Acharya Shri Vidhya Sagar Ji Maharaj

सामायिक पाठ – Samayak Path(काल-अनंत भ्रम्यो)

कविश्री बुध महाचंद्र
प्रथम : प्रतिक्रमण-कर्म

काल-अनंत भ्रम्यो जग में सहये दु:ख-भारी |
जन्म-मरण नित किये पाप को है अधिकारी ||
कोटि-भवांतर माँहिं मिलन-दुर्लभ सामायिक |
धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक ||१||

Talking jinvani

हे सर्वज्ञ जिनेश! किये जे पाप जु मैं अब |
ते सब मन-वच-काय-योग की गुप्ति बिना लभ ||
आप-समीप हजूर माँहिं मैं खड़ो-खड़ो सब |
दोष कहूँ सो सुनो करो नठ दु:ख देहिं जब ||२||

क्रोध-मान-मद-लोभ-मोह-मायावशि प्रानी |
दु:ख-सहित जे किये दया तिनकी नहिं आनी ||
बिना-प्रयोजन एकेंद्रिय वि-ति-चउ-पंचेंद्रिय |
आप-प्रसादहि मिटे दोष जो लग्यो मोहि जिय ||३||

आपस में इकठौर थापकरि जे दु:ख दीने |
पेलि दिये पगतले दाब करि प्रान हरीने ||
आप जगत् के जीव जिते तिन सबके नायक |
अरज करूँ मैं सुनो दोष-मेटो दु:खदायक ||४||

अंजन आदिक चोर महा-घनघोर पापमय |
तिनके जे अपराध भये ते क्षमा-क्षमा किय ||
मेरे जे अब दोष भये ते क्षमहु दयानिधि |
यह पडिकोणो कियो आदि षट्कर्म-माँहिं विधि ||१५||

द्वितीय : प्रत्याख्यान-कर्म

(इसके आदि या अंत में ‘आलोचना-पाठ’ बोलकर फिर तीसरे सामायिक भाव-कर्म का पाठ करना चाहिए।)

जो प्रमादवशि होय विराधे जीव घनेरे |
तिन को जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे ||
सो सब झूठो होउ जगत्-पति के परसादै |
जा प्रसाद तें मिले सर्व-सुख दु:ख न लाधे ||६||

मैं पापी निर्लज्ज दया-करि हीन महाशठ |
किये पाप अतिघोर पापमति होय चित्त-दुठ ||
निंदूँ हूँ मैं बार-बार निज-जिय को गरहूँ हूँ|
सबविधि धर्म-उपाय पाय फिर-फिर पापहि करूं हूँ ||७||

दुर्लभ है नर-जन्म तथा श्रावक-कुल भारी |
सत-संगति संयोग-धर्म जिन-श्रद्धाधारी ||
जिन-वचनामृत धार सभाव तें जिनवानी |
तो हू जीव संघारे धिक् धिक् धिक् हम जानी ||८||

Talking jinvani

इन्द्रिय-लंपट होय खोय निज-ज्ञान जमा सब |
अज्ञानी जिमि करै तिसि-विधि हिंसक ह्वे अब ||
गमनागमन करंता जीव विराधे भोले |
ते सब दोष किये निंदूँ अब मन-वच तोले ||९||

आलोचन-विधि थकी दोष लागे जु घनेरे |
ते सब दोष-विनाश होउ तुम तें जिन मेरे ||
बार-बार इस भाँति मोह-मद-दोष कुटिलता |
र्इर्षादिक तें भये निंदि ये जे भयभीता ||१०||

तृतीय : सामायिक-भाव-कर्म

अब जीवन में मेरे समता-भाव जग्यो है |
सब जिय मो-सम समता राखो भाव लग्यो है ||
आर्त्त-रौद्र द्वय-ध्यान छाँड़ि करिहूँ सामायिक |
संजम मो कब शुद्ध होय यह भाव-बधायक ||११||

Talking jinvani

पृथिवी-जल अरु अग्नि-वायु चउ-काय वनस्पति |
पंचहि थावर-माँहिं तथा त्रस-जीव बसें जित ||
बे-इंद्रिय तिय-चउ-पंचेद्रिय-माँहिं जीव सब |
तिन तें क्षमा कराऊँ मुझ पर क्षमा करो अब ||१२||

इस अवसर में मेरे सब सम कंचन अरु तृण |
महल-मसान समान शत्रु अरु मित्रहि सम-गण ||
जामन-मरण समान जानि हम समता कीनी |
सामायिक का काल जितै यह भाव नवीनी ||१३||

मेरो है इक आतम तामें ममत जु कीनो |
और सबै मम भिन्न जानि समता रस भीनो ||
मात-पिता सुत-बंधु मित्र-तिय आदि सबै यह |
मो तें न्यारे जानि जथारथ-रूप कर्यो गह ||१४||

मैं अनादि जग-जाल-माँहिं फँसि रूप न जाण्यो |
एकेंद्रिय दे आदि जंतु को प्राण-हराण्यो ||
ते सब जीव-समूह सुनो मेरी यह अरजी |
भव-भव को अपराध छिमा कीज्यो कर मरजी ||१५||

चतुर्थ : स्तवन-कर्म

नमौं ऋषभ जिनदेव अजित जिन जीति कर्म को |
सम्भव भव-दु:ख-हरण करण अभिनंद शर्म को ||
सुमति सुमति-दातार तार भव-सिंधु पारकर |
पद्मप्रभ पद्माभ भानि भवभीति प्रीतिधर ||१६||

श्रीसुपार्श्व कृत पाश-नाश भव जास शुद्ध कर |
श्री चंद्रप्रभ चंद्रकांति-सम देह-कांतिधर ||
पुष्पदंत दमि दोष-कोष भविपोष रोषहर |
शीतल शीतलकरण हरण भवताप-दोषहर ||१७||

श्रेयरूप जिन-श्रेय ध्येय नित सेय भव्यजन |
वासुपूज्य शतपूज्य वासवादिक भवभय-हन ||
विमल विमलमति-देन अन्तगत है अनंत-जिन |
धर्म शर्म-शिवकरण शांतिजिन शांति-विधायिन ||१८||

कुंथु कुंथुमुख-जीवपाल अरनाथ जालहर |
मल्लि मल्लसम मोहमल्ल-मारन प्रचारधर ||
मुनिसुव्रत व्रतकरण नमत सुर-संघहि नमि जिन |
नेमिनाथ जिन नेमि धर्मरथ माँहि ज्ञानधन ||१९||

पार्श्वनाथ जिन पारस-उपल-सम मोक्ष रमापति |
वर्द्धमान जिन नमूँ वमूँ भवदु:ख कर्मकृत ||
या-विधि मैं जिन संघरूप चउबीस-संख्यधर |
स्तवूँ नमूँ हूँ बारबार वंदूँ शिव-सुखकर ||२०||

Talking jinvani

पंचम : वंदना-कर्म

वंदूँ मैं जिनवीर धीर महावीर सु सन्मति |
वर्द्धमान अतिवीर वंदिहूँ मन-वच-तन-कृत ||
त्रिशला-तनुज महेश धीश विद्यापति वंदूँ |
वंदूँ नितप्रति कनकरूप-तनु पाप निकंदु ||२१||

सिद्धारथ-नृप-नंद द्वंद-दु:ख-दोष मिटावन |
दुरित-दवानल ज्वलित-ज्वाल जगजीव-उधारन ||
कुंडलपुर करि जन्म जगत्-जिय आनंदकारन |
वर्ष बहत्तर आयु पाय सब ही दु:खटारन ||२२||

सप्तहस्त-तनु तुंग भंग-कृत जन्म मरण-भय |
बालब्रह्ममय ज्ञेय-हेय-आदेय ज्ञानमय ||
दे उपदेश उधारि तारि भवसिंधु-जीव घन |
आप बसे शिवमाँहि ताहि वंदूं मन-वच-तन ||२३||

जाके वंदन-थकी दोष-दु:ख दूरहि जावे |
जाके वंदन-थकी मुक्ति-तिय सन्मुख आवे ||
जाके वंदन-थकी वंद्य होवें सुर-गन के |
ऐसे वीर जिनेश वंदिहूँ क्रम-युग तिनके ||२४||

सामायिक-षट्कर्म-माँहि वंदन यह पंचम |
वंदूं वीर जिनेंद्र इंद्र-शत-वंद्य वंद्य मम ||
जन्म-मरण-भय हरो करो अब शांति शांतिमय |
मैं अघ-कोष सुपोष-दोष को दोष विनाशय ||२५||

छठा : कायोत्सर्ग-कर्म

कायोत्सर्ग-विधान करूँ अंतिम-सुखदार्इ |
काय त्यजन-मय होय काय सबको दु:खदार्इ ||
पूरब-दक्षिण नमूँ दिशा पश्चिम-उत्तर में |
जिनगृह-वंदन करूँ हरूँ भव-पाप-तिमिर मैं ||२६||

शिरोनति मैं करूँ नमूँ मस्तक कर धरिके |
आवर्तादिक-क्रिया करूँ मन-वच-मद हरिके ||
तीनलोक जिन-भवन-माँहिं जिन हैं जु अकृत्रिम |
कृत्रिम हैं द्वय-अर्द्धद्वीप-माँहीं वंदूं जिन ||२७||

आठ कोड़ि परि छप्पन लाख जु सहस सत्याणूं |
च्यारि शतक-पर असी एक जिनमंदिर जाणूं ||
व्यंतर-ज्योतिष-माँहिं संख्य-रहिते जिनमंदिर |
ते सब वंदन करूँ हरहु मम पाप संघकर ||२८||

सामायिक-सम नाहिं और कोउ वैर-मिटायक |
सामायिक-सम नाहिं और कोउ मैत्रीदायक ||
श्रावक-अणुव्रत आदि अन्त सप्तम-गुणथानक |
यह आवश्यक किये होय निश्चय दु:ख-हानक ||२९||

जे भवि आतम-काज-करण उद्यम के धारी |
ते सब काज-विहाय करो सामायिक सारी ||
राग-रोष-मद-मोह-क्रोध-लोभादिक जे सब |
‘बुध महाचंद्र’ विलाय जाय ता तें कीज्यो अब ||३०||

*****

Note

Jinvani.in मे दिए गए सभी स्तोत्र, पुजाये, आरती आदि, Samayak Path(काल-अनंत भ्रम्यो) जिनवाणी संग्रह संस्करण 2022 के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Scroll to Top