पूजा एक धार्मिक आदर व्यक्त करने का एक धार्मिक आयोजन होता है जो भगवान, देवी-देवताओं, गुरु, या किसी पवित्र वस्तु की प्रतिमा, मूर्ति, के सामने किया जाता है
(दोहा) पंच भेद जाके प्रकट, ज्ञेय-प्रकाशन-भान | मोह-तपन-हर चंद्रमा, सोई सम्यक्ज्ञान || ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान! अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टविधसम्यग्ज्ञान ! अत्र मम सन्निहितो…
(दोहा) सिद्ध अष्ट -गुणमय प्रगट, मुक्त-जीव-सोपान । ज्ञान चरित जिंह बिन अफल, सम्यक्दर्श प्रधान ।। ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री अष्टांग सम्यग्दर्शन !अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री…
लावनी छन्द श्री योगी विष्णुकुमार बाल वैरागी, पाई वह पावन ऋद्धि विक्रिया जागी सुन मुनियों पर उपसर्ग स्वयं अकुलाये, हस्तिनापुर वे वात्सल्य-भरे हिय आये || कर दिया दूर सब कष्ट साधना-बल से, पा गये शान्ति सब साधु अग्नि के झुलसे…
जैन धर्म के अनुसार दीपावली विधि अनादि अनंत काल से भरतक्षेत्र में अनंत चौबीसी के तीर्थंकर अनंत- अनंत काल से होते आए हैं, इसी क्रम में इस युग में भी ऋषभनाथ से लेकर महावीर पर्यन्त चौबीस तीर्थंकर हुए। तेइसवें तीर्थंकर…
ॐ ह्रीं अवधिज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं मनः पर्ययज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं केवलज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं बीजबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा । ॐ ह्रीं कोष्ठज्ञानबुद्धिऋद्धये नमः अर्घ्यं नि. स्वाहा…
पं. जवाहरदास दोहा 'श्रीजिन बीस जिनेश के, बीसों शिखर महान । और असंख्य मुनीश जहँ, पहुँचे शिवपद थान ॥ ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं सम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं…
जैन धर्म में तीर्थयात्रा का विशेष महत्व है, और शिखर जी तीर्थ उन पवित्र स्थलों में सर्वोच्च स्थान रखता है जहाँ अनगिनत साधक आत्मकल्याण की राह पर अग्रसर हुए हैं। यह पर्वत स्थान केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि…
दोहा बंदौं नेमि जिनेश पद, नेमि-धर्म-दातार । नेम धुरंधर परम गुरु, भविजन सुख कर्तार ||१|| जिनवाणीको प्रणम कर, गुरु गणधर उर धार । सिद्धक्षेत्र पूजा रचौं, सब जीवन हितकार ॥२॥ उर्जयंतगिरि नाम तस, कह्यो जगत विख्यात । गिरिनारी तासें कहत,…
रोला छन्द श्री कैलाश पहाड़ जगत परधान कहा। आदिनाथ भगवान जहां शिववास लहा है। नागकुमार महाबाल व्याल आदि मुनिराई। गये तिहिं गिरिसों मोक्ष थाप पूजों शिर नाई|| दोहा - श्री कैलाश पहाड़ सों आदिनाथ जिनदेव। मुनी आदि जे शिव गये,…
सरस्वती की पूजा करने, श्री जिनमन्दिर जायेंगे। भव्य भारती की पूजा में, जीवन सफल बनायेंगे| श्रुत के आराधन से मन में, ज्ञान की ज्योति जलायेंगे। पर्यायों को कर विनष्ट हम, निजस्वरूप को पायेंगे॥ अतः करें आह्वान मात का, दृढ़ता हमको…
कविवर ज्ञानतराय गीता छंद तीर्थंकरों के न्हवन जलतें भये तीरथ शर्मदा, तातें प्रदच्छन देत सुर गन पंच मेरुन की सदा | दो जलधि ढाई द्वीप में सब गनत-मूल विराजहीं, पूजौं असी जिनधाम प्रतिमा होहि सुख दुख भाजहीं || ॐ ह्रीं…
कविश्री द्यानतराय (दोहा) चहुँगति-फनि-विष-हरन-मणि, दु:ख-पावक जल-धार | शिव-सुख-सुधा-सरोवरी, सम्यक्-त्रयी निहार || ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री सम्यक् रत्नत्रय धर्म!…