पूजा एक धार्मिक आदर व्यक्त करने का एक धार्मिक आयोजन होता है जो भगवान, देवी-देवताओं, गुरु, या किसी पवित्र वस्तु की प्रतिमा, मूर्ति, के सामने किया जाता है
कविवर ज्ञानतराय आडिल्ल उत्तम छिमा मारदव आरजव भाव है, सत्य शौच संयम तप त्याग उपाव हैं | आकिंचन ब्रह्मचर्य धरम दस सार हैं, चहुँगति दुखते काढि मुक्ति करतार हैं || ॐ ह्रीं उत्तम-क्षमा-मार्दव-आर्जव-शौच-सत्य-संयम-तप-त्याग-आकिंचन-ब्रह्मचर्य-आदि-दसलक्षण-धर्माय ! अत्र अवतर अवतर संवौषट ! ॐ…
कर्म-अरिगण जीत के, दरशायो शिव-पंथ | सिद्ध-पद श्रीजिन लह्यो, भोगभूमि के अंत || समर-दृष्टि-जल जीत लहि, मल्लयुद्ध जय पाय | वीर-अग्रणी बाहुबली, वंदौं मन-वच-काय || ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलीजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (आह्वाननं) ॐ ह्रीं श्रीबाहुबलीजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:!…
बीस तीर्थंकर जल फल आठों दर्व अरघ कर प्रीति धरी है, गणधर इन्द्रनिहू-तैं श्रुति पूरी न करी है। धानत सेवक जानके (हो) जगतें लेहु निकार, सीमन्धर जिन आदि दे बीस विदेह मँझार। (श्री जिनराज हो भव तारण तरण जहाज॥) ॐ…
Shanti Path in Hindi ॐ ह्रीं श्रीमन्तं भगवन्तं कृपा-लसन्तं श्रीवृषभादिमहावीरपर्यन्त- चतुर्विंशतितीर्थङ्करपरमदेवं आद्यानां आद्ये जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रे आर्यखण्डे . .......नाम्नि नगरे मासानामुत्तमे ...... मासे ...... शुभपक्षे ........ तिथौ ........ वासरे मुन्यार्यिका श्रावक-श्राविकाणां सकलकर्मक्षयार्थं अनर्घ्यपद- प्राप्तये सम्पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा। शांतिनाथ ! मुख शशि-उनहारी,…
कविश्री द्यानतराय (आडिल्ल छन्द) सरब-परव में बड़ो अठार्इ परव है| नंदीश्वर सुर जाहिं लेय वसु दरब है|| हमें सकति सो नाहिं इहाँ करि थापना| ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ओं ह्रीं श्रीनंदीश्वरद्वीपे पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तरदिक्षुविद्यमान द्विपंचाशज्जिनालयस्थ जिनप्रतिमासमूह!…
कविवर द्यानतराय (अडिल्ल) सोलह कारण भाय तीर्थंकर जे भये | हरषे इन्द्र अपार मेरुपै ले गये || पूजा करि निज धन्य लख्यो बहु चावसौं| हमहू षोडश कारन भावैं भावसौं || ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धयादि षोडशकारणानि! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ…
जिनगीतिका (तर्ज-प्रभु पतित पावन......!) अरहंत सिद्धाचार्य पाठक, साधु जन के पद नमूँ, जिनधर्म जैनागम जिनेश्वर, मूर्ति जिनगृह में रमूँ । नवदेव मुझको वैद्य सम हों, जन्म मृति जर रुज हरें, जिन नाम पद मम औषधी हों, माथ पर पद रज…
https://youtu.be/PEn7Gp5zi0E देवशास्त्र गुरु नमन करि, बीस तीर्थङ्कर ध्याय।सिद्ध शुद्ध राजत सदा, नमूँ चित्त हुलसाय॥ ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवन्तः, श्री अनंतानंत सिद्ध परमेष्ठिन:, श्री विद्यमान विंशति तीर्थंकरेभ्यः अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्। ॐ ह्रीं श्री देवशास्त्र गुरु भगवंतेभ्यः, श्रीविद्यमानविंशतितीर्थङ्करा:, श्रीअनन्तानन्त…
इन्द्रवज्रा वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु, नन्दीश्वरे यानि च मन्दरेषु । यावन्ति चैत्यायतनानि लोके, सर्वाणि वन्दे जिनपुङ्गवानाम् ॥ मालिनी अवनितल-गतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां, वन-भवन-गतानां दिव्य-वैमानिकानाम्। इह मनुज - कृतानां देवराजार्चितानां जिनवर-निलयानां भावतोऽहं स्मरामि॥ शार्दूलविक्रीडितम् जम्बूधातकि- पुष्करार्ध-वसुधा क्षेत्रत्रये ये भवा - श्चन्द्राम्भोजशिखण्डिकण्ठकनक प्रावृड्घनाभा जिनाः। सम्यग्ज्ञान -…
ऊर्ध्वाधरयुतं सबिन्दु-सपरं, ब्रह्मस्वरावेष्टितं, वर्गापूरित-दिग्गताम्बुजदलं, तत्सन्धि-तत्त्वान्वितम् । अन्तःपत्रतटेष्वनाहतयुतं, ह्रींकारसंवेष्टितं, देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो, वैरीभकण्ठीरवः ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र अवतर अवतर संवौषट्। ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपते सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः…
निज-मनो-मणि-भाजनभारया शम-रसैक-सुधारसधारया । सकल-बोध-कला-रमणीयकं सहज - सिद्धमहं परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्व० सहज-कर्म-कलङ्क-विनाशनै-रमल भाव- सुवासित-चन्दनैः । अनुपमान-गुणावलि-नायकं सहज-सिद्धमहं परिपूजये ॥ ॐ ह्रीं श्रीसिद्धचक्राधिपतये सिद्धपरमेष्ठिने भवातापविनाशनाय चन्दनं निर्व० सहज-भाव- सुनिर्मलतण्डुलैः सकलदोष- 'विलास - विशोधनैः ।…
(अडिल्ल छन्द) अष्ट-करम करि नष्ट अष्ट-गुण पाय के, अष्टम-वसुधा माँहिं विराजे जाय के | ऐसे सिद्ध अनंत महंत मनाय के, संवौषट् आह्वान करूँ हरषाय के || ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन्! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं णमो…