आत्म-कीर्तन – ATAM KIRTAN

कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम| मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं हूँ वह हैं भगवान्| अन्तर यही ऊपरी जान, वे विराग मैं राग-वितान||१|| मम-स्वरूप है सिद्ध-समान, अमित-शक्ति-सुख-ज्ञान-निधान| किन्तु आश-वश खोया ज्ञान, बना भिखारी…

Continue Readingआत्म-कीर्तन – ATAM KIRTAN