भावनाएं एक धार्मिक गीत होता है जो भक्ति और आदर के साथ भगवान, देवी-देवताओं, गुरु की स्तुति के लिए गाया जाता है। भावनाएं धार्मिक साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे शिर पर हो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे दर पर हो॥ जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत-संयम चाहू ॥ गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरणसमाधि, तेरे…
"समाधि भक्ति" इसी गहन आध्यात्मिक अवस्था का वर्णन करती है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच की दूरी मिट जाती है। यह मात्र पूजा-पाठ या स्तुति से कहीं बढ़कर है; यह दिव्य प्रेम में पूर्ण तल्लीनता की स्थिति है। संस्कृत…
https://youtu.be/bahVjbFkVo4 बंदौं श्री अरहंत परम गुरु, जो सबको सुखदाई |इस जग में दुःख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई ||अब मैं अरज करूं प्रभु तुमसे, कर समाधि उर मांहीं|अंत समय में यह वर मांगूं, सो दीजै जगराई ||1|| भव-भव…
समाधि भावना (Samadhi Bhavna) जैन दर्शन का वह सर्वोच्च आध्यात्मिक चिंतन है जो मनुष्य को न केवल 'जीने की कला', बल्कि 'मरने की कला' (Art of Dying) भी सिखाता है। इसे अक्सर जीवन के अंतिम समय में या सल्लेखना (Santhara)…
जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया, बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥1॥ विषयों…
कविश्री मनोहरलाल वर्णी ‘सहजानंद’ हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम, ज्ञाता-दृष्टा आतम-राम| मैं वह हूँ जो हैं भगवान्, जो मैं हूँ वह हैं भगवान्| अन्तर यही ऊपरी जान, वे विराग मैं राग-वितान||१|| मम-स्वरूप है सिद्ध-समान, अमित-शक्ति-सुख-ज्ञान-निधान| किन्तु आश-वश खोया ज्ञान, बना भिखारी…
भाषाकार : कविश्री भूधरदास (दोहा) बीज राख फल भोगवे, ज्यों किसान जग-माँहिं| त्यों चक्री-नृप सुख करे, धर्म विसारे नाहिं ||१|| (जोगीरासा व नरेन्द्र छन्द) इहविधि राज करे नरनायक, भोगे पुण्य-विशालो| सुख-सागर में रमत निरंतर, जात न जान्यो कालो|| एक दिवस…
कविश्री रामचरित उपाध्याय नित देव! मेरी आत्मा, धारण करे इस नेम को, मैत्री रहे सब प्राणियों से, गुणी-जनों से प्रेम हो| उन पर दया करती रहे, जो दु:ख-ग्राह-ग्रहीत हैं, सम-भाव उन सबसे रहे, जो वृत्ति में विपरीत हैं ||१|| करके…
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनों में हर्ष प्रभो। करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ १॥ यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो। ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ २॥…
कविश्री बुध महाचंद्र प्रथम : प्रतिक्रमण-कर्म काल-अनंत भ्रम्यो जग में सहये दु:ख-भारी | जन्म-मरण नित किये पाप को है अधिकारी || कोटि-भवांतर माँहिं मिलन-दुर्लभ सामायिक | धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक ||१|| हे सर्वज्ञ जिनेश! किये जे पाप…
https://youtu.be/GFCSV2ayOxg भावना द्वात्रिंशतिका आचार्य अमितगति मेरा आतम सब जीवों पर मैत्री भाव करेगुणगणमंडित भव्य जनों पर प्रमुदित भाव धरे |दीन दुखी जीवों पर स्वामी! करुणाभाव करेऔर विरोधी के ऊपर नित समताभाव धरे ||1|| तुम प्रसाद से हो मुझमे वह शक्ति…
भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। सत्य संयम शील का, व्यवहार हर घर द्वार हो। भावना दिन-रात मेरी, सब सुखी संसार हो। धर्म का प्रचार हो, और देश का उद्धार हो। और ये उजड़ा हुआ, भारत चमन गुलजार हो।…