दर्शन-स्तुति (प्रभु पतित-पावन) || Darshan Stuti
कविवर बुधजन प्रभु पतित-पावन मैं अपावन चरन आयो सरन जी, यों विरद आप निहार स्वामी मेंट जामन मरन जी। तुम ना पिछान्यो आन मान्यो देव विविध प्रकार जी, या बुद्धि सेती निज न जान्यो भ्रम गिन्यो हितकार जी ॥१॥ भव-विकट-वन…
