रचयिता – श्रुत – शाला – श्रुतज्ञ श्रमण मुनि 108 श्री प्रणीत सागर जी महाराज
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
आरती उतारूँ थारी संख्या निहारूँ – 2
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
पांच ज्ञान अरू ग्यारह अंग
चौदह पूर्व की महिमा अनंग
द्वादशांग की ज्योति निराली
जिनवाणी लागे सबसे प्यारी
अरे कर लो तुम इसका गुणगान
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ 2
श्रुतालय में तुम हो विराजे
दिव्य ध्वनि रूप बजते हैं बाजे
छोड़ आते सब सारे काजे
मोक्ष जात जो हृदय में विराजे
श्रुत की तुम रखना सदा लाज
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूं 2 हे
दिव्य ध्वनि गणधर ने झेली
मुनियों के द्वारा यह विश्व में फैली
श्रुत – स्कंध की सेवा में पाऊं
जनम जनम का पुण्य कमाऊं
बुद्धि बढ़ा तो मेरी आज
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
चौदह प्रकीर्णक शोभा पावें
श्रुत की महिमा जग में गावें
दृष्टिवाद के पांच सुहावें
चूलिका के पांच मन को भावें
धारो इनको शीघ्र आज
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत स्कंध यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
स्त्रोत है जिसका अईन मुख निवासिनी
सबको मीठी लागे जैसे लगती है चाशनी
जुड़ जाओ ज्ञान से जुड़ जाओगे भगवान से
ज्ञान को जो जाने छुटे वो मान से
मान छोड़ ज्ञान को जान
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत स्कंध यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
जिन प्रणीत वचनों का ये सार है
जिन प्रणीत वचनों का आधार है
जो इसे अपनाए उसका जग में प्रचार है
ईषत है अंत जिसका साथ प्राग्ग्भार है
हे श्रुत स्कंध मत करना इससे टकरार
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत स्कंध यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
जो श्रुत – यंत्र की आरती उतारे
उसके होते हैं व्हारे नारे
पा जाता वो केवलज्ञान
आज थारी आरती उतारूँ
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ
आरती उतारूँ थारी संख्या निहारूँ – 2
हे श्रुत – स्कंध – यंत्रराज ! आज थारी आरती उतारूँ – 2
आज थारी आरती उतारूँ – 2



