समाधि भावना (Samadhi Bhavna) जैन दर्शन का वह सर्वोच्च आध्यात्मिक चिंतन है जो मनुष्य को न केवल ‘जीने की कला’, बल्कि ‘मरने की कला’ (Art of Dying) भी सिखाता है। इसे अक्सर जीवन के अंतिम समय में या सल्लेखना (Santhara) के दौरान सुनाया जाता है, ताकि आत्मा पूर्ण शांति, होश और समता भाव के साथ देह का त्याग कर सके।
कविश्री शिवराज
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||
शत्रु अगर कोई हो, संतुष्ट उनको कर दूँ |
समता का भाव धरकर, सबसे क्षमा कराऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||1||
त्यागूँ आहार-पानी, औषध-विचार अवसर|
टूटें नियम न कोई, दृढ़ता हृदय में लाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ ||2||
जागें नहीं कषायें, नहिं वेदना सतावें|
तुमसे ही लौ लगी हो, दुर्यान को भगाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||3||
आतम-स्वरूप अथवा, आराधना विचारन|
अरहंत सिद्ध साधु, रटना यही लगाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||4||
धरमात्मा निकट हों, चरचा धरम सुनावें|
वह सावधान रक्खें, गाफिल न होने पाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||5||
जीने की हो न वाँछा, मरने की हो न इच्छा|
परिवार-मित्रजन से, मैं राग को हटाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||6||
भोगे जो भोग पहिले, उनका न होवे सुमिरन|
मैं राज्य-संपदा या, पद-इन्द्र का न चाहूँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||7||
रत्न-त्रयों का पालन, हो अन्त में समाधी|
शिवराज प्रार्थना है, जीवन सफल बनाऊँ||
दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ|
देहान्त के समय में, तुमको न भूल जाऊँ||8||
इस भावना की प्रसिद्ध पंक्तियाँ “दिन-रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ” साधक के अंतर्मन को झकझोरती हैं। इसका मूल उद्देश्य ‘भेद विज्ञान’ (शरीर और आत्मा को अलग समझना) है। गहन आध्यात्मिक शोध बताते हैं कि समाधि भावना का नियमित चिंतन मृत्यु के भय को समाप्त कर देता है और साधक को मोह, राग व द्वेष से मुक्त करता है।
यह भावना सिखाती है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक पुराने, जीर्ण वस्त्र को त्यागकर नई यात्रा का मंगलमय आरंभ है। जिसे जैन धर्म में ‘मृत्यु महोत्सव’ कहा गया है। जो जीव अंत समय में समाधि मरण करता है, वह निश्चित रूप से सद्गति (उच्च आध्यात्मिक अवस्था) को प्राप्त करता है।
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Note
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