Siddhapuja hirachand

बीस तीर्थंकर

जल फल आठों दर्व अरघ कर प्रीति धरी है,
गणधर इन्द्रनिहू-तैं श्रुति पूरी न करी है।
धानत सेवक जानके (हो) जगतें लेहु निकार,
सीमन्धर जिन आदि दे बीस विदेह मँझार।
(श्री जिनराज हो भव तारण तरण जहाज॥)
ॐ ह्रीं श्रीसीमन्धरादिविद्यमानविंशतितीर्थङ्करेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति०।

कृत्रिमाकृत्रिम जिनबिम्ब

कृत्याकृत्रिमचारुचैत्यनिलयान् नित्यं त्रिलोकीगतान्,
वन्दे भावन-व्यन्तरान् द्युतिवरान् कल्पामरावासगान्।।
सद्-गन्धाक्षत-पुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फलैर्
नीराद्यैश्च यजे प्रणम्य शिरसा दुष्कर्मणां शान्तये॥
(सात करोड़ बहत्तर लाख, सु-भवन जिन पाताल में।
मध्यलोक में चारसौ अट्ठावन, जजों अघमल टाल के॥
अब लखचौरासी सहस सत्याणव, अधिक तेईस रु कहे।
बिन संख ज्योतिष व्यन्तरालय, सब जजों मन वच ठहे II)
ॐ ह्रीं कृत्रिमाकृत्रिमजिनबिम्बेभ्योऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

सिद्ध भगवान
गन्धाढ्यं सुपयोमधुव्रत- गणैः सङ्गं वरं चन्दनं,
पुष्पौघं विमलं सदक्षत चयं रम्यं चरुं दीपकम्।
धूपं गन्धयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठं फलं लब्धये,
सिद्धानां युगपत्क्रमाय विमलं, सेनोत्तरं वाञ्छितम् ॥
ॐ ह्रीं सिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

समुच्चय चौबीसी भगवान
जल फल आठों शुचिसार ताको अर्घ करों,
तुमको अरपों भवतार, भवतरि मोक्ष वरों ।
चौबीसों श्रीजिनचंद, आनन्दकंद सही,
पद जजत हरत भव फंद, पावत मोक्ष मही ॥
ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवीरान्तचतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्व. ।

तीस चौबीसी
द्रव्य आठों, जु लीना है, अर्घ कर में नवीना है,
पूजताँ पाप छीना है, ‘भानुमल’ जोड़ कीना है।
दीप अढ़ाई सरस राजैं, क्षेत्र दस ताँ विषै छाजैं,
सातशत बीस जिनराजैं, पूजताँ पाप सब भाजै ।।
ॐ ह्रीं पञ्चभरतपञ्चैरावतयोः भूतभविष्यद्वर्तमानसम्बन्धिविंशत्यधिकसप्तशत-जिनेन्द्रेभ्योऽर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री आदिनाथ भगवान
शुचि निर्मल नीरं गंध सुअक्षत, पुष्प चरु मन हरषाय,
दीप धूप फल अर्घ सुलेकर, नाचत ताल मृदंग बजाय ।
श्री आदिनाथ के चरण कमल पर बलि बलि जाऊँ मन-वच काय,
हे करुणानिधि भव दुःख मेटो, यातैं मैं पूजों प्रभु पाय ।।
ॐ ह्रीं श्री आदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री चन्द्रप्रभ भगवान
सजि आठों दरब पुनीत, आठों अंग नमों।
पूजों अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमों।।
श्री चन्द्रनाथ दुति चन्द, चरनन चंद लगै।
मन-वच-तन जजत अमंद, आतमजोति जगै ।।
ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री वासुपूज्य भगवान
जल फल दरब मिलाय गाय गुन, आठों अंग नमाई,
शिवपदराज हेत हे श्रीपति ! निकट धरों यह लाई ।
वासुपूज्य वसुपूज-तनुज पद, वासव सेवत आई,
बालब्रह्मचारी लखि जिन को, शिवतिय सनमुख धाई ॥
ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री शान्तिनाथ भगवान
वसु द्रव्य सँवारी, तुम ढिग धारी, आनन्दकारी दृग प्यारी ।
तुम हो भवतारी, करुणाधारी, यातै थारी शरनारी ॥
श्री शान्ति-जिनेशं, नुतशक्रेशं, वृषचक्रेशं, चक्रेशं ।
हनि अरि-चक्रेशं हे गुनधेशं दयामृतेशं मक्रेशं ॥
ॐ ह्रीं श्रीशान्तिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्रीपार्श्वनाथ भगवान
नीर गन्ध अक्षतान् पुष्प चारु लीजिये।
दीप धूप – श्रीफलादि अर्घ तें जजीजिये॥
पार्श्वनाथ देव सेव आपकी करूँ सदा।
दीजिये निवास मोक्ष, भूलिये नहीं कदा॥
ॐ ह्रीं श्रीपार्श्वनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा

श्री महावीर भगवान
जल फल वसु सजि हिम थार, तन-मन मोद धरों।
गुण गाऊँ भवदधि-तार, पूजत पाप हरों ॥
श्री वीर महा अतिवीर सन्मति नायक हो।
जय वर्द्धमान गुणधीर सन्मतिदायक हो।
ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री बाहुबली स्वामी
हूँ शुद्ध निराकुल सिद्धों सम, भवलोक हमारा वासा ना।
रिपु राग रु द्वेष लगे पीछे, यातें शिवपद को पाया ना ।।
निज के गुण निज में पाने को, प्रभु अर्ध संजोकर लाया हूँ।
हे बाहुबली तुम चरणों में, सुख सन्मति पाने आया हूँ।।
ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलिपरमयोगीन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा

पंच- बालयति
सजि वसुविधि द्रव्य मनोज्ञ अरघ बनावत हैं।
वसुकर्म अनादि संयोग, ताहि नशावत हैं ।।
श्री वासुपूज्य मल्लि नेम, पारस वीर अती ।
नमूँ मन-वचन्तन धरि प्रेम, पाँचों बालयति।।
ॐ ह्रीं श्रीपञ्चबालयतितीर्थङ्करेभ्यो अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

नन्दीश्वरद्वीप
यह अरघ कियो निजहेत, तुमको अरपतु हों।
‘द्यानत’ कीज्यो शिवखेत, भूमि समरपतु हों।
नन्दीश्वर श्रीजिनधाम, बावन पूज करों।
वसुदिन प्रतिमा अभिराम, आनन्द भाव धरों ॥
(नन्दीश्वरद्वीप महान चारों दिशि सोहें।
बावन जिन मन्दिर जान सुर-नर-मन मोहें।। )
ॐ ह्रीं श्रीनन्दीश्वरद्वीपे पूर्वपश्चिमोत्तर-दक्षिणदिक्षु द्विपञ्चाशज्जिनालयस्थ- जिनप्रतिमाभ्यो अनर्धपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

सोलहकारण
जल फल आठों दरब चढ़ाय, ‘द्यानत’ वरत करों मन लाय।
परमगुरु हो, जय-जय नाथ परम गुरु हो ।।
दरशविशुद्धि भावना भाय, सोलह तीर्थंकर पददाय ।
परमगुरु हो, जय-जय नाथ परमगुरु हो ||
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादिषोडशकारणेभ्योऽनर्घपदप्राप्तयेऽर्थं निर्वपामीति स्वाहा ।

पञ्चमेरु
आठ दरबमय अरघ बनाय, ‘द्यानत’ पूजौं श्रीजिनराय ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ।।
पाँचों मेरु असी जिनधाम, सब प्रतिमा को करो प्रणाम ।
महासुख होय, देखे नाथ परम सुख होय ॥
ॐ ह्रीं पञ्चमेरूसम्बन्धि-अशीतिजिनचैत्यालयस्थजिनबिम्बेभ्योऽनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति

रत्नत्रय
आठ दरब निरधार, उत्तम सो उत्तम लिये |
जनम रोग निरवार सम्यक् रत्नत्रय भजूँ।
ॐ ह्री सम्यग्रत्नत्रयाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

दशलक्षण
आठों दरब संवार, ‘द्यानत’ अधिक उछाह सों।
भव- आताप निवार, दस- लच्छन पूजों सदा ।।
ॐ ह्रीं उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्मांगाय अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

सप्तर्षि
जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना ।
फल ललित आठों द्रव्य मिश्रित, अर्घ कीजे पावना |
मन्वादि चारणऋद्धि धारक, मुनिन की पूजा करूँ।
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ।।
ॐ ह्रः श्रीमन्वादिसप्तर्षिभ्योऽनर्धपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।

निर्वाणक्षेत्र
जल गंध अक्षत फूल चरु फल, दीप धूपायन धरौं ।
‘द्यानत’ करो निरभय जगत सों, जोर कर विनती करौं ।
सम्मेदगढ़ गिरनार चंपा पावापुर कैलाश कों।
पूजों सदा चौबीस जिन, निर्वाण भूमि निवास कों।।
ॐ ह्रीं चतुर्विंशतितीर्थङ्करनिर्वाणक्षेत्रेभ्योऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा

सरस्वती
जल चन्दन अक्षत फूल चरू, चत दीप धूप अति फल लावै
पूजा को ठानत जो तुम जानत, सो नर ‘द्यानत’ सुख पावै ।
तीर्थंकर की ध्वनि गणधर ने सुनी अंग रचे चुनि ज्ञानमई ।
सो जिनवर वानी शिवसुखदानी, त्रिभुवनमानी पूज्य भई ।
ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेव्यै अनर्घपदप्राप्तयेऽर्घं निर्वपामीति स्वाहा

सम्मेदशिखर सिद्धक्षेत्र
नीर चन्दन अखंड अक्षत पुष्प चरु अति सार ही ।
वर धूप निरमल फल विविध, बहु अर्घ सन्त उतार ही ।।
सो मेट दुर्गति होय सुरगति, सुख लहै शुद्ध भाव सों।
सम्मेदगढ़ पर बीस जिनवर, पूजि भवि उच्छाह सों ।।
ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्राय नमः अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

आचार्य श्री ज्ञानसागर जी

अष्ट द्रव्य के अर्घ्य बनाय, आत्मशांति हित चरण चढ़ाय ।
परम सुख होय, गुरु पद पूज परम सुख होय ।।
जय जय गुरुवर ज्ञान महान, ज्ञान रतन का करते दान ।
परम सुख होय, गुरु पद पूज परम सुख होय ।।
ॐ ह्रीं आचार्यश्रीज्ञानसागरमुनीन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी

श्री विद्यासागर के चरणों में झुका रहा अपना माथा
जिनके जीवन की हर चर्या बन पड़ी स्वयं ही नवगाथा ।।
जैनागम का वह सुधा कलश जो बिखराते हैं गली गली ।
जिनके दर्शन को पाकर के खिलती मुरझाई हृदय कली ।।
भावों की निर्मल सरिता में, अवगाहन करने आया हूँ।
मेरा सारा दुख दर्द हरो, यह अर्घ भेंटने लाया हूँ ।।
हे तपो मूर्ति ! हे आराधक हे योगीश्वर ! हे महासन्त ।
यह’ अरुण’ कामना देख सके, युग-युग तक आगामी बसन्त ।।
ॐ ह्रीं श्री १०८ आचार्यविद्यासागरमुनीन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्व. स्वाहा ।

निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी

हे सुधासागर दयालु मुझको जीवन दान दो।
सर उठाकर चल सकूँ, ऐसा मुझे अभिमान दो।।
आ सकूँ तेरे निकट, ऐसा सरल सोपान दो।
शीघ्र तर जाऊँ भवोदधि, यह मुझे वरदान दो।।
नाम ही जपता रहूँ, जीवन तराने के लिये।
भेंट में कुछ भी नहीं लाया चढ़ाने के लिये ।।
ॐ ह्रः निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्रीसुधासागरमुनीन्द्राय नमः अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

महार्घ
मैं  देव  श्री  अरहंत पूजूँ,  सिद्ध  पूजूँ  चाव सों।
आचार्य  श्री  उवझाय पूजूँ,  साधु  पूजूं  भाव सों।।
अर्हन्त  भाषित  बैन  पूजूँ,  द्वादशांग  रची   गनी।
पूजूँ दिगम्बर गुरुचरण, शिवहेत सब आशा हनी।।
सर्वज्ञ   भाषित  धर्म   दशविधि,   दयामय  पूजूँ  सदा।
जजि भावना षोडश रत्नत्रय, जा बिना शिव नहि कदा||
त्रैलोक्य  के  कृत्रिम,  अकृत्रिम,  चैत्य  चैत्यालय जजूँ।
पंचमेरु-  नन्दीश्वर  जिनालय,  खचर  सुरपूजित भजूँ॥
कैलाश  श्री  सम्मेदश्री,  गिरनारगिरि  पूजूँ  सदा।
चम्पापुरी  पावापुरी   पुनि,  और  तीरथ   सर्वदा।।
चौबीस  श्री  जिनराज  पूजूँ,  बीस  क्षेत्र  विदेह के।
नामावली इक सहसवसु जय होय पति शिवगेह के।

दोहा
जल  गंधाक्षत  पुष्प चरु, दीप  धूप  फल लाय।
सर्व पूज्य पद पूजहूँ, बहु विधि भक्ति बढ़ाय ।।

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Note

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