जिन शान्तिधारा || Shantidhara

Siddhapuja hirachand

ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं
मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं
झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय-द्रावय
नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ओं ह्रीं क्रों अस्माकं पापं खण्डय खण्डय
जहि-जहि दह-दह पच-पच पाचय पाचय
ओं नमो अर्हन् झं झ्वीं क्ष्वीं हं सं झं वं ह्व: प: ह:
क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्ष: क्ष्वीं
ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रें ह्रैं ह्रों ह्रौं ह्रं ह्र:
द्रां द्रीं द्रावय द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ठ: ठ:
अस्माकं ———–
श्रीरस्तु वृद्धिरस्तु तुष्टिरस्तु पुष्टिरस्तु शान्तिरस्तु कान्तिरस्तु कल्याणमस्तु स्वाहा।
एवं अस्माकं ———— कार्यसिद्ध्यर्थं सर्वविघ्न-निवारणार्थं
श्रीमद्भगवदर्हत्सर्वज्ञपरमेष्ठि-परमपवित्राय नमो नम:।
अस्माकं —————– श्री तीर्थंकरभक्ति- प्रसादात्
सद्धर्म-श्रीबलायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिरस्तु, स्वशिष्य-परशिष्यवर्गा: प्रसीदन्तु न: |

ओं वृषभादय: श्रीवर्द्धमानपर्यन्ताश्चतुर्विंशत्यर्हन्तो भगवन्त:
सर्वज्ञा: परममंगल (धारागत तीर्थंकर का नाम) नामधेया:
अस्माकं इहामुत्र च सिद्धिं तन्वन्तु,
सद्धर्म कार्येषु च इहामुत्र च सिद्धिं प्रयच्छन्तु न: |

ओं नमोऽर्हते भगवते श्रीमते श्रीमत्पार्श्वतीर्थंकराय
श्रीमद्रत्नत्रयरूपाय दिव्यतेजोमूर्त्तये प्रभामण्डलमण्डिताय
द्वादशगणसहिताय अनन्तचतुष्टयसहिताय समवसरण- केवलज्ञान-लक्ष्मीशोभिताय
अष्टादश-दोषरहिताय षट्-चत्वारिंशद्-गुणसंयुक्ताय
परम-पवित्राय सम्यग्ज्ञानाय स्वयंभुवे सिद्धाय बुद्धाय परमात्मने
परमसुखाय त्रैलोक्यमहिताय अनंत-संसार-चक्रप्रमर्दनाय
अनन्तज्ञान-दर्शन-वीर्य-सुखास्पदाय त्रैलोक्य वशं कराय
सत्यज्ञानाय सत्यब्रह्मणे उपसर्ग-विनाशनाय
घातिकर्म क्षयं कराय अजराय अभवाय —————–
नामधेयानां व्याधिं घ्नन्तु।
श्री-जिनाभिषेकपूजन-प्रसादात् —————– सेवकानां
सर्वदोष-रोग-शोक-भय-पीड़ा-विनाशनं भवतु |

ओं नमोऽर्हते भगवते प्रक्षीणाशेष-दोष-कल्मषाय दिव्य-तेजोमूर्तये
श्रीशान्तिनाथाय शान्तिकराय सर्व-विघ्न-प्रणाशनाय
सर्वरोगापमृत्यु-विनाशनाय सर्वपरकृत क्षुद्रोपद्रव-विनाशनाय सर्वारिष्ट-शान्ति-कराय
ओं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: अ सि आ उ सा नम:
मम सर्वविघ्न-शान्तिं कुरु कुरु तुष्टिं-पुष्टिं कुरु-कुरु स्वाहा।
मम कामं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
रतिकामं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
बलिकामं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
क्रोधं पापं बैरं च छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
अग्नि-वायुभयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वशत्रु-विघ्नं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वोपसर्गं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व- विघ्नं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व राज्य-भयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वचौर-दुष्टभयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व-सर्प-वृश्चिक-सिंहादिभयंछिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व ग्रह -भयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वदोषं व्याधिं डामरं च छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वपरमंत्रं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वात्मघातं परघातं च छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व शूलरोगं कुक्षिरोगं अक्षिरोगं शिरोरोगं ज्वररोगं च छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वनरमारिं छिन्धि छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वगजाश्व-गो-महिष-अज-मारिं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व शस्य-धान्य-वृक्ष-लता-गुल्म-पत्र-पुष्प-फलमारिं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वराष्ट्रमारिं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वक्रूर-वेताल-शाकिनी-डाकिनी-भयानि छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व वेदनीयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वमोहनीयं छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वापस्मारिं छिन्धि -छिन्धि भिन्धि भिन्धि!
अस्माकम् अशुभकर्म-जनित-दु:खानि छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
दुष्टजन-कृतान् मंत्र-तंत्र-दृष्टि-मुष्टि-छल-छिद्रदोषान् छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वदुष्ट-देव-दानव-वीर-नर-नाहर-सिंह-योगिनी-कृत-दोषान् छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्व अष्टकुली-नागजनित-विषभयानि छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वस्थावर-जंगम-वृश्चिक-सर्पादिकृत-दोषान् छिन्धि-छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
सर्वसिंह-अष्टापदादि कृतदोषान् छिन्धि छिन्धिभिन्धि भिन्धि!
परशत्रुकृत-मारणोच्चाटन-विद्वेषण -मोहन-वशीकरणादि दोषान् छिन्धि–छिन्धि भिन्धि-भिन्धि!
ओं ह्रीं अस्मभ्यं चक्र-विक्रम-सत्त्व-तेजो-बल -शौर्य-शान्ती: पूरय पूरय!
सर्वजीवानंदनं जनानंदनं भव्यानंदनंगोकुलानंदनं च कुरु कुरु!
सर्व राजानंदनं कुरु कुरु!
सर्वग्राम-नगर खेडा-कर्वट-मटंब-द्रोणमुख-संवाहनानंदनं कुरु-कुरु! सर्वानंदनं कुरु-कुरु स्वाहा!

अनुष्टुब्छन्दः

यत्सुखं त्रिषु लोकेषु व्याधि-व्यसन-वर्जितम् |
अभयं क्षेममारोग्यं स्वस्तिरस्तु विधीयते ||
श्रीशान्तिरस्तु ! <तथास्तु!> शिवमस्तु ! <तथास्तु!> जयोस्तु! <तथास्तु!>
नित्यमारोग्यमस्तु! <तथास्तु!> अस्माकं पुष्टिरस्तु ! <तथास्तु!>
समृद्धिरस्तु ! < तथास्तु!>कल्याणमस्तु ! <तथास्तु!> सुखमस्तु ! <तथास्तु!>
अभिवृद्धिरस्तु ! <तथास्तु!> दीर्घायुरस्तु ! <तथास्तु!>
कुलगोत्र धनानि सदा सन्तु ! <तथास्तु!>
सद्धर्म-श्री-बल-आयु:- आरोग्य-ऐश्वर्य-अभिवृद्धिरस्तु |

ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं अ सि आ उ सा अनाहतविद्यायै णमो अरिहंताणं ह्रौं सर्व शान्तिं कुरु कुरु स्वाहा |

स्रग्धराछन्दः

आयुर्वल्ली विलासं सकलसुखफलैर्द्राघयित्वाऽऽश्वनल्पम् |
धीरं वीरं शरीरं निरुपमुप-नयत्वातनोत्वच्छकीर्तिम्।।
सिद्धिं वृद्धिं समृद्धिं प्रथयतु तरणि: स्फूर्यदुच्चै: प्रतापं।
कान्तिं शान्तिं समाधिं वितरतु भवतामुत्तमा शान्तिधारा।।
सम्पूजकानां प्रतिपालकानां, यतीन्द्र-सामान्य-तपोधनानाम्।
देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञ:, करोतु शान्तिं भगवान् जिनेन्द्र!!
|| इति वृहत्-शांतिधारा ||
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Note

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Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

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