देव शास्त्र गुरु पूजा – 1 || Dev Shastra Guru Puja

Acharya Shri Vidhya Sagar Ji Maharaj

जिनगीतिका

शुचि ध्यान से  त्रेसठ  प्रकृति  हन,  वीतरागी हो गये,
दृग ज्ञान सुख वीरज चतुष्टय, गुण अनंत  निजी  लिये।
तीर्थेश बन उपदेश दे, अनगिन भविक निज सम किये,
जिनदेव  श्रुत  गुरु  बोध  डालो, आज  मेरे  भी  हिये ॥
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरु समूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् !

सदृष्टि बिन जन्मान्ध जैसा, जन्म वन भ्रमता फिरा,
शिवराह  बिन  गुमराह होता, दुःख  सहता मैं निरा
वसु अंग युत सम्यक्त्व पाने, भक्ति जल मन में भरूँ,
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरू ॥
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

श्रुत की किरण बिन अज्ञ प्राणी, तत्त्वबोध न कर सका,
निज आतमा के ज्ञान बिन तब, भव विफल था मनुष का ।
वसु  अंग  युत  श्रुत  ज्ञान  पाने  शास्त्र गंध  हृदय धरूँ
जिन  शास्त्र गुरु  त्रय रत्न नौका,  प्राप्त कर भव से तिरूँ
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

नरकादि दुर्गति बीच मुझको, बूँद नहिं सुख की मिली,
फिर  देव गति में  त्याग के बिन, राग  से दुर्गति फली
मुनि  मूलगुण सह गुप्ति  पाने, सुगुण का  अक्षत करूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूं ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

मैं स्पर्श इन्द्रिय के विषय वश, एक इन्द्रिय तन धरा,
जहँ पंच  थावर देह धरके, कष्ट पाकर  फिर मरा ।
द्वादश  तपों को प्राप्त करने, सुमन  शीलों को धरूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूँ |
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

मैं रसन इन्द्रिय के विषय वश, नित अभक्ष्यों को भखा,
फल से नरक में अन्न जल बिन, भूख से विलखा थका
बल  वीर्य पाने  अब इकाशन, अनशनों  का चरु धरूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूं ॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

अज्ञान का तामस हटाने, देव गुरु उर उदित हों,
अरिहंत श्रुत गुरु भक्ति करके भक्त मन मृदु मुदित हों ।
दस  धर्म लक्षण ज्ञान करने,  दीप आगम  का करूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूँ |
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

घ्राणाक्ष  वश  इत्रादि  सूँघे,  दया  सौरभ  के बिना,
भ्रमरादि सम आसक्त होकर, दुख उठाता था घना।
अब  भावना  द्वादश  विचारूँ, धूप  कर्मों  को  करूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूं ॥
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

भोगी मरा हर बार लेकिन, भोग इच्छा ना मरी,
इस हेतु मुनि ने भोग तजकर, राह शिवपुर की धरी
द्वाविंश परिषह कष्ट सहकर, नर जनम सफली करूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूं ॥
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः महामोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

भव भोग सुख पाने अभी तक आपका पूजन किया,
पर आज शत वसु सुगुण पाने, अर्घ हाथों में लिया।
अनमोल जिनगुरु श्रुत पदों में, अर्ध मृदुता से धरूँ
जिन शास्त्र गुरु त्रय रत्न नौका, प्राप्त कर भव से तिरूं ॥
ओं ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः अनर्धपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।

जयमाला (यशोगान)

देव दृष्टि आधार हैं, शास्त्र बोध आगार ।
गुरु समुद्र पतवार हैं, जग जन तारणहार ॥

ज्ञानोदय

वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, सच्चे देव हमारे हैं,
चउतिस अतिशय प्रातिहार्य वसु, नंत चतुष्टयधारे
अष्टादश दोषों को जीता, लोकालोक सभी जाना,
तीर्थंकर के छ्यालिस गुण से अनंतगुण किसविध गाना ॥1॥

गति गत्यानुपूर्व पशु नारक चतुरिन्द्रिय तक जाति रही
सूक्ष्मोद्योत स्थावर आतप, साधारण विधि नाम कहीं।
मनुज आयु बिन तीन आयु युत, घाति कर्म सैंतालिस जो
इन त्रेसठ विधि रहित आप्त को, हे भव्यात्मन्! नित्य भजो ॥2॥

हे जिनवर ! तव वाणी सुनते भविजन निज निज भाषा में,
अष्टादश विध महान भाषा, सप्तशतक लघु भाषा में।
चतुर्ज्ञान धर गणधर झेलें, फिर श्रुत की करते रचना,
प्रविष्टांग द्वादश भेदों में बाह्य अंग चौदह गणना ॥3॥

भव तन भोग विरक्त मुनीश्वर, सूरि श्रुती मुनि की जय हो
आठ बीस गुण मूल सम्हारें विशेष गुणधारी द्वय हो ।
मूल सहित आचार्य देव गुण-, आचारादिक आठ धरे,
आचारांग प्रथम को धारें या वसु प्रवचन मातृ वरें ॥4॥

या दश संस्थिती-कल्प वार तप छह आवश्यक गुण धारें,
आचारादिक अष्ट सुगुण युत गुण छत्तीस गणी धारें।
या द्वादश तप धर्म धरें दश पालन पंचाचार करें,
षट् आवश्यक गुप्ति तीन युत, छत्तिस गुण आचार धरे ॥5॥

दीक्षा शिक्षा प्रदान करते प्रायश्चित्त सुविधि ज्ञाता,
लाभ हानि गुण दोष दिखाते समाधि सधवाते त्राता ।
दोष न कहते कभी शिष्य के दोष निकलवाते स्वामी,
ये छह गुण आचार व श्रुतगुण, धरें आठगुण गुरु नामी ॥6॥

मूल गुणान्वित उपाध्याय गुरु गुण छब्बीस विशेष धरें,
अंग प्रविष्ट भेद श्रुत द्वादश अंग बाह्य चौदह उचरें।
अथवा चौदह पूर्व सहित गुरु द्वादश अंगों को जानें,
आचारांग प्रथम को जानें या समयोचित श्रुत जानें ॥7॥

हे आचार्य सुपाठक मुनिवर ! तुम्हीं स्वर्ग शिव सुख दाता,
धीर वीर गंभीर यशस्वी क्षमा आदि गुण के धाता ।
बोधि समाधि प्रदाता मेरे भव दुख दूर करो स्वामी,
परमानन्द प्राप्त करने को मृदुमति कर दो जगनामी ॥8॥
ओं ही देवशास्त्रगुरुभ्यो नमः पूर्णार्थं निर्वपामीति स्वाहा।

आप्त लक्ष्य हैं भव्य के, आगम दीपक रूप ।
गुरु नेता हैं मार्ग के बनते भवि शिव भूप ॥
॥ इति शुभं भूयात् ॥

*****

Note

Jinvani.in मे दिए गए सभी देव शास्त्र गुरु पूजा – 1 स्तोत्र, पुजाये और आरती जिनवाणी संग्रह के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.