bhagwan neminath

कैसी सुन्दर जिन प्रतिमा – Jain Bhajan

“कैसी सुंदर जिन प्रतिमा” एक अत्यंत श्रद्धा और आनंद से भरपूर Jain Bhajan है, जिसमें भगवान की दिव्य प्रतिमा की सुंदरता का भावपूर्ण वर्णन किया गया है। इस भजन में भक्त अपनी दृष्टि से प्रभु की प्रतिमा को निहारते हुए उनके तेज, शांति और आत्मिक आकर्षण की सराहना करता है।

“कैसी सुंदर जिन प्रतिमा” भजन विशेष रूप से मंदिरों में, पूजन आयोजनों में, और जिन प्रतिमा अभिषेक या प्रतिष्ठा महोत्सव के समय भक्तों द्वारा गाया जाता है। इसके मधुर बोल और भावनात्मक लय से वातावरण में भक्ति की तरंगें फैल जाती हैं।

Talking jinvani

तर्ज : चाँद सी महबूबा हो मेरे कब

कैसी सुन्दर जिन प्रतिमा है, कैसा सुंदर है जिन रूप ।
जिसे देखते सहज दीखता, सबसे सुंदर आत्मस्वरुप ॥

नग्न दिगम्बर नहीं आडम्बर, स्वाभाविक है शांत स्वरुप ।
नहीं आयुध नहीं वस्त्राभूषण, नहीं संग नारी दुःख रूप ॥१॥

बिन श्रृंगार सहज ही सोहे, त्रिभुवन माहि अतिशय रूप ।
कायोत्सर्ग दशा अविकारी, नासा दृष्टि आनंदरूप ॥२॥

अर्हत प्रभु की याद दिलाती, दर्शाती अपना प्रभु रूप ।
बिन बोले ही प्रगट कर रही, मुक्तिमार्ग अक्षय सुखरूप ॥३॥

जिसे देखते सहज नशावे, भव-भव के दुष्कर्म विरूप ।
भावों में निर्मलता आवे, मानो हुए स्वयं जिनरूप ॥४॥

महाभाग्य से दर्शन पाया, पाया भेद-विज्ञान अनूप ।
चरणों में हम शीश नवावें, परिणति होवे साम्यस्वरुप ॥५॥

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Note

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