VAIRAGYA BHAVNA – जैन वैराग्य भावना : श्री वज्रनाभि चक्रवर्ती

VAIRAGYA BHAVNA

Talking jinvani

भाषाकार : कविश्री भूधरदास

(दोहा)

बीज राख फल भोगवे, ज्यों किसान जग-माँहिं|
त्यों चक्री-नृप सुख करे, धर्म विसारे नाहिं ||१||

(जोगीरासा व नरेन्द्र छन्द)

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

इहविधि राज करे नरनायक, भोगे पुण्य-विशालो|
सुख-सागर में रमत निरंतर, जात न जान्यो कालो||
एक दिवस शुभ कर्म-संजोगे, क्षेमंकर मुनि वंदे|
देखि श्रीगुरु के पदपंकज, लोचन-अलि आनंदे ||२||

Talking jinvani

तीन-प्रदक्षिण दे सिर नायो, कर पूजा थुति कीनी|
साधु-समीप विनय कर बैठ्यो, चरनन-दृष्टि दीनी||
गुरु उपदेश्यो धर्म-शिरोमणि, सुनि राजा वैरागे|
राज-रमा वनितादिक जे रस, ते रस बेरस लागे ||३||

मुनि-सूरज-कथनी-किरणावलि, लगत भरम-बुधि भागी|
भव-तन-भोग-स्वरूप विचार्यो, परम-धरम-अनुरागी||
इह संसार-महावन भीतर, भरमत ओर न आवे|
जामन-मरन-जरा दव-दाहे, जीव महादु:ख पावे||४||

कबहूँ जाय नरक-थिति भुंजे, छेदन-भेदन भारी|
कबहूँ पशु-परयाय धरे तहँ, वध-बंधन भयकारी||
सुरगति में पर-संपति देखे, राग-उदय दु:ख होई|
मानुष-योनि अनेक-विपतिमय, सर्वसुखी नहिं कोई||५||

कोई इष्ट-वियोगी विलखे, कोई अनिष्ट-संयोगी|
कोई दीन-दरिद्री विलखे, कोई तन के रोगी||
किस ही घर कलिहारी नारी, कै बैरी-सम भाई|
किस ही के दु:ख बाहर दीखें, किस ही उर दुचिताई||६||

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

कोई पुत्र बिना नित झूरे, होय मरे तब रोवे|
खोटी-संतति सों दु:ख उपजे, क्यों प्रानी सुख सोवे||
पुण्य-उदय जिनके तिनके भी, नाहिं सदा सुख-साता|
यह जगवास जथारथ देखे, सब दीखे दु:खदाता||७||

जो संसार-विषे सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागे|
काहे को शिवसाधन करते, संजम-सों अनुरागे||
देह अपावन-अथिर-घिनावन, या में सार न कोई|
सागर के जल सों शुचि कीजे, तो भी शुद्ध न होई||८||

Talking jinvani

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

सात-कुधातु भरी मल-मूरत, चर्म लपेटी सोहे|
अंतर देखत या-सम जग में, अवर अपावन को है||
नव-मलद्वार स्रवें निशि-वासर, नाम लिये घिन आवे|
व्याधि-उपाधि अनेक जहाँ तहँ, कौन सुधी सुख पावे||९||

पोषत तो दु:ख दोष करे अति, सोषत सुख उपजावे|
दुर्जन-देह स्वभाव बराबर, मूरख प्रीति बढ़ावे||
राचन-योग्य स्वरूप न याको, विरचन-जोग सही है|
यह तन पाय महातप कीजे, या में सार यही है||१०||

भोग बुरे भवरोग बढ़ावें, बैरी हैं जग-जी के|
बेरस होंय विपाक-समय अति, सेवत लागें नीके||
वज्र अगिनि विष से विषधर से, ये अधिके दु:खदाई|
धर्म-रतन के चोर चपल अति, दुर्गति-पंथ सहाई||११||

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

मोह-उदय यह जीव अज्ञानी, भोग भले कर जाने|
ज्यों कोई जन खाय धतूरा, सो सब कंचन माने||
ज्यों-ज्यों भोग-संजोग मनोहर, मन-वाँछित जन पावे|
तृष्णा-नागिन त्यों-त्यों डंके, लहर-जहर की आवे||१२||

Talking jinvani

मैं चक्री-पद पाय निरंतर, भोगे भोग-घनेरे|
तो भी तनक भये नहिं पूरन, भोग-मनोरथ मेरे||
राज-समाज महा-अघ-कारण, बैर-बढ़ावन-हारा|
वेश्या-सम लछमी अतिचंचल, याका कौन पत्यारा||१३||

मोह-महारिपु बैरी विचारो, जग-जिय संकट डारे|
घर-कारागृह वनिता-बेड़ी, परिजन-जन रखवारे||
सम्यक्-दर्शन-ज्ञान-चरण-तप, ये जिय के हितकारी|
ये ही सार असार और सब, यह चक्री चितधारी||१४||

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

छोड़े चौदह-रत्न नवों निधि, अरु छोड़े संग-साथी|
कोटि-अठारह घोड़े छोड़े, चौरासी-लख हाथी||
इत्यादिक संपति बहुतेरी, जीरण-तृण-सम त्यागी|
नीति-विचार नियोगी-सुत को, राज दियो बड़भागी||१५||

होय नि:शल्य अनेक नृपति-संग, भूषण-वसन उतारे|
श्रीगुरु-चरण धरी जिन-मुद्रा, पंच-महाव्रत धारे||
धनि यह समझ सुबुद्धि जगोत्तम, धनि यह धीरज-धारी|
ऐसी संपति छोड़ बसे वन, तिन-पद धोक हमारी||१६||

(दोहा)

परिग्रह-पोट उतार सब, लीनों चारित-पंथ|
निज-स्वभाव में थिर भये, वज्रनाभि निरग्रंथ||

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

*****

Note

Jinvani.in मे दिए गए सभी स्तोत्र, पुजाये, आरती आदि, VAIRAGYA BHAVNA जिनवाणी संग्रह संस्करण 2022 के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.