https://youtu.be/Pmz3KPZHWoM त्याग वैजयन्त सार सार-धर्म के अधार,जन्मधार धीर नम्र सुष्टु कौशलापुरी|अष्ट दुष्ट नष्टकार मातु वैजयाकुमार,आयु लक्षपूर्व दक्ष है बहत्तरैपुरी||ते जिनेश श्री महेश शत्रु के निकन्दनेश,अत्र हेरिये सुदृष्टि भक्त पै कृपा पुरी|आय तिष्ठ इष्टदेव मैं करौं पदाब्जसेव,परम शर्मदाय पाय आय शर्न आपुरी|| ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्रावतरावतर संवौषट् |ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः |ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् | अष्टकगंगाह्रदपानी निर्मल आनी, सौरभ सानी सीतानी |तसु धारत धारा तृषा निवारा, शांतागारा सुखदानी ||श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं |मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजौं ख्याता जग्गेशं ||ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय जन्म जरा मृत्युविनाशनाय जलं नि0स्वाहा |1| शुचि चंदन बावन ताप मिटावन, सौरभ पावन घसि ल्यायो |तुम भवतपभंजन हो शिवरंजन, पूजन रंजन मैं आयो || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय भवातापविनाशनाय चन्दनं नि0स्वाहा |2| सितखंड विवर्जित निशिपति तर्जित, पुंज विधर्जित तंदुल को |भवभाव निखर्जित शिवपदसर्जित, आनंदभर्जित दंदल को || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अक्षय पदप्राप्तये अक्षतान् नि0स्वाहा |3| मनमथ-मद-मंथन धीरज-ग्रंथन, ग्रंथ-निग्रंथन ग्रंथपति |तुअ पाद कुसेसे आधि कुशेसे, धारि अशेसे अर्चयती || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि0स्वाहा |4| आकुल कुलवारन थिरताकारन, क्षुधाविदारन चरु लायो |षट् रस कर भीने अन्न नवीने, पूजन कीने सुख पायो || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नेवैद्यं नि0स्वाहा |5| दीपक-मनि-माला जोत उजाला, भरि कनथाला हाथ लिया |तुम भ्रमतम हारी शिवसुख कारी, केवलधारी पूज किया |श्री अजित जिनेशं नुतनाकेशं, चक्रधरेशं खग्गेशं |मनवांछितदाता त्रिभुवनत्राता, पूजौं ख्याता जग्गेशं ||ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि0स्वाहा |6| अगरादिक चूरन परिमल पूरन, खेवत क्रूरन कर्म जरें |दशहूं दिश धावत हर्ष बढ़ावत, अलि गुण गावत नृत्य करें || श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं नि0स्वाहा |7| बादाम नंरगी श्रीफल पुंगी आदि अभंगी सों अरचौं |सब विघनविनाशे सुख प्रकाशै, आतम भासै भौ विरचौं ||श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं नि0स्वाहा |8| जलफल सब सज्जे, बाजत बज्जै, गुनगनरज्जे मनमज्जे |तुअ पदजुगमज्जै सज्जन जज्जै, ते भवभज्जै निजकज्जै ||श्री0ॐ ह्रीं श्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि0स्वाहा |9| पंचकल्याणक जेठ असेत अमावशि सोहे, गर्भदिना नँद सो मन मोहे |इंद फनिंद जजे मनलाई, हम पद पूजत अर्घा चढ़ाई ||ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णा-अमावस्यां गर्भमंगलप्राप्तायश्रीअजितनाथ जिनेन्द्राय अर्घ्यं नि0स्वाहा |1| माघ सुदी दशमी दिन जाये, त्रिभुवन में अति हरष बढ़ाये |इन्द फनिंद जजें तित आई, हम इत सेवत हैं हुलशाई ||ॐ ह्रीं माघशुक्ला दशमीदिने जन्मंगलप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |2| माघ सुदी दशमी तप धारा, भव तन भोग अनित्य विचारा |इन्द फनिंद जजैं तित आई, हम इत सेवत हैं सिरनाई ||ॐ ह्रीं माघशुक्ला दशमीदिने दीक्षाकल्याणकप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |3| पौषसुदी तिथि ग्यारस सुहायो, त्रिभुवनभानु सु केवल जायो |इन्द फनिंद जजैं आई, हम पद पूजत प्रीति लगाई ||ॐ ह्रीं पौषशुक्लाएकादशीदिनेज्ञानकल्याणकप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं नि0स्वाहा |4| पंचमि चैतसुदी निरवाना, निजगुनराज लियो भगवाना |इन्द फनिंद जजैं तित आई, हम पद पूजत हैं गुनगाई ||ॐ ह्रीं चैत्रशुक्ला पंचमीदिने निर्वाणमंगलप्राप्ताय श्रीअजित0 अर्घ्यं0 |5| …