भव: वषट्! (इति सन्निधिकरणम्) क्षीरोदधि-सम शुचि नीर, कंचन-भृंग भरूं| प्रभु वेग हरो भवपीर, यातैं धार करूं|| श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो| जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मति-दायक हो|| ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१। मलयागिर चंदनसार, केसर-संग […] - [VAIRAGYA BHAVNA - जैन वैराग्य भावना : श्री वज्रनाभि चक्रवर्ती](https://jinvani.in/vairagya-bhavna/): भाषाकार : कविश्री भूधरदास (दोहा) बीज राख फल भोगवे, ज्यों किसान जग-माँहिं| त्यों चक्री-नृप सुख करे, धर्म विसारे नाहिं ||१|| (जोगीरासा व नरेन्द्र छन्द) इहविधि राज करे नरनायक, भोगे पुण्य-विशालो| सुख-सागर में रमत निरंतर, जात न जान्यो कालो|| एक दिवस शुभ कर्म-संजोगे, क्षेमंकर मुनि वंदे| देखि श्रीगुरु के पदपंकज, लोचन-अलि आनंदे ||२|| तीन-प्रदक्षिण दे सिर नायो, कर पूजा थुति कीनी| साधु-समीप विनय कर बैठ्यो, चरनन-दृष्टि दीनी|| गुरु उपदेश्यो धर्म-शिरोमणि, सुनि राजा वैरागे| राज-रमा वनितादिक जे रस, ते रस बेरस लागे ||३|| मुनि-सूरज-कथनी-किरणावलि, लगत भरम-बुधि भागी| भव-तन-भोग-स्वरूप विचार्यो, परम-धरम-अनुरागी|| इह संसार-महावन भीतर, भरमत ओर न आवे| जामन-मरन-जरा दव-दाहे, जीव महादु:ख पावे||४|| […] - [सामायिक पाठ - Samayik Path | नित देव मेरी आत्मा](https://jinvani.in/samayik-path-ramcharit/): कविश्री रामचरित उपाध्याय नित देव! मेरी आत्मा, धारण करे इस नेम को, मैत्री रहे सब प्राणियों से, गुणी-जनों से प्रेम हो| उन पर दया करती रहे, जो दु:ख-ग्राह-ग्रहीत हैं, सम-भाव उन सबसे रहे, जो वृत्ति में विपरीत हैं ||१|| करके कृपा कुछ शक्ति ऐसी, दीजिए मुझमें प्रभो ! तलवार को ज्यों म्यान से, करते विलग हैं हे विभो !! गतदोष आत्मा शक्तिशाली, है मिली मम-अंग से, उसको विलग उस भाँति करने के लिये ऋजु-ढंग से ||२|| हे नाथ! मेरे चित्त में, समता सदा भरपूर हो, सम्पूर्ण ममता की कुमति, मेरे हृदय से दूर हो| वन में भवन में दु:ख में, […] - [सामायिक पाठ | Samayik Path(प्रेम भाव हो सब जीवों से)](https://jinvani.in/samayik-path-prem-bhav-ho/): प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनों में हर्ष प्रभो। करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ १॥ यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो। ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ २॥ सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो। वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ ३॥ जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ। वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ ४॥ एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो। शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य […] - [सामायिक पाठ - Samayak Path(काल-अनंत भ्रम्यो)](https://jinvani.in/samayak-path-kaal-anant/): कविश्री बुध महाचंद्र प्रथम : प्रतिक्रमण-कर्म काल-अनंत भ्रम्यो जग में सहये दु:ख-भारी | जन्म-मरण नित किये पाप को है अधिकारी || कोटि-भवांतर माँहिं मिलन-दुर्लभ सामायिक | धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक ||१|| हे सर्वज्ञ जिनेश! किये जे पाप जु मैं अब | ते सब मन-वच-काय-योग की गुप्ति बिना लभ || आप-समीप हजूर माँहिं मैं खड़ो-खड़ो सब | दोष कहूँ सो सुनो करो नठ दु:ख देहिं जब ||२|| क्रोध-मान-मद-लोभ-मोह-मायावशि प्रानी | दु:ख-सहित जे किये दया तिनकी नहिं आनी || बिना-प्रयोजन एकेंद्रिय वि-ति-चउ-पंचेंद्रिय | आप-प्रसादहि मिटे दोष जो लग्यो मोहि जिय ||३|| आपस में इकठौर थापकरि जे दु:ख दीने | […] - [भावना बत्तीसी | Bhavna Battisi](https://jinvani.in/bhavna-battisi/): भावना द्वात्रिंशतिका आचार्य अमितगति मेरा आतम सब जीवों पर मैत्री भाव करेगुणगणमंडित भव्य जनों पर प्रमुदित भाव धरे |दीन दुखी जीवों पर स्वामी! करुणाभाव करेऔर विरोधी के ऊपर नित समताभाव धरे ||1|| तुम प्रसाद से हो मुझमे वह शक्ति नाथ! जिससेअपने शुद्ध अतुल बलशाली चेतन को तन से |पृथक कर सकूं पूर्णतया मैं जो योद्धा रण मेंखीचें जिन तलवार म्यान से रिपु सन्मुख क्षण में ||2|| छोड़ा है सब में अपनापन मैंने मन मेराबना रहे नित सुख में दुःख में समता का डेरा |शत्रु-मित्र में, मिलन-विरह में, भवन और वन मेंचेतन को जाना न पड़े फिर नित नूतन तन में […] - [भावना गीत - Bhavna Geet](https://jinvani.in/jain-bhavna-geet/): भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। सत्य संयम शील का, व्यवहार हर घर द्वार हो। भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। धर्म का प्रचार हो, और देश का उद्धार हो। और ये उजड़ा हुआ, भारत चमन गुलजार हो। भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। ज्ञान के अभ्यास से, जीवों का पूर्ण विकास हो। धर्म के परचार से, हिंसा का जग में ह्रास हो॥ भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। शान्ति अरु आनन्द का, हर एक घर में वास हो। वीर वाणी पर सभी, संसार का विश्वास हो|| भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। रोग अरु […] - [श्री विमलनाथ जी जिन पूजा - Shree Vimalnath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-vimalnath-jin-pooja/): सहस्रार दिवि त्यागि, नगर कम्पिला जनम लिय| कृतधर्मानृपनन्द, मातु जयसेना धर्मप्रिय || तीन लोक वर नन्द, विमल जिन विमल विमलकर| थापौं चरन सरोज, जजन के हेतु भाव धर|| ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| सोरठाः- कंचन झारी धारि, पदमद्रह को नीर ले | तृषा रोग निरवारि, विमल विमलगुन पूजिये || ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| मलयागर करपूर देववल्लभा संग घसि| हरि मिथ्यातमभूर, विमल विमलगुन जजतु हौं || ॐ ह्रीं श्रीविमलनाथजिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2| वासमती सुखदास, स्वेत […] - [श्री अनंतनाथ जी जिन पूजा - Shree Anantnath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-anantnath-jin-pooja/): पुष्पोत्तर तजि नगर अजुध्या जनम लियो सूर्या उर आय, सिंघसेन नृप के नन्दन, आनन्द अशेष भरे जगराय| गुन अंनत भगवंत धरे, भवदंद हरे तुम हे जिनराय, थापतु हौं त्रय बार उचरि के, कृपासिन्धु तिष्ठहु इत आय|| ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| शुचि नीर निरमल गंग को ले, कनक भृंग भराइया| मल करम धोवन हेत, मन वच काय धार ढराइया|| जगपूज परम पुनीत मीत, अनंत संत सुहावनो| शिव कंत वंत मंहत ध्यावौं, भ्रंत वन्त नशावनो|| ॐ ह्रीं श्रीअनंतनाथजिनेद्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय […] - [श्री धर्मनाथ जी जिन पूजा - Shree Dharmnath Jin Pooja](https://jinvani.in/%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-shree-dharmna/): तजि के सरवारथसिद्धि विमान, सुभान के आनि आनन्द बढ़ाये| जगमात सुव्रति के नन्दन होय, भवोदधि डूबत जंतु कढ़ाये|| जिनके गुन नामहिं प्रकाश है, दासनि को शिवस्वर्ग मँढ़ाये| तिनके पद पूजन हेत त्रिबार, सुथापतु हौं इहं फूल चढ़ाये|| ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| मुनि मन सम शुचि शीर नीर अति, मलय मेलि भरि झारी| जनमजरामृत ताप हरन को, चरचौं चरन तुम्हारी|| परमधरम-शम-रमन धरम-जिन, अशरन शरन निहारी| पूजौं पाय गाय गुन सुन्दर नाचौं दे दे तारी|| ॐ ह्रीं श्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय […] - [श्री शांतिनाथ जिन पूजा – Shri Shantinaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shri-shantinaath-jin-pooja/): कविश्री बख्तावरसिंह (अडिल्ल छंद) सर्वारथ सुविमान त्याग गजपुर में आये| विश्वसेन भूपाल तासु के नंद कहाये|| पंचम-चक्री भये मदन-द्वादशवें राजे| मैं सेवूँ तुम चरण तिष्ठये ज्यों दु:ख भाजे|| ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्) (अष्टक) पंचम-उदधि तनो जल निरमल, कंचन-कलश भरे हरषाय| धार देत ही श्रीजिन-सन्मुख, जन्म-जरा-मृतु दूर भगाय|| शांतिनाथ पंचम-चक्रेश्वर, द्वादश-मदन तनो पद पाय| तिनके चरण-कमल के पूजे, रोग-शोक-दु:ख-दारिद जाय|| ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१। मलयागिर चंदन कदली-नंदन, […] - [श्री कुंथुनाथ जी जिन पूजा - Shree Kunathunath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-kunathunath-jin-pooja/): अज अंक अजै पद राजै निशंक, हरे भवशंक निशंकित दाता| मदमत्त मतंग के माथे गँथे, मतवाले तिन्हें हने ज्यों अरिहाता|| गजनागपुरै लियो जन्म जिन्हौं, रवि के प्रभु नंदन श्रीमति-माता| सो कुंथु सुकंथुनि के प्रतिपालक, थापौं तिन्हें जुतभक्ति विख्याता| ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र | अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र | अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं श्रीकुंथुनाथजिनेन्द्र | अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | कुंथु सुन अरज दास केरी, नाथ सुन अरज दासकेरी| भवसिन्धु पर्यो हौं नाथ, निकारो बांह पकर मेरी|| प्रभु सुन अरज दासकेरी, नाथ सुन अरज दासकेरी| जगजाल पर्यो हौं वेगि निकारो बांह पकर […] - [श्री अरहनाथ जी जिन पूजा - Shree Arahnaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-arahnaath-jin-pooja/): तप तुरंग असवार धार, तारन विवेक कर| ध्यान शुकल असिधार शुद्ध सुविचार सुबखतर|| भावन सेना, धर्म दशों सेनापति थापे| रतन तीन धरि सकति, मंत्रि अनुभो निरमापे|| सत्तातल सोहं सुभटि धुनि, त्याग केतु शत अग्र धरि| इहविध समाज सज राज को, अर जिन जीते कर्म अरि|| ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| कनमनिमय झारी, दृग सुखकारी, सुर सरितारी नीर भरी| मुनिमन सम उज्ज्वल, जनम जरादल, सो ले पदतल धार करी|| प्रभु दीन दयालं, अरिकुल कालं, विरद विशालं […] - [श्री मल्लिनाथ जी जिन पूजा - Shree Mallinath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-mallinath-jin-pooja/): अपराजित तें आय नाथ मिथलापुर जाये| कुंभराय के नन्द, प्रभावति मात बताये|| कनक वरन तन तुंग, धनुष पच्चीस विराजे| सो प्रभु तिष्ठहु आय निकट मम ज्यों भ्रम भाजे|| ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| सुर-सरिता-जल उज्ज्वल ले कर, मनिभृंगार भराई| जनम जरामृतु नाशन कारन, जजहूं चरन जिनराई|| राग-दोष-मद-मोह हरन को, तुम ही हो वरवीरा| यातें शरन गही जगपतिजी, वेगि हरो भवपीरा|| ॐ ह्रीं श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| बावनचंदन कदली नंदन, कुंकुमसंग घिसायो| लेकर पूजौं चरनकमल प्रभु, भवआताप नसायो|| […] - [श्री मुनिसुव्रतनाथ जी जिन पूजा - Shree MunisuvratNath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-munisuvratnath-jin-pooja/): प्रानत-स्वर्ग विहाय लियो जिन, जन्म सु राजगृही-महँ आई। श्रीसुहमित्त पिता जिनके, गुनवान महा पदमा जसु माई।। बीस-धनू तन श्याम छवी, कछु-अंक हरी वर वंश बताई। सो मुनिसुव्रतनाथ प्रभू कहँ, थापत हूँ इत प्रीत लगाई।। ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! (सन्निधिकरणम्) (गीतिका) उज्ज्वल सु जल जिमि जस तिहारो, कनक-झारी में भरूं। जर-मरन-जामन-हरन-कारन, धार तुम पदतर करूं।। शिव-साथ करत सनाथ सुव्रत- नाथ मुनि-गुनमाल हैं। तसु चरन आनंदभरन तारन-तरन विरद विशाल हैं।। ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय […] - [श्री नमिनाथ जी जिन पूजा - Shree Naminaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-naminaath-jin-pooja/): श्री नमिनाथ जिनेन्द्र नमौं विजयारथ नन्दन| विख्यादेवी मातु सहज सब पाप निकन्दन|| अपराजित तजि जये मिथिलापुर वर आनन्दन| तिन्हें सु थापौं यहाँ त्रिधा करि के पदवन्दन|| ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| सुरनदी जल उज्ज्वल पावनं, कनक भृंग भरौं मन भावनं| जजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदांबुज प्रीति लगाय के|| ॐ ह्रीं श्रीनमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| हरिमलय मिलि केशर सों घसौं, जगतनाथ भवातप को नसौं| जजतु हौं नमि के गुण गाय के, जुगपदाम्बुज प्रीति लगाय के|| […] - [श्री पार्श्वनाथ जिन पूजा (बख्तावर सिंह)- SHRI PARSHWANATH JIN POOJA](https://jinvani.in/shri-parshwanath-jin-pooja/): कवि श्री बख्तावरसिंह (गीता छन्द) वर स्वर्ग प्राणत सों विहाय सुमात वामा-सुत भये| अश्वसेन के पारस जिनेश्वर चरन जिनके सुर नये|| नव-हाथ-उन्नत तन विराजे उरग-लच्छन अति लसें| थापूँ तुम्हें जिन आय तिष्ठो! करम मेरे सब नसें|| ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिरणम्) (चामर छन्द) क्षीर-सोम के समान अम्बु-सार लाय के| हेमपात्र धारि के सु आपको चढ़ाय के|| पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा| दीजिए निवास मोक्ष भूलिये नहीं कदा||­ ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। […] - [श्री नेमिनाथ जी जिन पूजा - Shree Neminath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-neminath-jin-pooja/): जैतिजै जैतिजै जैतिजै नेमकी, धर्म औतार दातार श्यौचैनकी| श्री शिवानंद भौफंद निकन्द, ध्यावें जिन्हें इन्द्र नागेन्द्र ओ मैनकी|| परमकल्यान के देनहारे तुम्हीं, देव हो एव तातें करौं एनकी| थापि हौं वार त्रै शुद्ध उच्चार के, शुद्धताधार भवपार कूं लेन की|| ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय, ||टेक|| गंग नदी कुश प्राशुक लीनो, कंचन भृंग भराय| मन वच तन तें धार देत ही, सकल कलंक नशाय|| दाता मोक्ष के, श्रीनेमिनाथ जिनराय|| दाता0 ॐ ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्राय […] - [श्री वासुपूज्य जी जिन पूजा - Shree Vasupujya Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-vasupujya-jin-pooja/): श्रीमत् वासुपूज्य जिनवर पद, पूजन हेत हिये उमगाय| थापौं मन वच तन शुचि करके, जिनकी पाटलदेव्या माय|| महिष चिह्न पद लसे मनोहर, लाल वरन तन समतादाय| सो करुनानिधि कृपादृष्टि करि, तिष्ठहु सुपरितिष्ठ इहं आय|| ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| गंगाजल भरि कनक कुंभ में, प्रासुक गंध मिलाई| करम कलंक विनाशन कारन, धार देत हरषाई|| वासुपूज्य वसुपूज-तनुज-पद, वासव सेवत आई| बाल ब्रह्मचारी लखि जिन को, शिव तिय सनमुख धाई|| ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| […] - [श्री श्रेयांसनाथ जी जिन पूजा - Shree Shreyanshnath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-shreyanshnath-jin-pooja/): विमल नृप विमला सुअन, श्रेयांसनाथ जिनन्द| सिंहपुर जन्मे सकल हरि, पूजि धरि आनन्द|| भव बंध ध्वंसनिहेत लखि मैं शरन आयो येव| थापौं चरन जुग उरकमल में, जजनकारन देव|1| ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| कलधौत वरन उतंग हिमगिरि पदम द्रह तें आवई| सुरसरित प्रासुक उदक सों भरि भृंग धार चढ़ावई|| श्रेयांसनाथ जिनन्द त्रिभुवन वन्द आनन्दकन्द हैं| दुखदंद फंद निकंद पूरन चन्द जोतिअमंद हैं|| ॐ ह्रीं श्रीश्रेयांसनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| गोशीर वर करपूर कुंकुम नीर संग घसौं सही| भवताप […] - [श्री शीतलनाथ जी जिन पूजा - Shree Sheetalnaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-sheetalnaath-jin-pooja/): शीतलनाथ नमौं धरि हाथ, सु माथ जिन्हों भव गाथ मिटाये | अच्युत तें च्युत मात सुनन्द के, नन्द भये पुर बद्दल आये || वंश इक्ष्वाकु कियो जिन भूषित, भव्यन को भव पार लगाये | ऐसे कृपानिधि के पद पंकज, थापतु हौं हिय हर्ष बढ़ाये || ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| देवापगा सु वर वारि विशुद्ध लायो, भृंगार हेम भरि भक्ति हिये बढ़ायो| रागादिदोष मल मर्दन हेतु येवा, चर्चौं पदाब्ज तव शीतलनाथ देवा|| ॐ ह्रीं श्रीशीतलनाथ […] - [श्री पुष्पदंत जिन पूजा - Shree Pushpdant Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-pushpdant-jin-pooja/): पुष्पदन्त भगवन्त सन्त सु जपंत तंत गुन| महिमावन्त महन्त कन्त शिवतिय रमन्त मुन|| काकन्दीपुर जन्म पिता सुग्रीव रमा सुत| श्वेत वरन मनहरन तुम्हैं थापौं त्रिवार नुत|| ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| हिमवन गिरिगत गंगाजल भर, कंचन भृंग भराय| करम कलंक निवारनकारन, जजौं, तुम्हारे पाय|| मेरी अरज सुनीजे, पुष्पदन्त जिनराय, मेरी अरज सुनीजे|| ॐ ह्रीं श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| बावन चन्दन कदलीनंदन, कुंकुम संग घसाय| चरचौं चरन हरन मिथ्यातम, वीतराग गुण गाय|| मेरी अरज […] - [श्री चंद्रप्रभु जिन पूजा - Shree Chandraprabhu Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-chandraprabhu-jin-pooja/): चारुचरन आचरन, चरन चितहरन चिन्ह चर | चंद-चंद-तनचरित, चंद थल चहत चतुर नर || चतुक चंड चकचूरि, चारि चिद्चक्र गुनाकर | चंचल चलित सुरेश, चूलनुत चक्र-धनुरधर || चर अचर हितू तारन तरन, सुनत चहकि चिर नंद शुचि | जिनचंद चरन चरच्यो चहत, चितचकोर नचि रच्चि रुचि |1| धनुष डेढ़ सौ तुंग तन, महासेन नृपनंद | मातु लछमना उर जये, थापौं चंद जिनंद || ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | गंगाह्रद निरमल नीर, हाटक […] - [श्री पद्मप्रभ जिन पूजा (बाड़ा) - Shree Padamprabu Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-padamprabu-jin-pooja/): श्रीधर-नंदन पद्मप्रभ, वीतराग जिननाथ| विघ्नहरण मंगलकरन, नमौं जोरि जुग-हाथ|| जन्म-महोत्सव के लिए, मिलकर सब सुरराज| आये कौशाम्बी नगर, पद-पूजा के काज|| पद्मपुरी में पद्मप्रभ, प्रकटे प्रतिमा-रूप| परम दिगम्बर शांतिमय, छवि साकार अनूप|| हम सब मिल करके यहाँ, प्रभु-पूजा के काज| आह्वानन करते सुखद, कृपा करो महाराज|| ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट (आहवानानम्)। ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री पद्मप्रभजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणं)। (अष्टक) क्षीरोदधि उज्ज्वल नीर, प्रासुक-गंध भरा| कंचन-झारी में लेय, दीनी धार धरा|| बाड़ा के पद्म-जिनेश, मंगलरूप सही| काटो सब क्लेश महेश, मेरी अर्ज यही|| […] - [श्री संभवनाथ जिन पूजा - Shree Sambhavnaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-sambhavnaath-jin-pooja/): जय संभव जिनचन्द्र सदा हरिगनचकोरनुत| जयसेना जसु मातु जैति राजा जितारिसुत|| तजि ग्रीवक लिय जन्म नगर श्रावस्ती आई| सो भव भंजन हेत भगत पर होहु सहाई |1| ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीसंभवनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| अष्टक छन्द चौबोला तथा अनेक रागों में गाया जाता है| मुनि मन सम उज्ज्वल जल लेकर, कनक कटोरी में धार| जनम जरा मृतु नाश करन कों, तुम पदतर ढारों धारा|| संभव जिन के चरन चरचतें, सब आकुलता मिट जावे| निज निधि ज्ञान दरश […] - [श्री अभिनन्दननाथ जिन पूजा - Shree Abhinandannaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-abhinandannaath-jin-pooja/): छन्द अभिनन्दन   आनन्दकंद,   सिद्धारथनन्दन| संवर  पिता  दिनन्द  चन्द,  जिहिं  आवत वन्दन|| नगर  अयोध्या  जनम  इन्द, नागिंद  जु  ध्यावें| तिन्हें जजन के हेत थापि,  हम मंगल गावें |1| ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्र ! अत्र मम सभिहितो भव भव वषट्|   छन्द गीता, हरिगीता तथा रुपमाला पदमद्रहगत गंगचंग, अंभग-धार सु धार है| कनकमणि नगजड़ित झारी, द्वार धार निकार है|| कलुषताप निकंद श्रीअभिनन्द, अनुपम चन्द हैं| पद वंद वृन्द जजें प्रभू, भवदंद फंद निकंद हैं|| ॐ ह्रीं श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1|   शीतल चन्दन कदलि नन्दन, जल सु संग घसाय के| होय सुगंध दशों […] - [श्री सुमतिनाथ जिन पूजा - Shree Sumtinaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-sumtinaath-jin-pooja/): संजम रतन विभूषन भूषित, दूषन वर्जित श्री जिनचन्द| सुमति रमा रंजन भवभंजन, संजययंत तजि मेरु नरिंद|| मातु मंगला सकल मंगला, नगर विनीता जये अमंद| सो प्रभु दया सुधा रस गर्भित आय तिष्ठ इत हरो दुःख दंद |1| ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| पंचम उदधितनों सम उजज्वल, जल लीनों वरगंध मिलाय| कनक कटोरी माहिं धारि करि, धार देहु सुचि मन वच काय|| हरिहर वंदित पापनिकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुवनके राय| तुम पद पद्म सद्म शिवदायक, जजत मुदितमन उदित […] - [श्री सुपार्श्वनाथ जिन पूजा - Shree Suparshvnaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-suparshvnaath-jin-pooja/): जय जय जिनिंद गनिंद इन्द, नरिंद गुन चिंतन करें| तन हरीहर मनसम हरत मन, लखत उर आनन्द भरें|| नृप  सुपरतिष्ठ  वरिष्ठ  इष्ट,  महिष्ठ शिष्ट  पृथी  प्रिया| तिन नन्दके पद वन्द वृन्द, अमंद थापत जुतक्रिया|| ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्| ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः| ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्| उज्ज्वल जल शुचि गंध मिलाय, कंचनझारी भरकर लाय| दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो|| तुम पद पूजौं मनवचकाय, देव सुपारस शिवपुरराय| दया निधि हो, जय जगबंधु दया निधि हो|| ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| मलयागिर […] - [चतुर्थकालीन सॉंगानेर वाले बाबा ऋषभदेव की आरती](https://jinvani.in/rishabhdev-ki-aarti/): रचियता – लालचन्द जी जैन (राकेश) ॐ जय आदिनाथ बाबा, स्वामी आदिनाथ बाबा। साँगानेर वाले बाबा की, देव करें सेवा।। ॐ जय……. पिता प्रभु के नाभिराय हैं, मरुदेवी माता। नगर अयोध्या जन्म लिया हैं, सुख वैभवदाता।। ॐ जय…….. पंचकल्याणक हुए आपके, सबको सुख दाई। चतुर्थकाल की प्रतिमा है यह, मेरे मन भाई ।। ॐ जय…… वैसाख सुदि की तीज तिथि को, अतिशय दिखलाया। गजरथ में प्रभु आये यहाँ पर, तब दर्शन पाया।। ॐ जय ……. संघी जी भगवानदास ने मंदिर बनवाया। धर्म दिगम्बर अनुयायी थे, अक्षय थी माया।। ॐ जय……. सात मंजिला मंदिर है यह, देव यहाँ आते। पांच मंजिला […] - [आदिनाथ भगवान की आरती - Aadinath Bhagwan ki Aarti](https://jinvani.in/aadinath-bhagwan-ki-aarti/): आरती करहूं जग देवन की । जय बोलो नाभि के नन्दन की। जय बोलो नाभि के नन्दन की। सांगानेर में आप बिराजे, छत्र तीन मस्तक पर छाजे; छबि सबके मन भावन की, जय बोलो नाभि के नन्दन की जय बोलो नाभि के नन्दन की। महिमा तुम्हारी जग में न्यारी, कर्म दलन संतन हितकारी; कटें भवबाधा जन जन की, जय बोलो नाभि के नन्दन की जय बोलो नाभि के नन्दन की। भर भर घृत के दीप जलाये, नाचैं गावैं हर्ष मनावैं; महिमा गावैं चरणन की, जय बोलो नाभि के नन्दन की जय बोलो नाभि के नन्दन की। भाव सहित जो तुमको […] - [भगवान आदिनाथ की आरती - Bhagwan Aadinath ki Aarti](https://jinvani.in/bhagwan-aadinath-ki-aarti/): ओम् जय आदिनाथ देवा, स्वामी आदिनाथ देवा। सुर नर किन्नर ऋषिगण, करते तब सेवा।। ओम् जय० नगर अयोध्या जन्म लिया प्रभु, वैभव था भारी। नाभिराय पितु माँ मरु देवी, तुम भव दुख हारी।। ओम् जय० धनुष पांच सौ काय आपकी, स्वर्ण वर्णधारी। प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव तुम हो जग अघहारी।। ओम् जय० वीतराग निर्ग्रथ भये तुम, तप कीना भारी। वर्ष सहत तप के प्रभाव से मिली मुक्ति नारी।। ओम् जय० गौमुख यक्ष यक्षी चक्रेश्वरी, तव मंगल गाये। अक्षय तरु तल ध्यान लीन हो, तुम केवल पाये। ओम् जय० माघ कृष्ण शुभ चतुर्दशी को हुए मुक्ति स्वामी। धन्य हुआ कैलाश शिखर प्रभु, […] - [चौबीसों भगवान की आरती - Chaubeeson Bhagwan ki Aarti](https://jinvani.in/chaubeeson-bhagwan-ki-aarti/): करहूं आरती आज जिनेश्वर तुम्हरे द्वारे; कर दो भव से पार लगा दो नैया किनारे, ऋषभ अजित सम्भव जिन स्वामी; अभिनन्दन भगवान लगा दो नैया किनारे, सुमति पद्म सुपार्श्व जिन स्वामी; चन्दाप्रभु भगवान, लगा दो नैया किनारे, पुष्प श्रेय शीतल जिन स्वामी; वासुपूज्य भगवान, लगा दो नैया किनारे, विमल अनन्त धर्म जिन स्वामी; शान्तिनाथ भगवान, लगा दो नैया किनारे, कुन्धु अरह मल्लि जिन स्वामी; मुनिसुव्रत भगवान, लगा दो नैया किनारे, नमि नेमि पारस जिन स्वामी; वर्धमान भगवान, लगा दो नेया किनारे, करहुं आरती आज जिनेश्वर तुम्हरे द्वारे; कर दो भव से पार, लगा दो नैया किनारे, ***** ये भी पढे […] - [आरती पंचपरमेष्ठी - Aarti Panchaparmeshthi Ki](https://jinvani.in/aarti-panchaparmeshthi/): इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। टेक। पहली आरती श्री जिनराजा, भवदधि पार उतार जिहाजा।। इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। दूसरी आरती सिद्धन केरी, सुमरन करत मिटै भव फेरी।। इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। तीसरी आरती सूरि मुनिन्दा, जनम-मरण दुख दूर करिन्दा।। इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। चौथी आरती श्रीउवज्झाया, दर्शन देखत पाप पलाया।। इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। पांचमी आरती साधु तिहारी, कुमति-विनाशन शिव अधिकारी।। इहविधि मंगल आरती कीजै, पंच परमपद भज सुख लीजै।। छट्टी ग्यारह प्रतिमाधारी, श्रावक वंदों आनन्दकारी।। […] - [श्री आदिनाथ जिन पूजा – Shree Aadinaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-aadinaath-jin-pooja/): कविश्री जिनेश्वरदास (कुसुमलता छंद)नाभिराय-मरुदेवि के नंदन, आदिनाथ स्वामी महाराज|सर्वार्थसिद्धि तें आय पधारे, मध्य-लोक माँहिं जिनराज||इन्द्रदेव सब मिलकर आये, जन्म-महोत्सव करने काज|आह्वानन सब विधि मिलकर के, अपने कर पूजें प्रभु आज||ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्)ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्)ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (इति सन्निधिकरणम्) क्षीरोदधि को उज्ज्वल-जल ले, श्री जिनवर-पद पूजन जाय|जन्म-जरा-दु:ख मेटन कारन, ल्याय चढ़ाऊँ प्रभुजी के पाँय||श्रीआदिनाथजी के चरणकमल पर, बलिबलि जाऊँ मन-वच-काय|हो करुणानिधि भव-दु:ख मेटो, या तें मैं पूजूं प्रभु-पाँय||ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१। मलयागिरि-चंदन दाह-निकंदन, कंचन-झारी में […] - [श्री अजितनाथ जिन पूजा - Shree Ajitnaath Jin Pooja](https://jinvani.in/shree-ajitnaath-jin-pooja/): त्याग वैजयन्त सार सार-धर्म के अधार,जन्मधार धीर नम्र सुष्टु कौशलापुरी|अष्ट दुष्ट नष्टकार मातु वैजयाकुमार,आयु लक्षपूर्व दक्ष है बहत्तरैपुरी||ते जिनेश श्री महेश शत्रु के निकन्दनेश,अत्र हेरिये सुदृष्टि भक्त पै कृपा पुरी|आय तिष्ठ इष्टदेव मैं करौं पदाब्जसेव,परम शर्मदाय पाय आय शर्न आपुरी||  ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्रावतरावतर संवौषट् |ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |      अष्टकगंगाह्रदपानी निर्मल आनी, सौरभ सानी सीतानी |तसु धारत धारा तृषा निवारा, शांतागारा सुखदानी ||श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं |मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजौं ख्याता जग्गेशं ||ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय जन्म जरा मृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1|  शुचि चंदन बावन ताप मिटावन, सौरभ पावन घसि ल्यायो |तुम भवतपभंजन हो शिवरंजन, पूजन रंजन मैं आयो || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2|  सितखंड विवर्जित निशिपति तर्जित, पुंज विधर्जित तंदुल को |भवभाव निखर्जित शिवपदसर्जित, आनंदभर्जित दंदल को || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अक्षय पदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3|  मनमथ-मद-मंथन धीरज-ग्रंथन, ग्रंथ-निग्रंथन ग्रंथपति |तुअ पाद कुसेसे आधि कुशेसे, धारि अशेसे अर्चयती || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4|  आकुल कुलवारन थिरताकारन, क्षुधाविदारन चरु लायो |षट् रस कर भीने अन्न नवीने, पूजन कीने सुख पायो || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5|  दीपक-मनि-माला जोत उजाला, भरि कनथाला हाथ लिया |तुम भ्रमतम हारी शिवसुख कारी, केवलधारी पूज किया |श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं |मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजौं ख्याता जग्गेशं ||ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6|  अगरादिक चूरन परिमल पूरन, खेवत क्रूरन कर्म जरें |दशहूं दिश धावत हर्ष बढ़ावत, अलि गुण गावत नृत्य करें || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7|  बादाम नंरगी श्रीफल पुंगी आदि अभंगी सों अरचौं |सब विघनविनाशे सुख प्रकाशै, आतम भासै भौ विरचौं ||श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8|  जलफल सब सज्जे, बाजत बज्जै, गुनगनरज्जे मनमज्जे |तुअ पदजुगमज्जै सज्जन जज्जै, ते भवभज्जै निजकज्जै ||श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9|  पंचकल्याणक जेठ असेत अमावशि सोहे, गर्भदिना नँद सो मन मोहे |इंद फनिंद जजे मनलाई, हम पद पूजत अर्घा चढ़ाई ||ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णा-अमावस्यां गर्भमंगलप्राप्तायश्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि0स्वाहा |1|  माघ सुदी दशमी दिन जाये, त्रिभुवन में अति हरष बढ़ाये |इन्द फनिंद जजें तित आई, हम इत सेवत हैं हुलशाई ||ॐ ह्रीं माघशुक्ला दशमीदिने जन्मंगलप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |2|  माघ सुदी दशमी तप धारा, भव तन भोग अनित्य विचारा |इन्द फनिंद जजैं तित आई, हम इत सेवत हैं सिरनाई ||ॐ ह्रीं माघशुक्ला दशमीदिने दीक्षाकल्याणकप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |3|  पौषसुदी तिथि ग्यारस सुहायो, त्रिभुवनभानु सु केवल जायो |इन्द फनिंद जजैं आई, हम पद पूजत प्रीति लगाई ||ॐ ह्रीं पौषशुक्लाएकादशीदिनेज्ञानकल्याणकप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |4|  पंचमि चैतसुदी निरवाना, निजगुनराज लियो भगवाना |इन्द फनिंद जजैं तित आई, हम पद पूजत हैं गुनगाई ||ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ला पंचमीदिने निर्वाणमंगलप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं0 |5|  जयमालादोहाः- अष्ट दुष्टको नष्ट करि इष्टमिष्ट निज पाय |शिष्ट धर्म भाख्यो हमें पुष्ट करो जिनराय |1|  जय अजित देव तुअ गुन अपार, पै कहूँ कछुक लघु बुद्धि धार|दश जनमत अतिशय बल अनन्त, शुभ लच्छन मधुबचन भनंत |2|संहनन प्रथम मलरहित देह, तन सौरभ शोणित स्वेत जेह|वपु स्वेदबिना महरुप धार, समचतुर धरें संठान चार |3|दश केवल, गमन अकाशदेव, सुरभिच्छ रहै योजन सतेव|उपसर्गरहित जिनतन सु होय, सब जीव रहित बाधा सुजोय |4|मुख चारि सरबविद्या अधीश, कवलाअहार सुवर्जित गरीश|छायाबिनु नख कच बढ़ै नाहिं, उन्मेश टमक नहिं भ्रकुटि माहिं |5|सुरकृत दशचार करों बखान, सब जीवमित्रता भाव जान|कंटक विन दर्पणवत सुभूम, सब धान वृच्छ फल रहै झूम |6|षटरितु के फूल फले निहार, दिशि निर्मल जिय आनन्द धार|जंह शीतल मंद सुगंध वाय, पद पंकज तल पंकज रचाय |7|मलरहित गगन सुर जय उचार, वरषा गन्धोदक होत सार|वर धर्मचक्र आगे चलाय, वसु मंगलजुत यह सुर रचाय |8|सिंहासन छत्र चमर सुहात, […] - [श्री महावीर जिन पूजा 2022 || New Shri Mahaveer Jin Pooja](https://jinvani.in/new-mahaveer-jin-pooja/): भारत छन्द हे जिन वीर महति अतिवीर, महावीर सन्मति देव हमारे हे अन्तिम जिनशासन नायक, तीर्थ तुम्हारा भव से तारे। त्रिशला नन्दन तुम को वन्दन, हे सिद्धारथ राज दुलारे मेरे उर के सिंहासन पर, शीघ्र पधारो भक्त निहारे॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरमहावीरजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ! अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधीकरणम् ! विद्याब्धिछन्द- लय- हे दीनबन्धु …….। शुचि कूप नीर छान जीव कूप में किये, जन्मादि रोग नाशने अचित्त जल लिये। पृथिवी जलाग्नि वायु वृक्ष दुःख नाश दो, हे वीरनाथ भगवन्! अर्जी पे ध्यान दो ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरमहावीरजिनेन्द्राय […] - [श्री पार्श्वनाथ जिन पूजा 2022 || New Parasnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-parasnath-jin-pooja/): विद्याब्धि छन्द (तर्ज- हम लाये हैं तूफान से…..1) श्री विश्वसेन भूप बाल, लोक भाल हो, वाराणसी में जन्म लिया, अहि कृपाल हो । तेईसवें जिन ! आपने, मन अक्ष जीत के, कैवल्य ज्ञान पा लिया, उपसर्ग जीत के ॥ हे पार्श्वनाथ! आपसे, है ज्ञान उजाला, भव्यों ने मोक्षमार्ग को, तुमसे है सम्हाला। कर्मों को नाशने चरण की, अर्चना करूँ, विनयादि गुण की प्राप्ति हेतु, वन्दना करूँ ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकर श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ! दृग मोह के अभाव से, सम्यक्त्व मिल […] - [श्री शान्तिनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Shantinath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-shantinath-jin-pooja/): ज्ञानोदय छंद शान्तिनाथ सोलम तीर्थंकर, पंचम चक्री पद त्यागी। कामदेव द्वादशवें प्रभु की पूजा करते बड़भागी॥ हस्तिनापुर ऐरा माता, विश्वसेन नृप तात रहे। पाँचों कल्याणक से मण्डित, शान्तिनाथ जिन आप रहे॥ पुष्पदन्त से धर्मनाथ के, बीच तीर्थ विच्छेद रहा। किन्तु शान्ति जिन तीर्थंकर से, अब तक तीर्थ अखेद लहा॥ ऐसे शान्ति प्रदाता जिनवर, भक्तों के उर में आओ। आधि व्याधि दुख उपाधि हरने, हे जिनसूर्य ! समा जाओ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकर श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ! राग द्वेष वश मोह कर्म वश, […] - [श्री नेमिनाथ जिन पूजा 2022 || New Neminath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-neminath-jin-pooja/): योगिनी बोधिनी छन्द लय- एक सौ त्रेसठ…… नेमि तीर्थेश जिन वीतरागी हुए, राजिमति त्याग के मुक्ति रागी हुए बाल ब्रह्मेश जिन मम हृदय आइये, पूजते भक्ति से दुःख हर जाइये॥ ॐ ह्रीं तीर्थंकर नेमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । देह से नेह तज आप संयम धरा, पूर्ण संयम मिले लाय घट जल भरा। आप सी त्याग की बुद्धि मुझे दीजिए, नेमि जिन आपकी शरण में लीजिए॥ ओं ह्रीं श्री नेमिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। देह नश्वर समझ आपने तप धरा पाप आतप हरो […] - [श्री कुन्थुनाथ जिन पूजा 2022 | New Shri Kunthunath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-kunthunath-jin-pooja/): जिनगीतिका छन्द सर्वार्थ सिद्धि विमान से जिन, नाथ बनने उतरते। प्रभु हस्तिनापुर शूरसेन, नृपेश गृह में जनमते॥ जिन कुन्थु तीर्थंकर मदन, चक्रेश पद को धारते। ऐसे जिनेश्वर को हृदय में, पूजने अवतारते॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरकुन्थुनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । कुन्थुजिन छन्दकुन्थु जिन शरणा मिल जाये, चित्त दर्शन को अकुलाये। दुखमय इस संसार भँवर से, नाव उभर जाये॥जिन कुन्थु तीर्थंकर मदन, चक्रेश पद को धारते। ऐसे जिनेश्वर को हृदय में, पूजने अवतारते॥ स्वर्ण पात्र में निर्मल जल को प्रासुक कर लाये। तृषा दोष नाशन के […] - [श्री अरनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Arnath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-arnath-jin-pooja/): तर्ज- दयालु प्रभु से……….. अरनाथ स्वामी, शरण तेरी आये, दुख दूर होवें कर्म के सताये। हथिनापुर  में  जन्म  लिया  है, मित्रा  माता  धन्य  किया  है। तात सुदर्शन नृप हरषाये, सुर नर किन्नर मंगल गाये ॥ अरनाथ स्वामी…….. | षट्खण्ड  स्वामी  कामदेव नामी, त्याग परिग्रह बने मोक्षगामी। वीतराग सर्वज्ञ सुहाये, आज हृदय में हमने बुलाये ॥ अरनाथ स्वामी…….। ओं ह्रीं तीर्थंकर अरनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। जन्म मरण से भीत हुए हैं, निज हित करने प्रीत हुए हैं। प्रभु आपने भव भ्रमण मिटाये, तब तुम पद […] - [श्री मल्लिनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Mallinath Jin Pooja](https://jinvani.in/new-shri-mallinath-jin-pooja/): सखी छन्द अपराजित तज भू आये, मिथिलापुर जन्म लहाये। पितु कुम्भ प्रजावती माता, जिनका यश सब जग गाता॥ प्रभु मल्लिनाथ जिन आते, माता के गर्भ समाते। हम पूजन करने आये, वसु द्रव्य हाथ में लाये॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरमल्लिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्। जल बाह्य मलिनता धोता, पूजन जल अघ मल धोता। जिन पद में नीर चढ़ाते, प्रभु मल्लिनाथ को ध्याते॥ ओं ह्रीं श्री मल्लिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन तन ताप हटाता, पूजन से मन सुख पाता। जिन पद में गन्ध चढ़ाऊँ, जिन […] - [Padmavati Mata Aarti Lyrics in Hindi](https://jinvani.in/padmavati-mata-aarti-lyrics-in-hindi/): Jain Padmavati Mata ki Aarti (रागः- जय जय आरति आदिजिणंदा..) देवी पद्मावती आरती तुमारी,  मंगलकारी जय जय कारी…. देवी पद्मावती आरती तुमारी ||1|| पार्श्व प्रभु छे शिरपर ताहरे,  भक्ति करंतां तुं भक्तोने तारे…. देवी पद्मावती आरती तुमारी.. ||2|| उज्जवल वर्णी मूत्ति शुं सोहे,  नीरखी हरखी सहु जन मोहे….. देवी पद्मावती आरती तुमारी.. ||3|| Also Read :- Padmavati Mata Ki Aarti कुर्कुट सर्पना वाहने बेठी,  भद्रासनथी तुं शोभे छे रुडी…… देवी पद्मावती आरती तुमारी.. ||4|| सप्तफणा शोभे मनोहारी,  नयन मनोहर परिकरधारी….. देवी पद्मावती आरती तुमारी… ||5|| कमल पाशांकुश फळ रुडुं संगे,  चार भुजामां कलामय अंगे.. देवी पद्मावती आरती तुमारी… ||6|| विविध स्वरुपे भिन्न भिन्न नामे,  जगपूजे सहु सिद्धि कामे…. देवी पद्मावती आरती तुमारी… ||7|| Also […] - [Padmavati Mata Ki Aarti | जैन आरती](https://jinvani.in/padmavati-mata-ki-aarti/): पद्मावती माता की आरती पद्मावती माता, दर्शन की बलिहारियां।। टेक०।। पार्श्वनाथ महाराज विराजे मस्तक ऊपर थारे, माता मस्तक ऊपर थारे। इन्द्र, फणेन्द्र, नरेन्द्र सभी मिल, खड़े रहें नित द्वारे। हे पद्मावती माता, दर्शन की बलिहारियां।। दो बार।। जो जीव थारो शरणो लीनो, सब संकट हर लीनो, माता सब संकट हर लीनो। पुत्र, पौत्र, धन, धान्य, सम्पदा, मंगलमय कर दीनो। हे पद्मावती माता, दर्शन की बलिहारियां।। दो बार।। डाकिनि, शाकिनि, भूत, भवानी, नाम लेत भग जायें, माता नाम लेत भग जायें। वात, पित्त, कफ, कुष्ट मिटे अरू तन सुखमय हो जावे। हे पद्मावती माता, दर्शन की बलिहारियां।। दो बार।। दीप, धूप, […] - [भक्तामर स्तोत्र संस्कृत Bhaktamar Stotra in Sanskrit](https://jinvani.in/bhaktamar-stotra-in-sanskrit/): Bhaktamar Stotra Sanskrit  की रचना आचार्य मानतुंग जी ने 7वीं शताब्दी मे की थी, आचार्य मानतुंग जी उस समय के प्रसिद्ध राजा भोज के काल में हुए थे। उन्होंने इसकी रचना तब की जब उन्हें राजा ने किसी कारणवश 48 तालों वाली जेल में बंद करवा दिया था। उन्होंने आदिनाथ भगवान की स्तुति में इस स्तोत्र की रचना की, जिसके प्रभाव से कहा जाता है कि जेल के ताले अपने-आप खुल गए थे। भक्तामर स्तोत्रम् संस्कृत भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।सम्यक्-प्रणम्य जिन प-पाद-युगं युगादा-वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥1॥ य: संस्तुत: सकल-वां मय-तत्त्व-बोधा-दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै: ।स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:,स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥2॥ बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम् ।बालं विहाय […] - [Om Aum Meaning - ॐ का जैन धर्म में अर्थ](https://jinvani.in/om-aum-meaning/): ॐ (औम) का जैन धर्म में अर्थ जैन धर्म में “ॐ” (Aum) एक पवित्र ध्वनि और प्रतीक है, जो आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व रखता है। यह मंत्र जैन परंपराओं में गहन अर्थ लिए हुए है और इसे आत्मा की शुद्धता, आध्यात्मिक जागरूकता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ा जाता है। नीचे जैन धर्म में ॐ के अर्थ को विस्तार से समझाया गया है। जैन धर्म में ॐ (AUM) का प्रतीकात्मक अर्थ जैन धर्म में ॐ को पंच परमेष्ठी (पाँच सर्वोच्च आत्माओं) का प्रतीक माना जाता है। ये पंच परमेष्ठी जैन धर्म के आध्यात्मिक आदर्श हैं, जो आत्मा के उद्धार और मोक्ष […] - [Jinvani Book: Poojan Paath Pradeep Jinvani Sangrah](https://jinvani.in/jinvani-book-poojan-paath-pradeep-jinvani-sangrah/): जिनवाणी पुस्तक: आत्मज्ञान की ओर एक कदम परिचय भारतीय धर्मों में ज्ञान का स्थान सर्वोपरि रहा है, और जैन धर्म में तो ज्ञान को मोक्ष प्राप्ति का सीधा मार्ग माना गया है। इसी ज्ञान का मुख्य स्रोत है जिनवाणी — अर्थात् तीर्थंकरों और गणधर भगवंतों की वह दिव्य वाणी, जो आत्मा को अज्ञान से निकालकर मोक्ष के प्रकाश की ओर ले जाती है। Jinvani Books, इन्हीं अमूल्य उपदेशों और शास्त्रों का संकलन हैं। ये पुस्तकें आज केवल पारंपरिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि डिजिटल स्वरूप में भी उपलब्ध हैं, जिससे हर व्यक्ति कहीं से भी इस पवित्र ज्ञान का […] - [Symbol Jainism: जैन धर्म का प्रतीक](https://jinvani.in/symbol-jainism/): जैन धर्म क्या है? इतिहास और तीर्थंकर जैन धर्म की शुरुआत किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं हुई, बल्कि यह एक शाश्वत सत्य (सनातन धर्म) पर आधारित है, जिसे समय-समय पर **तीर्थंकरों** द्वारा प्रकट किया जाता है। ‘तीर्थंकर’ शब्द का अर्थ है ‘तीर्थ’ यानी घाट या पुल बनाने वाला, जो संसार रूपी सागर को पार करने का मार्ग दिखाता है। जैन परम्परा मानती है कि इस कालचक्र में 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिन्होंने ज्ञान प्राप्त किया और फिर अपने ज्ञान को दूसरों के साथ साझा किया। इनमें पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) थे, और 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर (वर्धमान) थे, […] - [Jab Koi Nahi Aata Mere Dada Aate Hai Lyrics](https://jinvani.in/jab-koi-nahi-aata-mere-dada-aate-hai-lyrics/): “जब कोई नहीं आता, मेरे दादा आते हैं” एक हृदयस्पर्शी जैन भजन है, जो भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है। इस भजन में भक्त अपनी विपरीत परिस्थितियों, निराशा, अकेलेपन और संकट के क्षणों में प्रभु पर गहरा भरोसा जताता है कि जब संसार के सभी सहारे साथ छोड़ दें, तब प्रभु ही एकमात्र सहारा होते हैं। भजन में गहराई से इस भाव को व्यक्त किया गया है कि भगवान के चरणों में जाने पर ही सच्ची शांति, शक्ति और मार्गदर्शन मिलता है। यह हमें सिखाता है कि प्रभु हमेशा हमारे साथ हैं — हमें बस सच्चे […] - [।। पार्श्वनाथाष्टकम् ।। Jain Parshvanath Ashtak](https://jinvani.in/parshvanath-ashtak/): यह रहा पार्श्वनाथाष्टकम् (Parshvanathashtakam) – जो भगवान पार्श्वनाथ (24 में से 23वें तीर्थंकर) को समर्पित एक अत्यंत पवित्र जैन स्तोत्र है। यह स्तोत्र उनके गुणों का स्तवन करता है और भक्ति, शांति एवं मोक्ष की भावना जाग्रत करता है। Parshvanath Ashtakam “अरहंत नाम स्मरण विमुक्तिमार्ग द्योषकम्। धरणेन्द्र चक्र फणधरं नमामि पार्श्व जिनवरम्॥” हिंदी अर्थ: जो अरिहंत (सर्वविजयी) भगवान का नाम स्मरण ही मोक्ष का मार्ग प्रकाशित कर देता है, जिनके चरणों की सेवा में धर्म-रक्षक नागधरेन्द्र, चक्र और फणधारी (सर्प) सेवक रूप में हैं, ऐसे भगवान पार्श्वनाथ जिनेन्द्र को मैं नमस्कार करता हूँ। “विधाय लक्ष्मी सुखधरं भवाब्धिनीर शोषणं धरणेन्द्र चक्र […] - [जैन मंदिरों में चावल (अक्षत) ही क्यों चढ़ाया जाता है? जानिए इसके पीछे का आध्यात्मिक रहस्य](https://jinvani.in/jain-mandir-me-chaval-kyo-chadhaya-jata-hai/): Jain Mandir me Chawal kyo Chadhaya Jata hai जब भी आप किसी जैन मंदिर में जाते हैं, तो आपने देखा होगा कि भक्तगण पूजा के समय भगवान के समक्ष चावल या अक्षत चढ़ाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, पर क्या आपने कभी सोचा है कि जैन धर्म में केवल चावल ही क्यों चढ़ाया जाता है? गेंहू, दाल या अन्य अनाज क्यों नहीं चढ़ाए जाते? भारत की धार्मिक परंपराओं में प्रतीकवाद का गहरा स्थान है। हर क्रिया, हर पूजा, हर अर्पण के पीछे कोई न कोई आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। जैन धर्म भी इसी परंपरा को […] - [Mutual Fund Advisor: म्युचुअल फंड्स में इन्वेस्ट कैसे करे](https://jinvani.in/mutual-fund-advisor/): Mutual Fund me Kaise Invest Kare in Hindi अगर आप भी Mutual Fund मे निवेश करना चाहते है और आपको जानकारी नहीं है की अपने उद्देश्य के लिए सही Mutual Fund कैसे चुने तो आप सही जगह पर आए है, क्योंकि हम एक AMFI Registered Mutual Fund Advisor है और हम आपको आपके उद्देश्य, समय और राशि के अनुसार आपको सही Mutual Fund Scheme चुन कर देंगे जोकी आपके लिए सबसे बेहतर रहेगी।  Mutual Fund मे Invest करने के लिए सबसे पहले आपको अपनी KYC पूरी करनी होगी, आप Angel One पर जा कर आसानी से अपनी KYC पूरी कर सकते […] - [जैन पूजा करने के विधि - Jain Pooja Krne ki Vidhi](https://jinvani.in/jain-pooja-krne-ki-vidhi/): Jain Pooja Krne ki Vidhi जैन पूजा सामग्री प्रासुक जल (कुंए या बोरिंग का जल आवश्यक मात्रा में एक बड़े बर्तन में, दोहरे छन्ने से छान कर पानी को गर्म करके पुनः ठंडा होने छोड़ दें| (पानी गर्म करने की सुविधा न होने पर लौंग डाल कर भी जल को प्रासुक किया जाता है )| द्रव्य के बर्तन: प्रासुक जल से धुली हुई थाली, दो कलश(छोटे), दो चम्मचें, चन्दन के लिए कटोरी, एक छन्ना| पूजा के बर्तन: प्रासुक जल से धुली एक और थाली, एक आसिका, एक कटोरा, धूपदान| चन्दन लेप (सिल पर अथवा खरड में केशर के कुछ रेशे […] - [Shri Sudha Sagar Ji Maharaj ka Jivan Parichay](https://jinvani.in/sudha-sagar-ji-maharaj/): Muni Pungav 108 Shri Sudha Sagar Ji Maharaj मुनि पुंगव १०८ सुधासागर जी महाराज: त्याग, तपस्या और ज्ञान के प्रकाश स्तंभ भारतीय संत परंपरा, विशेषकर जैन धर्म, ऐसे अनेक महान साधकों से सुशोभित रही है, जिन्होंने अपने जीवन को ज्ञान, वैराग्य और आत्म-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं पुण्यात्माओं में से एक हैं मुनि पुंगव १०८ श्री सुधासागर जी महाराज, जिनकी निर्मल चर्या और गहन उपदेश आज भी लाखों जिज्ञासुओं के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत हैं। उनका जीवन स्वयं एक आध्यात्मिक पाठशाला है, जो हमें संयम, सदाचार और निस्वार्थ सेवा के मार्ग पर अग्रसर होने का आह्वान करता […] - [जैन पूजा विधि प्रारम्भ - Pooja Vidhi](https://jinvani.in/jain-pooja-vidhi/): Jain Puja की सामग्री १. प्रासुक जल (कुंए या बोरिंग का जल आवश्यक मात्रा में एक बड़े बर्तन में, दोहरे छन्ने से छान कर, जिवाणि वापिस कुएं में डालें, छने पानी को गर्म करके पुनः ठंडा होने छोड़ दें| (पानी गर्म करने की सुविधा न होने पर लौंग डाल कर भी जल को प्रासुक किया जाता है )|२. द्रव्य-बर्तन: प्रासुक जल से धुली एक थाली, दो कलश, दो छोटी चम्मचें, चन्दन कटोरी, एक सूखा छन्ना|३. पूजा-बर्तन: प्रासुक जल से धुली 1 ओर थाली, एक आसिका, एक कटोरा, एक धूपदान (धुपाडा)|४. चन्दन लेप (चन्दन की लकड़ी के साथ केसर घिसने से बना लेप चन्दन-कटोरी में लें)|५. अक्षत (छान-बीन कर भली-भांति साफ़ किये हुए जीव-जंतु रहित […] - [Muni Tarun Sagar Ji Maharaj](https://jinvani.in/jain-muni-tarun-sagar-ji-maharaj/): मुनि तरुण सागर जी महाराज का जीवन और उनके विचार प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। उनका जन्म 26 जून 1967 को मध्य प्रदेश के दमोह जिले के गुहंजी गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम पवन कुमार जैन था। बचपन से ही उनके मन में अध्यात्म और धर्म के प्रति गहरी रुचि थी। जन्म नाम श्री पवन कुमार जैन जन्म 26/06/1967, Guhanchi Madhya Pradesh India पिता श्री प्रताप चंद्र जैन माता श्री शांति बाई जैन शिक्षा मिडल स्कूल ब्रह्मचर्य व्रत 08/03/1981 क्षुल्लक दीक्षा 18/01/1982 Akaltara Chhattisgarh India ऐलक दीक्षा 01/12/0000 Gondia Maharashtra India मुनि दीक्षा 20/07/1988 Bagidora, Rajasthan समाधि 01/09/2018 कृष्णा […] - [Gift Article Ideas for House Warming](https://jinvani.in/jain-gift-article-ideas/): Jain Gift Ideas for House Warming: नए घर में सौहार्द और समृद्धि का संदेश नया घर बनाना या खरीदना हर किसी के जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, गृह प्रवेश (गृहप्रवेश) एक पवित्र अवसर होता है, जिसमें नए घर में प्रवेश करने पर सुख-समृद्धि और शांति की कामना की जाती है। जैन धर्म में आध्यात्मिकता, शुद्धता और अहिंसा को विशेष महत्व दिया जाता है, इसलिए यदि आप किसी जैन परिवार को गृह प्रवेश के अवसर पर उपहार देना चाहते हैं, तो ऐसे उपहार चुनें जो उनकी धार्मिक भावनाओं के अनुरूप हों। यहां कुछ जैन गिफ्ट आइडियाज दिए गए हैं […] - [Padmastakam Stotra (Padamprabhu Bhagwan)](https://jinvani.in/padmastakam-stotra/): श्री 108 साध्य सागर जी महाराज द्वारा रचित मुनि श्री 108 साध्य सागर जी महाराज का जन्म 1987 को मध्य प्रदेश के उज्जैन मे हुआ था। महाराज जी ने बहुत सी रचनाए की है, जिनमे से पद्माष्टकम् स्तोत्र मुख्य है। यह रहा पद्माष्टकम् स्तोत्र (Padmastakam Stotra) जो भगवान पद्मप्रभ स्वामी (छठे तीर्थंकर) को समर्पित एक सुंदर स्तुति है। यह स्तोत्र भक्तिपूर्वक भगवान के गुणों, उनकी शांति, ज्ञान और करुणा का वर्णन करता है। पद्माष्टकम् स्तोत्र  ।। साध्यपद्माष्टकम् ।। पद्मसनातन साध्यं रूपम् चिन्तीतकार्य महासुःख पुर्णम् निर्मलभाव सुपुजित देवं तत्प्रणमामि सदा जिनपद्यं ॥1॥ विश्वविभुति विहंगम् रूपम् विश्वव्यापिने विश्वभूतेशं विश्वमूर्तये विश्वविधेशं तत्प्रणमामि सदा […] - [Shri Namokar Mantra Chalisa णामोकार चालीसा](https://jinvani.in/namokar-mantra-chalisa/): णमोकार मंत्र चालीसा जैन धर्म के परम पवित्र मंत्र, णमोकार मंत्र, की महिमा और प्रभाव को विस्तार से समझाने वाला एक स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान, आचार्य, उपाध्याय, और साधुओं के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करती है। णमोकार मंत्र, जिसे नवकार मंत्र भी कहते हैं, सभी जैन मंत्रों में सर्वोच्च है। णमोकार मंत्र चालीसा का पाठ करने से मन को शांति, आत्मा को शुद्धि, और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। यह चालीसा हमें आध्यात्मिक मार्ग पर चलने, अहिंसा, सत्य, और धर्म का पालन करने की प्रेरणा देती है। दोहा वंदूँ श्रीअरिहंत पद, सिद्ध नाम सुखकार।  सूरी पाठक […] - [श्री पद्मावती माता चालीसा: Padmavati Chalisa](https://jinvani.in/padmavati-chalisa/): श्री पद्मावती माता चालीसा जैन धर्म में पूज्य देवी पद्मावती देवी को समर्पित एक भक्ति भजन है। उन्हें जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की रक्षक देवी (यक्षिणी) माना जाता है। जो लोग उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं।  Shri Padmavati Mata Chalisa एक भक्तिमय स्तोत्र है जो देवी पद्मावती के अद्भुत स्वरूप, गुणों और कृपा का गुणगान करता है। यह चालीसा श्रद्धालुओं को माता के प्रति अपनी भक्ति प्रकट करने और मानसिक शांति प्राप्त करने का माध्यम प्रदान करती है। पद्मावती माता को धन, वैभव और समृद्धि की देवी माना जाता है, और उनकी आराधना जीवन में सुख-समृद्धि, […] - [Jinvani Stuti जिनवाणी स्तुति](https://jinvani.in/jinvani-stuti/):  जिनवाणी स्तुति जैन धर्म की पवित्र वाणी के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का माध्यम है। इसमें जिनवाणी को सत्य, ज्ञान, और मोक्ष का मार्गदर्शन करने वाली परम पवित्र शक्ति माना गया है। जिनवाणी की स्तुति से मन शुद्ध होता है, आंतरिक शांति मिलती है और आत्मा को मोक्ष की प्रेरणा मिलती है। Jain Jinvani Stuti एक पावन भक्ति रचना है जो भगवान जिनेंद्र की दिव्य वाणी की महिमा का गान करती है। जिनवाणी को जैन धर्म में मोक्ष का मार्गदर्शक माना गया है, जो सत्य, अहिंसा, और आत्मशुद्धि की ओर प्रेरित करती है। यह स्तुति श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक […] - [Shri Parshvanath Stuti श्री पार्श्वनाथ स्तुति](https://jinvani.in/shri-parshvanath-stuti/): पारसनाथ स्तुति जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। भगवान पार्श्वनाथ ने चार मुख्य व्रतों—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, और अपरिग्रह—का प्रचार किया, जो जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं। उनकी स्तुति में उनकी करुणा, तपस्या, और उपदेशों का वर्णन किया गया है। पारसनाथ स्तुति का पाठ करने से मन शुद्ध होता है और जीवन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह स्तुति हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। पार्श्वनाथ की शिक्षाएँ हमें अहिंसा और करुणा का पालन करते हुए आत्मा […] - [दसलक्षण पर्व – उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म🙏 Uttam Brahmcharya](https://jinvani.in/uttam-brahmcharya-dharma/): Day 10: दसलक्षण पर्व – Uttam Brahmcharya Dharma 🙏🏼🌸 कामसेवन का मन से, वचन से तथा शरीर से परित्याग करके अपने आत्मा में रमना ब्रह्मचर्य है। संसार में समस्त वासनाओं में तीव्र और दुद्र्वर्ष कामवासना है। इसी कारण अन्य इन्द्रियों का दमन करना तो बहुत सरल है किन्तु कामवासना की साधन भूत काम इन्द्रिय का वश में करना बहुत कठिन है। छोटे-छोटे जीव जन्तुओं से लेकर बड़े से बड़े जीव तक में विषयवासना स्वाभाविक (वैभाविक) रूप से पाई गई है। सिद्धांत ग्रन्थों ने भी मैथुन स्ंज्ञा एकेन्द्रिय जीवों में भी प्रतिपादन की है। पशु तो कामवासना के शिकार होकर माता, […] - [Michhami Dukkadam Quotes, Wishes](https://jinvani.in/michhami-dukkadam-quotes/): मिच्छामी दुक्कड़म् एक पवित्र जैन परंपरा है, जिसका अर्थ है – “यदि मैंने जान-बूझकर या अनजाने में किसी को कष्ट पहुँचाया हो, तो मुझे क्षमा करें।” यह वाक्य न केवल क्षमा याचना का प्रतीक है, बल्कि अहिंसा, करुणा और आत्मशुद्धि की गहराई को भी दर्शाता है। इस लेख में प्रस्तुत Michhami Dukkadam Quotes क्षमा पर्व की भावना को सुंदर शब्दों में समर्पित हैं, जो रिश्तों में मधुरता लाने, अहंकार को त्यागने और आत्मा की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इन विचारों के माध्यम से हम न केवल दूसरों से क्षमा मांगते हैं, बल्कि भीतर से भी खुद को हल्का […] - [Shri Vardhman Stotra - श्री वर्धमान स्तोत्र](https://jinvani.in/shri-vardhman-stotra/): श्री वर्धमान स्तोत्र भगवान महावीर स्वामी की महिमा का गान करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली और श्रद्धा-पूर्ण स्तोत्र है। यह स्तुति भक्तों को संयम, अहिंसा, सत्य और तप जैसे जैन मूल्यों की ओर प्रेरित करती है। भगवान वर्धमान, जो कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, उनके अद्वितीय त्याग, ज्ञान और करुणा का चित्रण इस स्तोत्र में किया गया है। श्री वर्धमान स्तोत्र का पाठ मन को शांति, आत्मा को बल, और जीवन को दिशा प्रदान करता है। इसकी सरल भाषा और भावपूर्ण छंद हर आयु वर्ग के श्रद्धालुओं के लिए उपयुक्त हैं। यह स्तोत्र न केवल भक्ति का माध्यम […] - [आरती श्री आचार्य विद्यासागर जी- Aarti Shree Vidyasagar Maharaj Ji](https://jinvani.in/aarti-shree-vidyasagar-maharaj-ji/): Acharya Shree Vidyasagar Ji Maharaj दिगम्बर जैन समाज के एक अत्यंत पूजनीय और आध्यात्मिक गुरु हैं, जिनका जीवन त्याग, तपस्या और ज्ञान का प्रतीक है। उनके अद्वितीय व्यक्तित्व, गहन विचारों और समाज सेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें लाखों श्रद्धालुओं का मार्गदर्शक बना दिया है। “आरती श्री विद्यसागर महाराज जी” एक ऐसी भक्ति रचना है जो न केवल उनके दिव्य गुणों का गुणगान करती है, बल्कि आत्मा की शुद्धि और आत्मबोध का संदेश भी देती है। यह आरती भक्तों के हृदय में भक्ति, श्रद्धा और आत्मिक शांति का संचार करती है। Aarti Shree Vidyasagar Maharaj Ji Ki विद्यासागर की, गुणआगर […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम आर्जव धर्म🙏 Uttam Aarjav Dharma](https://jinvani.in/uttam-aarjav-dharma/): धर्म का श्रेष्ठ लक्षण आर्जव है। आर्जव का अर्थ सरलता है। मन-वचन-काय की कुटिलता का अभाव वह आर्जव है। कपट सभी अनर्थों का मूल है ; प्रीति तथा प्रतीति का नाश करने वाला है। कपटी में असत्य, छल,निर्दयता, विश्वासघात आदि सभी दोष रहते हैं। कपटी में गुण नहीं किन्तु समस्त दोष रहते हैं। मायाचारी यहाँ अपयश को पाकर फिर नरक-तिर्यंचादि गतियों में असंख्यातकाल तक परिभ्रमण करता है।मायाचार रहित आर्जवधर्म के धारक में सभी गुण रहते हैं।समस्त लोक की प्रीति तथा प्रतीति का पात्र होता है। परलोक में देवों द्वारा इंद्र-प्रतीन्द्र आदि होता है।अतः सरल परिणाम ही आत्मा का है। अच्छी […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम शोच धर्म🙏 Uttam Shouch Dharma](https://jinvani.in/uttam-shouch-dharma/): जिस व्यक्ति ने अपने मन को निर्लोभी बना लिया है, संतोष धारण कर लिया है, उसका जीवन परम शांति को उपलब्ध हो जाता है जो व्यक्ति उत्तम शौच धर्म को धारण करता है उसकी आत्मा लोभ ओर लालच जैसे मल का त्याग कर परम् उज्ज्वलता को प्राप्त होती है। जैसे मन यदि काला है तो महँगे से महँगे इत्र भी केवल आपके शरीर को महका सकते है जो नश्वर है लेकिन आत्मा को सुंदर बनाने के लिए आत्मा के स्वभाव अनुरूप धर्मों का पालन करना चाहिए, उत्तम शोच आत्मस्वरूप का स्वभाव है🙏🌸 🌿 उत्तम शौच धर्म – संतोष और आंतरिक […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम सत्य धर्म🙏 Uttam Satya Dharma](https://jinvani.in/uttam-satya-dharma/): 🙏 Uttam Satya Dharma मनुष्य अनेक कारणों से असत्य बोला करता है, उनमें से एक तो झूठ बोलने का प्रधान कारण लोभ है। लोभ में आकर मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये असत्य बोला करता है। असत्य भाषण करने का दूसरा कारण भय है। मनुष्य को सत्य बोलने से जब अपने ऊपर कोई आपत्ति आती हुई दिखाई देती है। अथवा अपनी कोई हानि होती दिखती है। उस समय वह डरकर झूठ बोल देता है, झूठ बोलकर वह उस विपत्ति या हानि से बचने का प्रयत्न करता है। विश्वसनीय और प्रामाणिक वह होता है जिसके हृदय में सरलता हो, आचरण […] - [दसलक्षण पर्व – उत्तम आकिंचन्य धर्म🙏 Uttam Aakinchanya Dharma](https://jinvani.in/uttam-aakinchanya-dharma/): Day 9: Uttam Aakinchanya Dharma🌸🙏 आत्मा के अपने गुणों के सिवाय जगत में अपनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं है इस दृष्टि से आत्मा अकिंचन है। अकिंचन रूप आत्मा-परिणति को आकिंचन करते हैं। जीव संसार में मोहवश जगत के सब जड़ चेतन पदार्थों को अपनाता है. 🌿 उत्तम आकिंचन्य धर्म – निर्लिप्तता और वैराग्य का भाव “आकिंचन्य” का अर्थ होता है – कुछ भी ‘मेरा’ नहीं है, यानी वस्तुओं, संबंधों, पद-प्रतिष्ठा या धन से आसक्ति न रखना। यह धर्म हमें सिखाता है कि संपत्ति का त्याग ही नहीं, ममत्व और स्वामित्व की भावना का त्याग भी आवश्यक है। ✨ मुख्य […] - [दसलक्षण पर्व – उत्तम त्याग धर्म🙏 Uttam Tyag Dharma](https://jinvani.in/uttam-tyag-dharma/): दसलक्षण पर्व में उत्तम त्याग धर्म का विशेष महत्व है, यह जैन धर्म के दस महत्वपूर्ण धर्मों में से एक है, और इसका अर्थ है सभी प्रकार के परिग्रह (सांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति) का त्याग करना. Uttam Tyag Dharma आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मशुद्धि के उद्देश्य से विकार भाव छोड़ना राग द्वेष क्रोध मान आदि विकार भावों का आत्मा से छूट जाना ही त्याग है।i दसलक्षण पर्व: उत्तम त्याग धर्म – आंतरिक शुद्धि का मार्ग दसलक्षण पर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र अवसर है, जो आत्म-शुद्धि और नैतिक उत्थान का संदेश देता है. इस दस दिवसीय पर्व के […] - [दसलक्षण पर्व – उत्तम संयम धर्म🙏 Uttam Sanyam Dharma -](https://jinvani.in/uttam-sanyam-dharma/): स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण और मन पर नियंत्रण (दमन, कन्ट्रोल) करना इन्द्रिय-संयम है। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है इन दोनों संयमों में इन्द्रिय संयम मुख्य है क्योंकि इन्द्रिय संयम प्राणी संयम का कारण है, इन्द्रिय संयम होने पर भी प्राणी संयम होता हैं, बिना इन्द्रिय संयम के प्राणी संयम नहीं हो सकता। महान आत्माएँ सदैव संयम धारण कृति हैइंद्रियों पर संयम नियंत्रण रखना ही उत्तम संयम धर्म है🌸🙏 दसलक्षण पर्व: उत्तम संयम धर्म – आत्म-नियंत्रण का पथ दसलक्षण पर्व जैन धर्म के सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण आयोजनों में से एक […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम तप धर्म🙏 Uttam Tap](https://jinvani.in/uttam-tap-dharma/): 🔥 उत्तम तप धर्म का अर्थ (Meaning): “तप” का शाब्दिक अर्थ है – तपस्या करना, आत्मा को शुद्ध करना और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना।उत्तम तप धर्म का अभ्यास करने वाला व्यक्ति भोगों से दूर रहकर आत्मा की शुद्धि की ओर अग्रसर होता है। केवल शरीर को तपाना तप नहीं अपितु इच्छा का निरोध करना तप है। जिसप्रकार से राग-द्वेष-मोह रूप मैल भिन्न हो जाए तथा शुद्ध ज्ञान-दर्शनमय आत्मा भिन्न हो जाए, वह तप है। कर्मों का संवर तथा निर्जरा करने का प्रधान कारण तप है । तप ही आत्मा को कर्म मल रहित करता है। तप के प्रभाव से यहाँ […] - [कितना प्यारा तेरा द्वारा - Bhajan](https://jinvani.in/kitna-pyara-tera-dwara/): “कितना प्यारा तेरा द्वारा” एक अत्यंत मधुर और भावनात्मक जैन भजन है, जो भक्त और भगवान के बीच के आत्मिक संबंध को दर्शाता है। यह भजन उस पावन स्थल की महिमा का गुणगान करता है, जहाँ आत्मा को शांति, सुरक्षा और मोक्ष की अनुभूति होती है। जब कोई भक्त मंदिर के द्वार पर पहुँचता है, तो उसका हृदय श्रद्धा, भक्ति और आनंद से भर उठता है — यही भावना इस Jain Bhajan में बड़े ही सुंदर और सरल शब्दों में प्रकट की गई है। यह रचना न केवल एक भक्ति गीत है, बल्कि आत्मा की आंतरिक यात्रा का सार है, […] - [भगवान मेरी नैया, उस पार लगा देना - Jain Bhajan](https://jinvani.in/bhagwan-meri-naiya-us-paar-lga-dena/): “भगवान मेरी नैया, उस पार लगा देना” एक अत्यंत भावपूर्ण और आत्मा को स्पर्श करने वाला जैन भजन है, जो जीवन की अनिश्चितताओं, संघर्षों और मोह-माया से मुक्ति की कामना को दर्शाता है। यह भजन परमात्मा से एक भक्त की प्रार्थना है कि वह उसे संसार-सागर से पार कर मोक्ष के परम धाम तक पहुँचा दे। Jain Bhajan जैन दर्शन में आत्मा की शुद्धि, अहिंसा और मोक्ष की प्राप्ति को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है, और यह भजन उन्हीं भावनाओं का सजीव प्रतिबिंब है। इस लेख के माध्यम से हम इस भजन के शब्दों की गहराई, उसके भावार्थ […] - [श्री बड़े बाबा कुण्डलपुर चालीसा](https://jinvani.in/shree-bade-baba-kundalpur-chalisa/): श्री बड़े बाबा(आदिनाथ भगवान), जिनकी दिव्य प्रतिमा कुण्डलपुर (मध्य प्रदेश) में स्थापित है, दिगंबर जैन समाज के श्रद्धा और आस्था के केंद्र हैं। उनकी भव्यता, तेजस्विता और आत्मिक ऊर्जा से युक्त यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और प्रेरणा का स्रोत भी है। “श्री बड़े बाबा कुण्डलपुर चालीसा” एक भक्तिपूर्ण काव्य रचना है. यह चालीसा न केवल पाठकों को बाबा के दिव्य स्वरूप से जोड़ती है, बल्कि जीवन में नैतिकता, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देती है। यह लेख बड़े बाबा की चालीसा के आध्यात्मिक महत्व, […] - [श्री सम्मेद शिखर चालीसा Shri Sammed Shikhar Chalisa](https://jinvani.in/shree-sammed-shikhar-chalisa/): श्री सम्मेद शिखर जी, जैन धर्म का सबसे पावन तीर्थ स्थल है, जहाँ 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया। यह स्थल आत्मशुद्धि, तपस्या और मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। “श्री सम्मेद शिखर चालीसा” एक भक्तिपूर्ण रचना है  Sammed Shikhar Ji Chalisa का पाठ श्रद्धालु मन में भक्ति, शांति और मोक्ष की भावना का संचार करता है। यह रचना केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि तीर्थ के प्रति श्रद्धा, भावनात्मक जुड़ाव और आत्मिक उन्नयन का माध्यम है। इस लेख के माध्यम से हम न केवल चालीसा के भावार्थ को समझेंगे, बल्कि सम्मेद शिखर की तपोभूमि और तीर्थंकरों के प्रति श्रद्धा को […] - [श्री सम्मेद शिखर टोंको के अर्घ](https://jinvani.in/shree-sammed-shikhar-tonkon-ke-arghya/): श्री सम्मेद शिखर जी जैन धर्म का सर्वोच्च तीर्थ स्थल है, जहाँ 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष की प्राप्ति की। इन दिव्य स्थलों पर स्थित ‘टोंके’ उन पावन स्थानों को दर्शाते हैं जहाँ तीर्थंकरों ने अंतिम साधना की थी। “श्री सम्मेद शिखर टोंको के अर्घ” एक ऐसा आलेख है जो इन टोंकों पर चढ़ाए जाने वाले अर्घ (पूजन-सामग्री) की आध्यात्मिक महत्ता और विधि को रेखांकित करता है। यह न केवल भक्तों की श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि मोक्ष मार्ग की ओर एक भावनात्मक और आत्मिक यात्रा भी है। हर टोंक पर चढ़ाया गया अर्घ तीर्थंकरों के प्रति गहन श्रद्धा, आत्मदर्शन और […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम क्षमा धर्म🙏 Uttam Kshama Dharma](https://jinvani.in/uttam-kshama-dharma/): Uttam Kshama Dharma संसार में प्रत्येक मानव प्राणी के लिए क्षमा रूपी शास्त्र इतना आवश्यक है कि जिनके पास यह क्षमा नहीं होती वह मनुष्य संसार में अपने इष्ट कार्य की सिद्धि नहीं कर सकता है। 🕊️ उत्तम क्षमा धर्म का अर्थ “क्षमा” का अर्थ है – माफ करना और मन से द्वेष, घृणा और क्रोध को निकाल देना।“उत्तम क्षमा” वह अवस्था है, जब व्यक्ति अपने प्रति किए गए अपमान, पीड़ा या अन्याय को भी सहन कर लेता है और मन में बदले की भावना नहीं रखता। क्षमा यह आत्मा का धर्म है, इसलिए जो मानव अपना कल्याण चाहते हैं, […] - [दसलक्षण पर्व - उत्तम मार्दव धर्म🙏 Uttam Mardav Dharma](https://jinvani.in/uttam-maardav-dharma/): 🌿 उत्तम मार्दव धर्म का अर्थ “Uttam Mardav Dharma” का अर्थ है — मृदुता, विनम्रता, अहंकार से रहित भाव।उत्तम मार्दव वह गुण है, जिसमें व्यक्ति अपने ज्ञान, धन, शक्ति या स्थिति के कारण घमंड नहीं करता और सभी के साथ सौम्यता से व्यवहार करता है। मार्दव धर्म आत्मा अर्थात् निजात्मा स्व-स्वरूप का धर्म है। जहाँ मृदु भाव या नम्रता नहीं है वहाँ धर्म भी नहीं है। विनम्र वो नही जो बड़ों को सम्मान दे अपितु वह है जो छोटों का भी मान रखे अपनी प्रशंसा सुनकर सब सुखी होते हैं, धर्मी तो वह है जो दूसरे की प्रशंसा सुनकर सुखी […] - [Dus Lakshan Parva दस लक्षण पर्व क्या है?](https://jinvani.in/das-lakshan-parva-kya-hai/): दस लक्षण पर्व जैनियों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है। दिगंबर परंपरा में, दस प्रमुख गुण, दशलक्षण धर्म, 10 दिनों तक मनाया जाता है, जो श्वेतांबर परंपरा में पर्युषण पर्व के अंतिम दिन संवत्सरी से शुरू होता है। भाद्रपद सूद 5-14 को जैनियों को आत्मा की विशेषताओं की याद दिलाने के लिए। आत्मा के दस धर्म या गुण हैं क्षमा, विनम्रता, सरलता, संतोष, सत्य, कामुक संयम, तपस्या, दान, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। ये सही आचरण के विभिन्न रूप हैं। दस धर्मों पर चर्चा करने से पहले, हमारे शास्त्रों में पाए जाने वाले दो सामान्य दृष्टिकोणों को समझना महत्वपूर्ण है। व्यवहार दृष्टिकोण, […] - [भगवान आत्मा आनंद भंडार चेतन उस पर दृष्टि कर...Jain Bhajan](https://jinvani.in/bhagwan-atma-anand-bhandar-chetan/): इस भजन भगवान आत्मा आनंद भंडार चेतन उस पर दृष्टि कर. में साधक अपनी आत्मा में स्थित अनंत आनंद के सागर की ओर अपनी दृष्टि केंद्रित करने का आग्रह करता है। संसार के बाहरी आकर्षण से हटकर भीतर उतरना और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना ही इस भजन का मुख्य संदेश है। यह Jain Bhajan हमें हमारे आत्मस्वरूप से परिचित कराता है, ताकि हम अंतरात्मा में स्थित परम चेतना का अनुभव कर सकें। इस सुंदर रचना में साधना, विवेक, श्रद्धा तथा परमात्म प्रेम का अद्भुत संगम है, जो प्रत्येक साधक के हृदय को आत्मिक आनंद से भर देता है। […] - [मेरे महावीर झूले पलना... Bhajan](https://jinvani.in/mere-mahaveer-jhule-palna-jain-bhajan/): बिल्कुल! “मेरे महावीर झूले पलना” एक अत्यंत मधुर और श्रद्धापूर्ण जैन भजन है, जो भगवान महावीर स्वामी के प्रति भक्त के स्नेह और वात्सल्य भाव को दर्शाता है। इस भजन में भक्त, भगवान महावीर को पालना झुलाकर उनके बाल रूप में दर्शन करने की अभिलाषा प्रकट करता है, जैसे एक माँ अपने बच्चे को स्नेह से झुलाती है। यह भजन हमारी भक्ति में ममत्व, प्रेम और श्रद्धा के सुंदर भाव जगाता है तथा भगवान के जन्मोत्सव या अन्य पावन अवसरों पर गाया जाता है। इस मधुर रचना से हृदय में करुणा, आनंद और भक्ति का संचार होता है, जो साधकों […] - [दुनिया से में हारी, तो आयी तेरे द्वार... Jain Bhajan](https://jinvani.in/duniya-se-me-hari-to-aayi-tere-dwar/): “दुनिया से मैं हारी, तो आयी तेरे द्वार” एक प्रसिद्ध जैन भजन है, जो संसार के दुख-दर्द से थके मन की पुकार है। इस भजन में साधक हृदय से स्वीकार करता है कि संसार के मोह, माया और संघर्ष में हार जाने के बाद, अब केवल प्रभु के चरणों में ही उसे सच्चा सहारा, शांति और प्रेम मिलता है। यह भजन गहराई से भगवान के चरणों में समर्पण, श्रद्धा और विनय के भाव को दर्शाता है। संसार के सभी रिश्ते और सुख क्षणिक होते हैं, पर प्रभु के दर पर सदा प्रेम, करुणा और क्षमा मिलती है — यही इस […] - [भक्ति बेकरार है आनंद अपार है - Jain Aarti](https://jinvani.in/bhakti-bekarar-hai-anand-apaar-hai/): “भक्ति बेकरार है, आनंद अपार है” एक भावपूर्ण जैन आरती है, जो भक्त के हृदय में उमड़ती गहन श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति है। इस आरती में साधक प्रभु के चरणों में अपनी भक्ति और समर्पण अर्पित करते हुए अनुभव करता है कि प्रभु के सान्निध्य से मन में अद्भुत आनंद और शांति उत्पन्न होती है। इस आरती में प्रभु के प्रति गहराई से जुड़ने की तड़प, श्रद्धा, और परम आनंद के भाव झलकते हैं। हर पंक्ति में साधना, स्नेह, विनय और अहोभाव है, जो हमें सांसारिक मोह से हटाकर प्रभु के चरणों में ले जाता है। यह आरती केवल […] - [मैं क्या... मेरा अस्तित्व क्या - Jain Bhajan](https://jinvani.in/mai-kya-mera-astitva-kya/): “मैं क्या… मेरा अस्तित्व क्या” एक गहन आत्मचिंतन से परिपूर्ण जैन भजन है, जो साधक को भीतर झाँकने और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है। इस भजन में अहंकार, देह-भाव, और सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर, आत्मा के शाश्वत, निर्मल और चेतन स्वरूप को समझने का सुंदर प्रयास किया गया है। भक्त इस भजन के माध्यम से प्रभु के चरणों में विनम्रता से स्वीकार करता है कि शरीर, पद, धन, प्रतिष्ठा क्षणिक हैं, जबकि हमारा सच्चा अस्तित्व हमारी शुद्ध आत्मा है। इस भजन की प्रत्येक पंक्ति हमें मोक्षमार्ग पर अग्रसर होते हुए स्व-पहचान करने की ओर मार्गदर्शित […] - [भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना - Jain Bhajan](https://jinvani.in/bhagwan-meri-naiya-us-paar-lga-dena-jain-bhajan/): “भगवान मेरी नैया उस पार लगा देना” एक भावपूर्ण जैन भजन है, जो सच्चे हृदय से प्रभु के चरणों में समर्पण और प्रार्थना को दर्शाता है। इस भजन में साधक सांसारिक सागर में फंसी अपनी आत्मा के लिए प्रभु से करुणा-भरी गुहार लगाता है कि वे उसे इस भवसागर से पार उतार दें। यह भजन हमें संसार के मोह-माया, कष्ट, और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने की भावना से जोड़ता है। प्रत्येक पंक्ति में श्रद्धा, विनय, और आत्मसमर्पण झलकता है, जहाँ भक्त अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हुए केवल प्रभु के आश्रय में परमगति प्राप्त करने की आकांक्षा प्रकट […] - [चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में...Jain Bhajan](https://jinvani.in/chaitanya-ke-darpan-me-aanand-ke-aalay-me/): “चैतन्य के दर्पण में, आनंद के आलय में” एक गहन आध्यात्मिक अनुभूति से ओत-प्रोत जैन भजन है, जो हमें अपनी भीतर स्थित शाश्वत चैतन्य शक्ति और परम आनंद के स्रोत से मिलन कराता है। इस भजन में साधक स्वयं को चैतन्य के दर्पण में निहारते हुए, आत्मा के मूल स्वभाव को पहचानने का प्रयास करता है — जो न केवल चेतन है, बल्कि आनंदमय और शुद्ध भी है। यह भजन आत्मचिंतन, साधना और निर्विकारी दृष्टि के महत्व पर जोर देता है, ताकि प्रत्येक जीव भीतर स्थित अनंत सुख, शांति, प्रेम और मुक्ति के द्वार खोल सके। प्रत्येक पंक्ति हमें आत्मा […] - [है सीमंधर भगवान शरण ली तेरी... Jain Bhajan](https://jinvani.in/hai-seemandhar-bhagwan-sharan-li-teri-jain-bhajan/): “है सीमंधर भगवान, शरण ली तेरी” एक हृदयस्पर्शी जैन भजन है, जो वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी के चरणों में गहरी श्रद्धा और समर्पण प्रकट करता है। इस भजन में साधक, प्रभु सीमंधर स्वामी के पावन आश्रय में आकर संसार के दुख, क्लेश और कर्मबंधन से मुक्ति पाने की प्रार्थना करता है। भजन की प्रत्येक पंक्ति में अहोभाव, भक्ति और विनय से भरी भावनाएँ झलकती हैं, जहाँ भक्त प्रभु से मार्गदर्शन, करुणा, और आत्मकल्याण की याचना करता है। सीमंधर स्वामी के दर्शन, वाणी, और उपदेश के स्मरण से साधक के हृदय में गहराई से अहिंसा, शांति, प्रेम, और मुक्ति-पथ पर […] - [ज्ञान सम्यक मेरा हो गया - Jain Bhajan](https://jinvani.in/gyan-samyak-mera-ho-gya/): “ज्ञान सम्यक मेरा हो गया” एक अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायी जैन भजन है, जो साधक के हृदय में सम्यक ज्ञान के उदय से उत्पन्न आनंद, शांति और विवेक को अभिव्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अनुभव करता है कि गुरु के उपदेश और जिनवाणी के प्रभाव से उसे सच्चे मार्ग की पहचान मिल गई है, जिससे अज्ञान का अंधकार दूर हो गया है। यह भजन हमें आत्म-जागृति, विवेक, श्रद्धा और सत्य के पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। जब सम्यक ज्ञान प्राप्त होता है, तब मोह, मिथ्यात्व, कषायों से मुक्ति मिलती है और हृदय में एक अद्भुत […] - [श्री गौतम गणधर पूजा | Gautam Gandhar Pooja](https://jinvani.in/shree-gautam-gandhar-pooja/): श्री गौतम गणधर पूजा जैन धर्म में अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाने वाली एक महत्वपूर्ण उपासना है। इस पूजा में हम भगवान महावीर स्वामी के प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी के महान व्यक्तित्व, गहन ज्ञान और अद्वितीय गुरु-भक्ति को स्मरण करते हैं। गौतम स्वामी ने महावीर स्वामी से जिनवाणी प्राप्त कर उसे गहराई से आत्मसात किया, जिससे वे जगत के लिए एक श्रेष्ठ मार्गदर्शक बने। इस पूजा के माध्यम से हम उनके चरणों में नतमस्तक होकर आत्मकल्याण, सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र में प्रगति के लिए प्रार्थना करते हैं। गणधर गौतम स्वामी के चरित्र से हमें श्रद्धा, समर्पण, सत्य […] - [सुख आते है दुःख आते है... Jain Bhajan](https://jinvani.in/sukh-aate-hai-dukh-hai-jain-bhajan/): “सुख आते हैं दुःख आते हैं” एक जैन भजन है, यह भजन हमें सिखाता है कि सुख और दुःख दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं — न तो सुख में अति उत्साह और अहंकार करना चाहिए, और न ही दुःख में टूटकर हार माननी चाहिए। सुख आते हैं दुःख आते हैं भजन की पंक्तियाँ आत्मा को जाग्रत कर यह समझाने का प्रयास करती हैं कि इन दोनों अवस्थाओं में भी हमें समता, संयम और संतुलन बनाए रखना चाहिए। जैन दर्शन के अनुसार, सुख-दुःख कर्मों का फल हैं। इस Jain Bhajan के माध्यम से साधक अपने हृदय में धैर्य, आशा और […] - [चंदन के पलना में झूले मोरे वीरा...(पालना गीत)](https://jinvani.in/chandan-ke-palna-me-jhule-more-veera/): “चंदन के पलना में झूले मोरे वीरा” एक अत्यंत मधुर और भक्ति-भाव से ओतप्रोत भजन है, जो की भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक से जुड़ा है। इस भजन में भक्त भगवान महावीर को शिशु रूप में झूले में झूलते हुए कल्पना करता है, और आगमन का उत्सव मनाता है।  इस भजन को विशेष रूप से महावीर जयंती, और धार्मिक आयोजन के दौरान भावपूर्वक गाते हैं। यह भजन न केवल भगवान के प्रति प्रेम का प्रतीक है, बल्कि आत्मा की उस आनंदमयी भी है। पालना गीत जैन भजन चंदन के पलना में झूले मोरे वीरा  चम चम चमके गले को […] - [एक नाम साँचा, एक नाम प्यारा...Jain Bhajan](https://jinvani.in/ek-naam-sancha-ek-naam-pyara/): “एक नाम साँचा, एक नाम प्यारा…” Jain Bhajan एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण जैन भजन है, जो भक्त के हृदय में प्रभु के नाम की महिमा को स्थापित करता है। यह भजन हमें नाम-स्मरण (भगवान के नाम का जाप) की महानता का बोध कराता है। जब संसार के अन्य नाम भ्रमित कर देते हैं या साथ नहीं देते, तब एकमात्र प्रभु का नाम ही है जो हर परिस्थिति में सहारा बनता है, यह भजन विशेष रूप से ध्यान, स्वाध्याय, और भक्ति के क्षणों में गाया जाता है, जब साधक एकाग्रचित होकर प्रभु के नाम में लीन होता है। “एक नाम […] - [निर्ग्रंथों का मार्ग हमको प्राणों से भी प्यारा है - Bhajan](https://jinvani.in/nirgrantho-ka-marg-hamko-praano-se-bhi-pyara-hai/): “निर्ग्रंथों का मार्ग हमको प्राणों से भी प्यारा है” एक प्रबल वैराग्य और आत्मिक प्रेरणा से युक्त जैन भजन है, इस भजन में गायक यह भाव प्रकट करता है कि मोक्षमार्ग पर चलने वाले निर्ग्रंथ मुनिराजों का जीवन हमें इतना प्रिय है कि हम उसके लिए अपने प्राणों का भी त्याग कर सकते हैं। यह मार्ग तप, त्याग, संयम, और समता का मार्ग है, जो आत्मा को कर्मों के जाल से मुक्त कर सच्चे कल्याण की ओर ले जाता है। अपने जीवन में संयम, श्रद्धा और भक्ति को अपनाना चाहते हैं। यह हमें सिखाता है कि संसार के सुख क्षणिक […] - [रोम-रोम पुलकित हो जाय, जब जिनवर के दर्शन पाय...Jain Bhajan](https://jinvani.in/rom-rom-pulkit-ho-jaye-jain-mandir/): “रोम-रोम पुलकित हो जाय, जब जिनवर के दर्शन पाय” एक अत्यंत भावनात्मक Jain Bhajan है जो उस अनुपम आनंद की अनुभूति को व्यक्त करता है, जब भक्त को जिनेंद्रदेव के दर्शन प्राप्त होते हैं। यह भजन हमें जिनेंद्र भगवान के दर्शन के महत्व को समझाता है और बताता है कि दर्शन मात्र से ही जीव के भीतर श्रद्धा, शुद्धता और समता का संचार हो सकता है। यह भजन उस दिव्य क्षण का चित्रण करता है जब आत्मा प्रभु की प्रतिमा को देखकर भीतर से हर्षित और पुलकित हो उठती है।भक्त की अनुभूति यहाँ केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक स्तर पर […] - [अपना करना हो कल्याण, साँचे गुरुवर को पहिचान... Jain Bhajan](https://jinvani.in/apna-krna-ho-kalyan/): “अपना करना हो कल्याण, साँचे गुरुवर को पहिचान” एक प्रेरणादायक Jain Bhajan है जो आत्मा को सच्चे मार्ग की ओर मोड़ने का आह्वान करता है। इस भजन में “साँचे गुरुवर” का अर्थ है — ऐसा सद्गुरु जो स्वार्थ से रहित होकर केवल आत्मा के उद्धार की भावना से उपदेश देते हैं। भजन हमें समझाता है कि यदि हमें इस जीवन में आत्म-कल्याण करना है, तो पहले हमें एक सच्चे गुरु की पहचान करनी होगी — वह गुरु जो हमें मोह, माया और अज्ञानता से बाहर निकालकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप का बोध कराए। यह भजन आत्म-जागृति, श्रद्धा और विनम्रता को […] - [धन्य धन्य वीतराग वाणी... Bhajan](https://jinvani.in/dhanya-dhanya-veetraag-vaani/): धन्य धन्य वीतराग वाणी, अमर तेरी जग में कहानी चिदानन्द की राजधानी, अमर तेरी जग में कहानी ।।टेक।। उत्पाद व्यय अरु ध्रोव्य स्वरूप, वस्तु बखानी सर्वज्ञ भूप । स्याद्वाद तेरी निशानी, अमर तेरी जग में कहानी ।१। नित्य अनित्य अरू एक अनेक, वस्तुकथंचित भेद अभेद । अनेकान्त रूपा बखानी, अमर तेरी जग में कहानी ।२। भाव शुभाशुभ बंध स्वरूप, शुद्ध चिदानन्दमय मुक्ति रूप । मारग दिखाती है वाणी, अमर तेरी जग में कहानी ।३। चिदानन्द चैतन्य आनन्दधाम, ज्ञान स्वभावी निजातम राम । स्वाश्रय से मुक्ति बखानी, अमर तेरी जग में कहानी ।४। धन्य धन्य वीतराग वाणी, अमर तेरी जग में […] - [कैसी सुन्दर जिन प्रतिमा - Jain Bhajan](https://jinvani.in/kaise-sundar-jin-pratima-hai/): “कैसी सुंदर जिन प्रतिमा” एक अत्यंत श्रद्धा और आनंद से भरपूर Jain Bhajan है, जिसमें भगवान की दिव्य प्रतिमा की सुंदरता का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इस भजन में भक्त अपनी दृष्टि से प्रभु की प्रतिमा को निहारते हुए उनके तेज, शांति और आत्मिक आकर्षण की सराहना करता है। “कैसी सुंदर जिन प्रतिमा” भजन विशेष रूप से मंदिरों में, पूजन आयोजनों में, और जिन प्रतिमा अभिषेक या प्रतिष्ठा महोत्सव के समय भक्तों द्वारा गाया जाता है। इसके मधुर बोल और भावनात्मक लय से वातावरण में भक्ति की तरंगें फैल जाती हैं। तर्ज : चाँद सी महबूबा हो मेरे कब […] - [मोह जाल में फंसे हुए हैं, कर्मो ने आ घेरा... Jain Bhajan](https://jinvani.in/moh-jaal-mein-fase-hue-hai-karmo-ne-aa-ghera/): “मोह जाल में फंसे हुए हैं, कर्मों ने आ घेरा” Jain Bhajan एक अत्यंत मार्मिक और आत्म-जागृति से भरा हुआ जैन भजन है, जो जीव की वर्तमान स्थिति का सजीव चित्रण करता है। इस भजन के माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि वह संसार के आकर्षणों, इच्छाओं और कर्मों की जंजीरों में जकड़ा हुआ है, और अब वह प्रभु से मोक्ष का मार्ग मांग रहा है। भजन की पंक्तियाँ आत्मा की उस पुकार को व्यक्त करती हैं, जहाँ वह संसार की असारता को समझकर सच्चे शरण की तलाश करती है। मोह, माया, क्रोध, लोभ, और राग-द्वेष — ये […] - [जैन धर्म ग्रंथ](https://jinvani.in/jain-dharma-granth/): जैन धर्म एक प्राचीन भारतीय धर्म है जो अहिंसा, सत्य और तप पर जोर देता है। यह सिखाता है कि आध्यात्मिक शुद्धता और ज्ञान का मार्ग हानिरहितता और त्याग के अनुशासित जीवन से होकर जाता है। जैन धर्म के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं: अहिंसा: जैन धर्म का केंद्र अहिंसा का सिद्धांत है। जैन किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान न पहुँचाने में विश्वास करते हैं, चाहे वह विचार, शब्द या क्रिया के माध्यम से हो। यह कीड़ों और सूक्ष्मजीवों सहित जीवन के सभी रूपों पर लागू होता है। सत्य की बहुलता (अनेकान्तवाद): जैन धर्म सिखाता है कि सत्य […] - [मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जायेंगे... Jain Bhajan](https://jinvani.in/meri-jhopdi-ke-bhag-aaj-khul-jayenge-jain-bhajan/): “मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जायेंगे…” यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि एक गहरी भावना का सहज और मधुर प्रकटीकरण है। यह जैन भजन भक्त की उस असीम आंतरिक खुशी को दर्शाता है जब उनके साधारण जीवन में प्रभु जिनेंद्र के चरण पड़ते हैं। यह भजन आत्मा के उस गहन अहसास को वाणी देता है जहाँ वह प्रभु के स्वागत में पूरी तरह से पुलकित, विनम्र और आनंदित हो उठती है। “भाग खुलना” इस संदर्भ में केवल सांसारिक सौभाग्य नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक जागरण का संकेत है। यह वह क्षण है जब जीव को प्रभु के दर्शन, उनके […] - [स्वर्ग से सुंदर अनुपम है ये जिनवर का दरबार...Jain Bhajan](https://jinvani.in/swarg-se-sundar-hai-ye-jinvar-ka-darbaar/): “स्वर्ग से सुंदर अनुपम है ये जिनवर का दरबार…” एक अत्यंत श्रद्धा और भक्ति से भरपूर जैन भजन है, जो जिनेंद्र भगवान के दिव्य दरबार की महिमा का गायन करता है। इस भजन में भक्त यह अनुभव करता है कि संसार के सारे वैभव और स्वर्ग की समस्त सुख-संपदाएँ भी भगवान जिनेंद्र के दरबार के सामने तुच्छ हैं। भजन की भावनाओं में वह आनंद और शांति झलकती है, जो केवल प्रभु के चरणों में प्राप्त होती है। जिनवर का दरबार — जहाँ शुद्धता है, समता है, करुणा है, और आत्मा को उसकी वास्तविक पहचान मिलती है — वह स्थान भक्त […] - [जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उमड सकता है... Jain Bhajan](https://jinvani.in/jivan-ke-kisi-bhi-pal-mai-jain-bhajan/): “जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उमड़ सकता है…” एक गहरा और आत्म-जागृति से भरा जैन भजन है, जो जीवन की अनिश्चितता और आत्मकल्याण की तात्कालिक आवश्यकता का स्मरण कराता है। इस भजन को विशेष रूप से वैराग्य दिवस, आत्मचिंतन सत्र, या किसी धार्मिक प्रवचन के आरंभ में भावपूर्ण स्वर से प्रस्तुत किया जाता है। Jain Bhajan हमें सिखाता है कि वैराग्य केवल वृद्धावस्था या किसी बड़े आघात से ही नहीं आता, बल्कि यह भीतर से जागने वाली एक दिव्य प्रेरणा है, जो किसी भी उम्र, स्थिति या परिस्थिति में प्रकट हो सकती है। और जब यह होता है, […] - [ओ जगत के शांति दाता... Jain Bhajan](https://jinvani.in/oo-jagat-ke-shanti-data-jain-bhajan/): “ओ जगत के शांति दाता…” न केवल भक्ति का गीत है, एक अत्यंत भावविभोर करने वाला जैन भजन है, जिसमें भक्त भगवान जिनेंद्रदेव को संपूर्ण जगत के शांति दाता के रूप में स्मरण करता है। यह भजन प्रभु की करुणा, समता और अहिंसा के उस अद्भुत स्वरूप को सामने लाता है, जो संसार के प्रत्येक प्राणी के लिए कल्याणकारी है। जब संसार में दुख, अशांति और अज्ञानता का अंधकार फैला हो, तब प्रभु जिनेंद्र की वाणी और उनका आदर्श जीवन ही वह दीपक बनता है जो सबको राह दिखाता है। इस भजन में साधक, भगवान से आंतरिक शांति, मार्गदर्शन और […] - [गुरु ने जहां जहां भी ज्योति जलाई है...Jain Bhajan](https://jinvani.in/guru-ne-jahan-jahan-bhi-jyoti-jalai-hai-jain-bhajan/): Guru Ne Jahan Jahan bhi Jyoti Jalai hai…” एक अत्यंत प्रेरणादायक और श्रद्धा से भरा हुआ जैन भजन है, जो सद्गुरु की कृपा, मार्गदर्शन और आत्मिक प्रकाश की महिमा का सुंदर वर्णन करता है। जहाँ-जहाँ गुरु की वाणी पहुँची है, वहाँ अज्ञान दूर हुआ है, मोह मिटा है और आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हुआ है। यह भजन बताता है कि गुरु के स्पर्श मात्र से जीवन में परिवर्तन आता है — वह मार्गदर्शक होते हैं जो जीव को मोक्षपथ की ओर ले जाते हैं। “गुरु ने जहाँ जहाँ भी ज्योति जलाई है…” भजन हमें प्रेरित करता है कि […] - [मोक्ष के प्रेमी हमने, कर्मों से लड़ते देखें... Jain Bhajan](https://jinvani.in/moksh-ke-premi-humne-karmo-se-ladte-dekhe/): “मोक्ष के प्रेमी हमने, कर्मों से लड़ते देखें…” एक प्रेरणादायक Jain Bhajan है, जो उन महापुरुषों की महान साधना और तपस्या का स्मरण कराता है जिन्होंने आत्मा की मुक्ति के लिए कठिन से कठिन कर्मों से टक्कर ली। यह भजन बताता है कि मोक्ष की राह आसान नहीं होती, लेकिन जिन्होंने उसे पाने की सच्ची लगन जगाई, उन्होंने अपने जीवन को तप, संयम और वैराग्य से सँवारा। यह भजन साधक को आत्म-प्रेरणा देता है कि यदि वे भी जीवन में संयम, विवेक और श्रद्धा को अपनाएँ, तो मोक्ष की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। भजन विशेष रूप से वैराग्य […] - [साधना के रास्ते, आत्मा के वास्ते चल रे राही चल - Jain Bhajan](https://jinvani.in/sadhna-ke-raste-atma-ke-vaste-jain-bhajan/): “साधना के रास्ते, आत्मा के वास्ते चल रे राही चल…” एक अत्यंत प्रेरणादायक जैन भजन है, जो आत्मा को उसके असली लक्ष्य — मोक्ष — की ओर बढ़ने के लिए जाग्रत करता है। यह भजन जीवन के भ्रमित रास्तों से हटकर साधना, संयम और आत्म-शुद्धि के मार्ग पर चलने का आह्वान करता है। “चल रे राही चल” — यह पुकार आत्मा को आमंत्रण देती है कि वह मोह, आलस्य और कर्मों की बेड़ियों को छोड़कर उस मार्ग पर चले जहाँ आत्मा को उसकी शुद्ध पहचान मिलती है। यह भजन विशेष रूप से ध्यान-साधना शिविरों, प्रवचन आरंभ, या आत्मचिंतन सत्रों में […] - [जहाँ नेमी के चरण पड़े, गिरनार वो धरती है... Jain Bhajan](https://jinvani.in/jahan-nemi-ke-charan-pade/): “जहाँ नेमी के चरण पड़े, गिरनार वो धरती है…” एक अत्यंत पवित्र और भावपूर्ण जैन भजन है, जो तीर्थराज गिरनार पर्वत और भगवान नेमिनाथ की दिव्य साधना का गौरवगान करता है। इस भजन के माध्यम से श्रद्धालु गिरनार की उस भूमि को नमन करता है, जहाँ तीर्थंकर नेमिनाथ प्रभु ने तपस्या, वैराग्य और आत्मशुद्धि की चरम सीमा तक पहुँचा कर मोक्षमार्ग को आलोकित किया। Jain Bhajan बताता है कि गिरनार केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि साधना, समर्पण और आत्मकल्याण की साक्षात भूमि है — जहाँ नेमी प्रभु के चरण पड़े, वह धरती स्वयं धन्य हो गई। वहाँ की प्रत्येक चोटी, […] - [व्हाला आदिनाथ मे तो पकडयो तारो हाथ (Jain Bhajan)](https://jinvani.in/bhagwan-adinath-jain-bhajan/): “व्हाला आदिनाथ मे तो पकड़्यो तारो हाथ…” एक अत्यंत मधुर और आत्मा को छू लेने वाला जैन भजन है, जो प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ के प्रति श्रद्धा, समर्पण और भरोसे को व्यक्त करता है। इस भजन में भक्त अपने जीवन के संघर्षों और मोह-जाल से थककर प्रभु आदिनाथ का हाथ थाम लेने की भावना व्यक्त करता है — एक ऐसा हाथ जो उसे संसार के अंधकार से निकालकर मोक्ष के प्रकाश की ओर ले जाए। यह भजन विशेष रूप से आदिनाथ प्रभु की पूजन, भक्ति कार्यक्रमों, और आत्मिक ध्यान के समय भाव-विभोर होकर गाया जाता है, जब साधक खुद […] - [समाधि-भक्ति (तेरी छत्रच्छाया) - Samadhi Bhakti](https://jinvani.in/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf-%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9b%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b/): तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे शिर पर हो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥ जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत-संयम चाहू ॥ गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥ १॥ तेरी.. ॥ परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ। हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तौलूँ॥ आत्म-तत्त्व की रहे भावना, भाव विमल भर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो ॥ 2॥ तेरी..॥ जिनशासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोडूँ । निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोडूँ ॥ जन्म-जन्म में जैनधर्म, यह मिले कृपा कर दो। […] - [Samadhi Bhakti in Sanskrit - समाधी भक्ति संस्कृत](https://jinvani.in/samadhi-bhakti-in-sanskrit/):  “समाधि भक्ति” इसी गहन आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन करती है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच की दूरी मिट जाती है। यह मात्र पूजा-पाठ या स्तुति से कहीं बढ़कर है; यह दिव्य प्रेम में पूर्ण तल्लीनता की स्थिति है। संस्कृत के ये दो शब्द—समाधि और भक्ति—मिलकर एक ऐसे आध्यात्मिक अनुभव को परिभाषित करते हैं, जहाँ मन की सारी चंचलता थम जाती है और आत्मा अपने आराध्य में पूरी तरह लीन हो जाती है। यह लेख आपको समाधि भक्ति के गूढ़ अर्थ, इसके आध्यात्मिक महत्व और विभिन्न भारतीय परंपराओं में इसकी अवधारणा से परिचित कराएगा। आइए, इस यात्रा पर चलें और […] - [मंगलाचरण (चौबीस तीर्थंकर) | Mangalacharan 24 Thirthankar](https://jinvani.in/mangalacharan-24-thirthankar/): जैन धर्म में २४ तीर्थंकरों का स्मरण करने के लिए अक्सर उनके नाम, गुण और उनसे जुड़ी विशेष पहचानों का उल्लेख किया जाता है। एक सामान्य मंगलाचरण श्लोक इन सभी को एक साथ नमन करता है। कई स्तोत्रों और भजनों में सीधे २४ तीर्थंकरों के नामों का उल्लेख करते हुए मंगलाचरण किया जाता है। इसका उद्देश्य प्रत्येक तीर्थंकर को व्यक्तिगत रूप से स्मरण कर उनके गुणों को ग्रहण करना है। मंगलाचरण (चौबीस तीर्थंकर) उसहमजियं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च । पउमप्पहं सुपासं , जिणं च चंदप्पहं वंदे ।। सुविहिं च पुप्फयंतं,‌ सीयल सेयंस वासुपुज्जं च। विमलमणंत-भयवं धम्मं संतिं च […] - [आत्मा अनंत गुणों का धनी - Jain Bhajan](https://jinvani.in/atma-anant-guno-ka-dhani/): “आत्मा अनंत गुणों का धनी” एक अत्यंत प्रेरणादायक जैन भजन है, जो आत्मा की वास्तविक महिमा और उसकी दिव्यता को उजागर करता है। यह भजन हमें यह स्मरण कराता है कि हमारी आत्मा कोई साधारण तत्व नहीं, बल्कि वह अनंत ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख और शक्ति जैसे अनगिनत गुणों से परिपूर्ण है — बस आवश्यकता है इन गुणों को पहचानने और जागृत करने की। इस भजन में आत्मा को केंद्र में रखकर बताया गया है कि यदि हम अपने भीतर झाँकेँ, तो वहाँ कोई सीमा नहीं — बल्कि पूर्ण स्वतंत्रता, पवित्रता और अपार शक्ति छुपी हुई है। यह भजन अहंकार […] - [शास्त्र स्वाध्याय का मंगलाचरण - Shastra Mangalacharan](https://jinvani.in/shastra-mangalacharan/): ॐ नमः सिद्धेभ्यः ॐ जय जय जय नमोऽस्तु ! नमोऽस्तु !! नमोऽस्तु !!! णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।। ॐ कारं बिन्दुसंयुक्तं, नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव, ॐकाराय नमो नमः ।। अविरल – शब्दघनौघ प्रक्षालित सकलभूतल – कलङ्का। मुनिभिरुपासित – तीर्थ सरस्वती हरतु नो दुरितान् ।। अज्ञान – तिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जन शलाक्या । चक्षुरुन्मीलिनं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। श्रीपरमगुरवे नमः, परम्पराचार्यगरुवे नमः सकलकलुष – विध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं भव्यजीवमनः प्रतिबोध कारकमिदं शास्त्रं श्री (ग्रन्थ का नाम) नामधेयं, अस्य मूलग्रन्थकर्तारः श्रीसर्वज्ञदेवास्तदुत्तरग्रन्थकर्तारः श्रीगणधरदेवाः प्रतिगणधरदेवास्तेषां वचोऽनुसारमासाद्य श्री (आचार्य का नाम) आचार्येण विरचितं, श्रोतारः सावधानतया श्रृण्वन्तु […] - [Yeh Sach hai ki Navkar mai - Bhajan](https://jinvani.in/yeh-sach-hai-ki-navkar-mai/): (लय – ये तो सच है की भगवान है…) ये तो सच है कि नवकार में, सब मंत्रो का ही सार है -२ इसे जो भी जपे रात दिन, होता उसका ही भव पार है। ये तो सच है कि नवकार में… अरिहंतो को भी इसमें सुमिरन किया, और सिद्धो का भी इसमें ध्यान धरा आचार्यो को भी नतमस्तक होकर, उपाध्यायों को भी इसमें वंदन किया। सब साधु भगवन्तो को भी, नमन इसमें बारम्बार है -२ इसे जो भी जपे रात दिन, होता उसका ही भव पार है। ये तो सच है कि नवकार में…. राजा श्रेणिक भी जब कुष्ठ […] - [मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूं - Bhajan](https://jinvani.in/mai-gyananand-swabhawi-hun-jain-bhajan/): मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूं, मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूं ॥ मैं हूं अपने में स्वयं पूर्ण, पर की मुझमें कुछ गंध नहीं । मैं अरस, अरूपी, अस्पर्शी, पर से कुछ भी सम्बन्ध नहीं ॥ मैं रंग-राग से भिन्न भेद से, भी मैं भिन्न निराला हूं । मैं हूं अखंड चैतन्य-पिण्ड, निज-रस में रमने वाला हूं ॥ मैं ही मेरा कर्ता-धर्ता, मुझमें पर का कुछ का काम नहीं । मैं मुझमें रमने वाला हूं, पर में मेरा विश्राम नहीं ॥ मैं शुद्ध-बुद्ध अविरुद्ध एक, पर परिणति से अप्रभावी हूं । आत्मानुभूति से प्राप्त तत्त्व, मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ ॥ ये भी पढे […] - [प्रथमं मंगलम मंत्र नवकार, इसके जपने से होता है भव पार... Bhajan](https://jinvani.in/pratham-mangalam-mantra-navkar-jain-bhajan/): तर्ज – भर दो झोली मेंरी…  प्रथमं मंगलम मंत्र नवकार, इसके जपने से होता है भव पार। पांच पदों के पैतीस अक्षर, भव-भव के काँटे चक्कर …   इसमें गर्भित है सारा आगमसर, इसके जपने से होता है भव पार। प्रथमं मंगलम मंत्र नवकार, इसके जपने से होता है भव पार। अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय, सर्व साधु को मेरा नमन। गुण समूह है ये एक सो आठ, अष्ट कर्मो को देते ये काट। गुण सुमिरन करें हम भी जरा सा, जिनागम का है सार भरा सा… पीले ये प्याला हम भी तो जरा सा, जपते जपते ही निकले मेरे प्राण। […] - [अमृत से गगरी भरो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे.. Bhajan](https://jinvani.in/amrit-se-gagri-bharo-jain-bhajan/): (तर्ज – महलो का राजा मिला, के रानी बेटी राज करेगी…) अमृत से गगरी भरो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे। खुशी-खुशी मिल के चलो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे। टेक॥ सब साथी मिल कलश सजाओ, मङ्गलकारी गीत सुनाओ; मन में आनन्द भयो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे ।।१।। अमृत… इन्द्र इन्द्राणी मिल हर्ष मनावें, प्रभु-चरणों में शीश झुकावें; प्रभुजी की छवि निरखो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे ॥२ ।। अमृत… सुवर्ण कलश प्रभु उदकनि धारा, अङ्गे न्हावे जिनवर प्यारा; स्वामी जगत को खरो, कि न्हवन प्रभु आज करेंगे ॥३॥ अमृत… हे सुखकारी सब दु:खहारी, सेवा जिनकी प्यारी-प्यारी; लेकर ‘सरस’ को चलो, कि न्हवन […] - [Bhagwan Mahaveer (Bhajan)](https://jinvani.in/bhagwan-mahaveer-jain-bhajan/): प्रभु वीर ने मुक्ति का पथ दिखाया पथ को हमने ही पंथ बनाया पथ के ऊपर एक बिंदु लगाया बिंदु में उलझे, सिंधु भुलाया इस पंथवाद ने हमें कहाँ तक पहुँचाया किससे जीते हम? हमने किसे हराया? हमने किसे हराया? रहें हम महावीर के ही बनकर ना श्वेतांबर, ना दिगंबर हम जैन हैं, कहो हम जैन हैं रहें हम महावीर के ही बनकर ना श्वेतांबर, ना दिगंबर हम जैन हैं, कहो हम जैन हैं ओ, लेकर पुण्य का ये सागर जन्मे जैन कुल के अंदर हम जैन हैं, कहो हम जैन हैं धरम से जैन हैं, करम से जैन हैं […] - [तुम से लागी लगन (Bhajan)](https://jinvani.in/jain-bhajan-tum-se-lagi-lagan/): Jain Bhajan Tum se Lagi Lagan तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा, मेटो मेटो जी संकट हमारा || निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेह तजूँ, जीवन सारा, तेरे चरणों में बीत हमारा ||टेक|| अश्वसेन के राजदुलारे, वामा देवी के सुत प्राण प्यारे|| सबसे नेह तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा || मेटो मेटो जी संकट हमारा || इंद्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए || आशा पूरो सदा, दुःख नहीं पावे कदा, सेवक थारा || मेटो मेटो जी संकट हमारा || जग के दुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की […] - [मेरे सर पर रख दो भगवन (भजन)](https://jinvani.in/mere-sir-par-rakh-do-bhagwan-jain-bhajan/): मेरे सर पर रख दो भगवन, अपने ये दोनों हाथ, देना हो तो दीजिये, जनम-जनम का साथ ॥ मेरे सर पर रख दो भगवन, अपने ये दोनों हाथ, देना हो तो दीजिये, जनम-जनम का साथ ॥ सूना है हमने शरणागत को अपने गले लगाते हो ऐसा हमने क्या माँगा जो, देने से घबराते हो चाहे सुख में रख या दुःख में, बस थामें रखियो हाथ ॥१॥ झुलस रहे हैं गम की धुप में, प्यार की छैंया कर दे तू बिन मांझी के नाव चले ना, अब पतवार पकड़ ले तू मेरा रास्ता रौशन कर दो, छाई अंधियारी रात ॥२॥ इसी […] - [श्री नाकोड़ा भैरव चालीसा - Nakoda Bhairav Chalisa](https://jinvani.in/nakoda-bhairav-chalisa/): श्री नाकोड़ा भैरव चालीसा पार्श्वनाथ भगवान की, मूरत चित बसाए ॥ भैरव चालीसा लिखू, गाता मन हरसाए ॥ नाकोडा भैरव सुखकारी, गुण गाये ये दुनिया सारी ॥ भैरव की महिमा अति भारी, भैरव नाम जपे नर  नारी ॥ जिनवर के हैं आज्ञाकारी, श्रद्धा रखते समकित धारी ॥ प्रातःउठ जो भैरव ध्याता, ऋद्धि सिद्धि सब संपत्ति पाता ॥ भैरव नाम जपे जो कोई, उस घर में निज मंगल होई ॥ नाकोडा लाखों नर आवे, श्रद्धा से परसाद चढावे ॥ भैरव–भैरव आन पुकारे, भक्तों के सब कष्ट निवारे ॥ भैरव दर्शन शक्ति–शाली, दर से कोई न जावे खाली ॥ जो नर नित […] - [Shri Abhinandan Nath Chalisa - श्री अभिनन्दन नाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-abhinandan-nath-chalisa/): Shri Abhinandan Nath Chalisa ऋषभ – अजित – सम्भव अभिनन्दन, दया करे सब पर दुखभंजन जनम – मरन के टुटे बन्धन, मन मन्दिर तिष्ठें अभिनन्दन ।। अयोध्या नगरी अती सुंदर, करते राज्य भूपति संवर ।। सिद्धार्था उनकी महारानी, सूंदरता में थी लासानी ।। रानी ने देखे शुभ सपने, बरसे रतन महल के अंगने ।। मुख में देखा हस्ति समाता, कहलाई तीर्थंकर माता ।। जननी उदर प्रभु अवतारे, स्वर्गो से आए सुर सारे ।। मात पिता की पूजा करते, गर्भ कल्याणक उत्सव करते ।। द्धादशी माघ शुक्ला की आई, जन्मे अभिनन्दन जिनराई ।। देवो के भी आसन काँपे, शिशु को ले […] - [Tumse Lagi Lagan (Bhajan)](https://jinvani.in/tumse-lagi-lagan-jain-bhajan/): Jain Bhajan तुम से लागी लगन, ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा, मेटो मेटो जी संकट हमारा || निशदिन तुमको जपूँ, पर से नेह तजूँ, जीवन सारा, तेरे चरणों में बीत हमारा ||टेक|| अश्वसेन के राजदुलारे, वामा देवी के सुत प्राण प्यारे|| सबसे नेह तोड़ा, जग से मुँह को मोड़ा, संयम धारा || मेटो मेटो जी संकट हमारा || इंद्र और धरणेन्द्र भी आए, देवी पद्मावती मंगल गाए || आशा पूरो सदा, दुःख नहीं पावे कदा, सेवक थारा || मेटो मेटो जी संकट हमारा || जग के दुःख की तो परवाह नहीं है, स्वर्ग सुख की भी चाह नहीं है|| […] - [समाधि भक्ति पाठ (तेरी छत्र छाया)](https://jinvani.in/samadhi-bhakti-paath/): समाधि भक्ति तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे शिर पर हो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥ जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत-संयम चाहू ॥ गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥ १॥ तेरी.. ॥ परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ। हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तौलूँ॥ आत्म-तत्त्व की रहे भावना, भाव विमल भर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो ॥ 2॥ तेरी..॥ जिनशासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोडूँ । निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोडूँ ॥ जन्म-जन्म में जैनधर्म, यह मिले कृपा […] - [श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ जिन पूजा - Shri Parshwnath Pooja](https://jinvani.in/shri-parshwnath-pooja/): (अडिल्ल छन्द) ह्रूं कार अक्षरात्मक देव जो ध्यावते | देव मनुष्य पशु कृत सो व्याधि नशावते || कांसी तांबे पत्र पे शुद्ध लिखावते | केशर चंदन तापर गंध रचावते || (दोहा) ऐसे अनुपम-यंत्र को, मन वच काय संभार | जे भवि पूजें प्रीति धर, हों भवदधि से पार ||१|| यंत्र-स्थापना (चाल जोगीरासा) है महिमा को थान शुद्ध वर-यंत्र कलिकुंड जानो | डाकिनि शाकिनि अगनि चोर भय नाशत सब दु:ख खानो || नवग्रहों का सब दु:ख नाशो रवि-शनि आदि पिछानो | तिनका मैं स्थापन करहूँ त्रिविध-योग मन लानो || ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं कलिकुंडदंडश्रीपार्श्वनाथ धरणेन्द्रपद्मावती सेवित अतुलबल-वीर्य-पराक्रमयुक्त सर्वविघ्न-विनाशक ! […] - [Shri Pushpdant Chalisa - श्री पुष्पदन्त चालीसा](https://jinvani.in/shri-pushpdant-chalisa/): श्री पुष्पदन्त चालीसा दुख से तप्त मरूस्थल भव में, सघन वृक्ष सम छायाकार ।। पुष्पदन्त पद – छत्र – छाँव में हम आश्रय पावे सुखकार ।। जम्बूद्विप के भारत क्षेत्र में, काकन्दी नामक नगरी में ।। राज्य करें सुग्रीव बलधारी, जयरामा रानी थी प्यारी ।। नवमी फाल्गुन कृष्ण बल्वानी, षोडश स्वप्न देखती रानी ।। सुत तीर्थंकर हर्भ में आएं, गर्भ कल्याणक देव मनायें ।। प्रतिपदा मंगसिर उजयारी, जन्मे पुष्पदन्त हितकारी ।। जन्मोत्सव की शोभा नंयारी, स्वर्गपूरी सम नगरी प्यारी ।। आयु थी दो लक्ष पूर्व की, ऊँचाई शत एक धनुष की ।। थामी जब राज्य बागडोर, क्षेत्र वृद्धि हुई चहुँ ओर ।। इच्छाएँ […] - [Shri Shantinath Chalisa - श्री शान्तिनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-shantinath-chalisa/): श्री शान्तिनाथ चालीसा शान्तिनाथ भगवान का, चालीसा सुखकार ।। मोक्ष प्राप्ति के लिय, कहूँ सुनो चितधार ।। चालीसा चालीस दिन तक, कह चालीस बार ।। बढ़े जगत सम्पन, सुमत अनुपम शुद्ध विचार ।। शान्तिनाथ तुम शान्तिनायक, पण्चम चक्री जग सुखदायक ।। तुम ही सोलहवे हो तीर्थंकर, पूजें देव भूप सुर गणधर ।। पत्र्चाचार गुणोके धारी, कर्म रहित आठों गुणकारी ।। तुमने मोक्ष मार्ग दर्शाया, निज गुण ज्ञान भानु प्रकटाया ।। स्याद्वाद विज्ञान उचारा, आप तिरे औरन को तारा ।। ऎसे जिन को नमस्कार कर, चढूँ सुमत शान्ति नौका पर ।। सूक्ष्म सी कुछ गाथा गाता, हस्तिनापुर जग विख्याता ।। विश्व […] - [श्री अरहनाथ चालीसा - Shri Arahnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-arahnath-chalisa/): श्री अरहनाथ चालीसा जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर, श्री अरहनाथ भगवान को समर्पित एक पवित्र भक्ति स्तोत्र है। भक्तगण अपनी श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने के लिए नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं। ऐसा विश्वास है कि श्री अरहनाथ चालीसा का भक्तिपूर्वक पाठ करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। यह चालीसा भक्त और भगवान के बीच एक सेतु का कार्य करती है, जिससे devotees प्रभु के करीब महसूस करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा पाते हैं। श्री अरहनाथ […] - [श्री कुन्थनाथ चालीसा - Shri Kunthunath Chalisa](https://jinvani.in/shri-kunthunath-chalisa/): श्री कुन्थनाथ चालीसा दयासिन्धु कुन्थु जिनराज, भवसिन्धु तिरने को जहाज । कामदेव… चक्री महाराज, दया करो हम पर भी आज । जय श्री कुन्युनाथ गुणखान, परम यशस्वी महिमावान । हस्तिनापुर नगरी के भूपति, शूरसेन कुरुवंशी अधिपति । महारानी थी श्रीमति उनकी, वर्षा होती थी रतनन की । प्रतिपदा बैसाख उजियारी, जन्मे तीर्थकर बलधारी । गहन भक्ति अपने उर धारे, हस्तिनापुर आए सुर सारे । इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, गए सुमेरु हर्षित होकर । न्हवन करें निर्मल जल लेकर, ताण्डव नृत्य करे भक्वि- भर 1 कुन्थुनाथ नाम शुभ देकर, इन्द्र करें स्तवन मनोहर । दिव्य-वस्त्र- भूषण पहनाए, वापिस हस्तिनापुर […] - [श्री अनन्तनाथ चलीसा - Shri Anantnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-anantnath-chalisa/): Shri Anantnath Chalisa अनन्त चतुष्टय धारी ‘अनन्त, अनन्त गुणों की खान “अनन्त’ । सर्वशुध्द ज्ञायक हैं अनन्त, हरण करें मम दोष अनन्त । नगर अयोध्या महा सुखकार, राज्य करें सिहंसेन अपार । सर्वयशा महादेवी उनकी, जननी कहलाई जिनवर की । द्वादशी ज्येष्ठ कृष्ण सुखकारी, जन्मे तीर्थंकर हितकारी । इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, न्हवन करें मेरु पर जाकर । नाम “अनन्तनाथ’ शुभ बीना, उत्सव करते नित्य नवीना । सार्थक हुआ नाम प्रभुवर का, पार नहीं गुण के सागर का । वर्ण सुवर्ण समान प्रभु का, जान धरें मति- श्रुत- अवधि का । आयु तीस लख वर्ष उपाई, धनुष अर्घशन […] - [श्री विमलनाथ चालीसा - Shri Vimalnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-vimalnath-chalisa/): श्री विमलनाथ चालीसा सिद्ध अनन्तानन्त नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय ।। विमलप्रभु क्री विमल भक्ति कर, चरण कमल में शीश नवाय ।। जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठों कर्म किए नि:शेष ।। कृतवर्मा के राजदुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।। मंगलीक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे ।। शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयन्ती विमलनाथ की ।। जन्योत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया ।। मेरु पर अभिषेक कराया, गन्धोंदक श्रद्धा से लगाया ।। वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात-पिता को सौंपा आकर ।। साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।। कंचन जैसी छवि […] - [श्री पार्श्वनाथ-जिन पूजा (पुष्पेंदु) | Parasnath Jin Pooja](https://jinvani.in/parasnath-jin-pooja-pushpendu/): कविश्री ‘पुष्पेंदु’ हे पार्श्वनाथ! हे अश्वसेन-सुता! करुणासागर तीर्थंकर हे सिद्धशिला के नेता! हे ज्ञान-संपन्न तीर्थंकर || हम भावुकता से भर गए, तुम्हारे नाथ! बुलाया भगवान! गाथा की गंगा से, तुमाने कितनों को तारा है || हम द्वार तुम्हारे आये हैं, करुणा कर नेक निहारो तो | मेरे उर के सिंहासन पर, पग धरो नाथ! खड़े हो जाओ ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्र! अवतार! अवतार! संवशात्! (मंगलाचरण) ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्र! ईमानदार! थ:!थ! (स्थापना) ॐ ह्रीं श्री पार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव! बहुत खूब! वर्ष! (सतृधिकरणम्) (शंभू चंद) मैं निर्मल धारा ले आया, मेरे अंतर को निर्मल बनाओ मेरा भेद कौन हे […] - [श्री शीतलनाथ चालीसा - Shri Sheetalnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-sheetalnath-chalisa/): Shri Sheetalnath Chalisa शीतल हैं शीतल वचन, चन्दन से अघिकाय । कल्पवृक्ष सम प्रभु चरण, है सबको सुखदाय । जय श्री शीतलनाथ गुणाकर, महिमा मण्डित.करुणासागर । भद्धिलपुर के दृढ़रथ राय, भूप प्रजावत्सल कहलाए । रमणी रत्न सुनन्दा रानी, गर्भ में आए जिनवर ज्ञानी । द्वादशी माघ बदी को जन्मे, हर्ष लहर उमडी त्रिभुवन में । उत्सव करते देव अनेक, मेरु पर करते अभिषेक । नाम दिया शिशु जिन को शीतल, भीष्म ज्वाल अध होती शीतल । एक लक्ष पूर्वायु प्रभु की, नब्बे धनुष अवगाहना वपु की । वर्ण स्वर्ण सम उज्जवलपीत, दया धर्म था उनका मीत । निरासक्त थे विषय […] - [Shri Dharamnath Chalisa - श्री धर्मनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-dharamnath-chalisa/): श्री धर्मनाथ चालीसा उत्तम क्षमा अदि दस धर्म,प्रगटे मूर्तिमान श्रीधर्म । जग से हरण करे सन अधर्म, शाश्वत सुख दे प्रभु धर्म ।। नगर रतनपुर के शासक थे, भूपति भानु प्रजा पालक थे। महादेवी सुव्रता अभिन्न, पुत्रा आभाव से रहती खिन्न ।। प्राचेतस मुनि अवधिलीन, मत पिता को धीरज दीन । पुत्र तुम्हारे हो क्षेमंकर, जग में कहलाये तीर्थंकर ।। धीरज हुआ दम्पति मन में, साधू वचन हो सत्य जगत में । मोह सुरम्य विमान को तजकर, जननी उदर बसे प्रभु आकर ।। तत्क्षण सब देवों के परिकर, गर्भाकल्याणक करें खुश होकर । तेरस माघ मास उजियारी, जन्मे तीन ज्ञान […] - [Shri Ajitnath Chalisa - श्री अजितनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-ajitnath-chalisa/): श्री अजितनाथ चालीसा श्री आदिनाथ को शिश नवा कर, माता सरस्वती को ध्याय । शुरू करूँ श्री अजितनाथ का, चालीसास्व – सुखदाय ।। जय श्री अजितनाथ जिनराज । पावन चिह्न धरे गजराज ।। नगर अयोध्या करते राज । जितराज नामक महाराज ।। विजयसेना उनकी महारानी । देखे सोलह स्वप्न ललामी ।। दिव्य विमान विजय से चयकर । जननी उदर बसे प्रभु आकर ।। शुक्ला दशमी माघ मास की । जन्म जयन्ती अजित नाथ की ।। इन्द्र प्रभु को शीशधार कर । गए सुमेरू हर्षित हो कर ।। नीर शीर सागर से लाकर । न्हवन करें भक्ति में भरकर ।। वस्त्राभूषण […] - [Shri Sambhavnath Chalisa - श्री सम्भवनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-sambhavnath-chalisa/): Shri Sambhavnath Chalisa श्री जिनदेव को करके वंदन, जिनवानी को मन में ध्याय । काम असम्भव कर दे सम्भव, समदर्शी सम्भव जिनराय ।। जगतपूज्य श्री सम्भव स्वामी । तीसरे तीर्थकंर है नामी ।। धर्म तीर्थ प्रगटाने वाले । भव दुख दुर भगाने वाले ।। श्रावस्ती नगरी अती सोहे । देवो के भी मन को मोहे ।। मात सुषेणा पिता दृडराज । धन्य हुए जन्मे जिनराज ।। फाल्गुन शुक्ला अष्टमी आए । गर्भ कल्याणक देव मनाये ।। पूनम कार्तिक शुक्ला आई । हुई पूज्य प्रगटे जिनराई ।। तीन लोक में खुशियाँ छाई । शची पर्भु को लेने आई ।। मेरू पर […] - [श्री श्रेयान्सनाथ चालीसा - Shri Shreyansnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-shreyansnath-chalisa/): श्री श्रेयान्सनाथ चालीसा निज मन में करके स्थापित, पंच परम परमेष्ठि को । लिखूँ श्रेयान्सनाथ – चालीसा, मन में बहुत ही हर्षित हो ।। जय श्रेयान्सनाथ श्रुतज्ञायक हो, जय उत्तम आश्रय दायक हो ।। माँ वेणु पिता विष्णु प्यारे, तुम सिहंपुरी में अवतारे ।। जय ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी प्यारी, शुभ रत्नवृष्टि होती भारी ।। जय गर्भकत्याणोत्सव अपार, सब देव करें नाना प्रकार ।। जय जन्म जयन्ती प्रभु महान, फाल्गुन एकादशी कृष्ण जान ।। जय जिनवर का जन्माभिषेक, शत अष्ट कलश से करें नेक ।। शुभ नाम मिला श्रेयान्सनाथ, जय सत्यपरायण सद्यजात ।। निश्रेयस मार्ग के दर्शायक, जन्मे मति- श्रुत- अवधि […] - [Shri Suparshvanath Chalisa - श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-suparshvanath-chalisa/): श्री सुपार्श्वनाथ चालीसा लोक शिखर के वासी है प्रभु, तीर्थंकर सुपार्श्व जिनराज ।। नयन द्वार को खोल खडे हैं, आओ विराजो हे जगनाथ ।। सुन्दर नगर वारानसी स्थित, राज्य करे राजा सुप्रतिष्ठित ।। पृथ्वीसेना उनकी रानी, देखे स्वप्न सोलह अभिरामी ।। तीर्थंकर सुत गर्भमें आए, सुरगण आकर मोद मनायें ।। शुक्ला ज्येष्ठ द्वादशी शुभ दिन, जन्मे अहमिन्द्र योग में श्रीजिन ।। जन्मोत्सव की खूशी असीमित, पूरी वाराणसी हुई सुशोभित ।। बढे सुपार्श्वजिन चन्द्र समान, मुख पर बसे मन्द मुस्कान ।। समय प्रवाह रहा गतीशील, कन्याएँ परणाई सुशील ।। लोक प्रिय शासन कहलाता, पर दुष्टो का दिल दहलाता ।। नित प्रति […] - [श्री पार्श्वनाथ चालीसा - Shri Parshvnath Chalisa](https://jinvani.in/shri-parshvnath-chalisa/): श्री पार्श्वनाथ चालीसा जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर *भगवान पार्श्वनाथ* की महिमा, करुणा और तप के गुणों का स्तुतिगान है। यह चालीसा भक्तों को आंतरिक शांति, सद्गुणों का विकास और जीवन में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देती है। पार्श्वनाथ भगवान को अहिंसा, सत्य और संयम के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। Shri Parasnath Chalisa PDF का नियमित पाठ व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करता है और कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखने की शक्ति देता है। जैन आगमों में वर्णित उनके तप, त्याग और दयालुता के संदेश आज भी जीवन प्रबंधन का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। माना […] - [Shri Sumatinath Chalisa - श्री सुमतिनाथ चालीसा](https://jinvani.in/shri-sumatinath-chalisa/): Shri Sumatinath Chalisa श्री सुमतिनाथ का करूणा निर्झर, भव्य जनो तक पहूँचे झर – झर ।। नयनो में प्रभु की छवी भऱ कर, नित चालीसा पढे सब घर – घर ।। जय श्री सुमतिनाथ भगवान, सब को दो सदबुद्धि – दान ।। अयोध्या नगरी कल्याणी, मेघरथ राजा मंगला रानी ।। दोनो के अति पुण्य पर्रजारे, जो तीर्थंकर सुत अवतारे ।। शुक्ला चैत्र एकादशी आई, प्रभु जन्म की बेला आई ।। तीन लोक में आनंद छाया, नरकियों ने दुःख भुलाया ।। मेरू पर प्रभु को ले जा कर, देव न्हवन करते हर्षाकार ।। तप्त स्वर्ण सम सोहे प्रभु तन, प्रगटा अंग […] ## Pages - [Contribution to Jinvani.in](https://jinvani.in/contribution/): Jinvani.in एक Non-Profit Website है, जो की बिना किसी Advertisement के हम सभी के कार्यरत है। हमारा मिशन है की Mandir.Jinvani.in पर भारत के सभी Jain Mandir और जैन धर्मशाला, भोजनालय को लिस्ट कर सके जिससे की हम सभी को जो दूसरे शहर मे आसानी से Jain Dharmshala और Bhojnalaya मिल सके, लेकिन इतनी बड़ी वेबसाईट अकेले संभलना बहुत मुस्किल है जिसके लिए हमे आप लोगों का सपोर्ट चाहिए है। आप किसी भी माध्यम से हमे Support कर सकते है।  Jinvani.in पर हर दिन लगभग 5000 से ज्यादा पाठक आते है और लाभ उठाते है, आप भी अपने Business अपने […] - [📢 हमारे साथ विज्ञापन करें | Advertise With Us](https://jinvani.in/advertise-with-us/): Jinvani.in जैन धर्म को समर्पित एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय ऑनलाइन मंच है, जिसे प्रतिदिन 5000+ से अधिक पाठक नियमित रूप से पढ़ते हैं। यदि आप अपने व्यवसाय, सेवाओं या किसी विशेष पहल को जैन समुदाय और धर्मिक पाठकों तक पहुँचाना चाहते हैं, तो Jinvani.in आपके लिए एक आदर्श मंच है। ✅ हमारे प्लेटफॉर्म की खासियत: 📦 विज्ञापन विकल्प (Ad Options): 📬 संपर्क करें अगर आप विज्ञापन देना चाहते हैं या अधिक जानकारी चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें: 📧 Email: Admin@Jinvani.in हम आपको बेहतरीन रेट्स और सेवाएँ प्रदान करने का प्रयास करेंगे। 🙏 हमारा उद्देश्य हमारा उद्देश्य है जैन धर्म […] - [Affiliate Disclosure](https://jinvani.in/affiliate-disclosure/): Amazon Affiliate Disclosure Jinvani (https://jinvani.in) is a participant in the Amazon Services LLC Associates Program, an affiliate advertising program designed to provide a means for sites to earn advertising fees by advertising and linking to Amazon.in. As an Amazon Associate, we earn from qualifying purchases. This means that if you click on an affiliate link and make a purchase, we may receive a small commission at no additional cost to you. We only recommend products and services that we believe will add value to our readers. - [Contact Us](https://jinvani.in/contact-us/): Thank You for visiting our site Jinvani – Jain Sangrah. We value our users and would be happy to hear from you. Please connect with us in case of any queries, concerns or for any kind of feedbacks. If you have any suggestion or doubt regarding Jinvani.in, you can tell us by mailing us at Swarn1508@gmail.com अपने क्षेत्र में हो रही जैन धर्म की विभिन्न गतिविधियों सहित जैन धर्म के किसी भी कार्यक्रम, महोत्सव आदि का विस्तृत सूचना हमें Email और Whatsapp के माध्यम से भेज सकते हैं ताकि आपके द्वारा भेजी सूचना दुनिया भर में फैले जैन समुदाय के […] - [About Us](https://jinvani.in/about-us/): Welcome to Jivani.in your number one source for all religious things. We’re dedicated to giving you the very best of religious contents. Here I keep sharing Aarti, Pooja, Bhajan, Chalisa, Mantra and all activities related to Jainism  on Jinvani.in, on this website you will find all religious things. Founded in 2023 by Swarn, Bhagwatgeeta.co.in has come a long way from its beginnings in Lalitpur(UP), India. We now serve visitors all over the world, and are thrilled that we’re able to turn our passion into our own website. We hope you like this site as much as we fill proud offering […] - [Privacy Policy](https://jinvani.in/privacy-policy/): Who we are Our website address is: https://jinvani.in. Comments When visitors leave comments on the site we collect the data shown in the comments form, and also the visitor’s IP address and browser user agent string to help spam detection. An anonymized string created from your email address (also called a hash) may be provided to the Gravatar service to see if you are using it. The Gravatar service privacy policy is available here: https://automattic.com/privacy/. After approval of your comment, your profile picture is visible to the public in the context of your comment. Media If you upload images to […] ## Optional - [Agent (MCP protocol)](websites-agents.hostinger.com/jinvani.in/mcp) [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)