दर्शन पच्चीसी(तुम निरखत) || Darshan Pacchisi

तुम निरखत मोकों मिली, मेरी सम्पति आज। कहाँ चक्रवति-संपदा कहाँ स्वर्ग-साम्राज ॥१॥ तुम वन्दत जिनदेव जी, नित नव मंगल होय। विघ्न कोटि ततछिन टरैं, लहहि सुजस सब लोय ॥२॥ तुम जाने बिन नाथ जी, एक स्वास के माँहि। जन्म-मरण अठदस…

Continue Readingदर्शन पच्चीसी(तुम निरखत) || Darshan Pacchisi