“जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उमड़ सकता है…” एक गहरा और आत्म-जागृति से भरा जैन भजन है, जो जीवन की अनिश्चितता और आत्मकल्याण की तात्कालिक आवश्यकता का स्मरण कराता है। इस भजन को विशेष रूप से वैराग्य दिवस, आत्मचिंतन सत्र, या किसी धार्मिक प्रवचन के आरंभ में भावपूर्ण स्वर से प्रस्तुत किया जाता है।
Jain Bhajan हमें सिखाता है कि वैराग्य केवल वृद्धावस्था या किसी बड़े आघात से ही नहीं आता, बल्कि यह भीतर से जागने वाली एक दिव्य प्रेरणा है, जो किसी भी उम्र, स्थिति या परिस्थिति में प्रकट हो सकती है। और जब यह होता है, तब जीव अपने जीवन की दिशा बदल देता है — भीतर शांति, संयम और समता का प्रकाश फैल जाता है।
Bhajan Lyrics
तर्ज – ऐ मेरे वतन के लोगो
जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उमड सकता है
संसार में रहकर प्राणी, संसार को तज सकता है ॥
कहीं दर्पण देख विरक्ति, कहीं मृतक देख वैरागी,
बिन कारण दीक्षा लेता, वो पूर्व जन्म का त्यागी,
निर्ग्रन्थ साधु ही इतने, सदगुण से सज सकता है ॥१॥
आत्मा तो अजर अमर है, हम आयु गिनें इस तन की,
वैसा ही जीवन बनता, जैसी धारा चिंतन की,
जो पर को समझ पाया है, वह खुद को समझ सकता है ॥२॥
शास्त्रों में सुने थे जैसे, देखे वैसे ही मुनिवर,
तेजस्वी परम तपस्वी, उपकारी मेरे गुरुवर ,
इनकी मृदु वाणी सुनकर, हर प्राणी सुधर सकता है ॥३॥

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Note
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