Jinvani Stuti जिनवाणी स्तुति
जिनवाणी स्तुति जैन धर्म की पवित्र वाणी के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का माध्यम है। इसमें जिनवाणी को सत्य, ज्ञान, और मोक्ष का मार्गदर्शन करने वाली परम पवित्र शक्ति माना गया है। जिनवाणी की स्तुति से मन शुद्ध…
स्तुति अक्सर धार्मिक अथवा आध्यात्मिक सन्दर्भ में भगवान, देवी-देवताओं, गुरु, या पवित्र वस्तु के साथ की जाती है और धार्मिक पूजा और आदर के भाव से की जाती है।
जिनवाणी स्तुति जैन धर्म की पवित्र वाणी के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने का माध्यम है। इसमें जिनवाणी को सत्य, ज्ञान, और मोक्ष का मार्गदर्शन करने वाली परम पवित्र शक्ति माना गया है। जिनवाणी की स्तुति से मन शुद्ध…
पारसनाथ स्तुति जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने वाला एक पवित्र स्तोत्र है। भगवान पार्श्वनाथ ने चार मुख्य व्रतों—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, और अपरिग्रह—का प्रचार किया, जो जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांत हैं।…
पूज्य आर्यिका श्री विज्ञानमति माताजी कृत (दोहा) पूज्य बड़े बाबा तुम्हें, कोटि-कोटि परणाम। थुति करता हूँ चाव से, मिट जावे भव नाम ॥ (पद्धरी) जय पूज्य बड़े बाबा महान, तुम दर्शन से हो पाप हान। सब दोष विनाशक धीर वीर,…
जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा और आत्म-कल्याण है। इस कठोर संयम मार्ग पर चलते हुए, श्रावक-श्राविकाओं से जाने-अनजाने में मन, वचन या काया से अनेक भूलें हो जाती हैं। इन भूलों और पापों का परिमार्जन (सफाई) करना आध्यात्मिक उन्नति…
ॐ नमः सिद्धेभ्यः| ॐ नमः सिद्धेभ्यः| ॐ नमः सिद्धेभ्यः|चिदानन्दैकरुपाय जिनाय परमात्मने|परमात्मप्रकाशाय नित्यं सिद्धात्मने नमः|| अर्थ – उन श्री जिनेन्द्र परमात्मा सिद्धत्मा को नित्य नमस्कार है जो चिदानन्द रुप हैं, अष्ट कर्मों को जीत चुके हैं, परमात्मा स्वरुप हैं और परमात्मा…
https://youtu.be/4SYHwI_ORrI जय-जय भगवंते सदा, मंगल मूल महान।वीतराग सर्वज्ञ प्रभु,नमौ जोरि जुगपान।। (ढाल मंगल की,छंद अडिल्ल और गीता) श्रीजिन जगमें ऐसो को बुधवंत जू। जो तुम गुण वरननि करि पावै अंत जू।।इंद्रादिक सुर चार ज्ञानधारी मुनी।कहि न सकै तुम गुणगण हे…
नित्य पूजा पीठिका ॐ जय जय जय नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु । णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं॥ "चत्तारि मंगलं अरहंत मंगलं सिद्ध मंगलं साहु मंगलं …
परमर्षि स्वस्ति मंगल पाठ (प्रत्येक श्लोक के बाद पुष्प क्षेपण करें ) (उपजातिच्छन्दः) नित्याप्रकम्पाद्भुतकेवलौघाः, स्फुरन्मनःपर्ययशुद्धबोधाः दिव्यावधि-ज्ञानबलप्रबोधाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः॥१॥ कोष्ठस्थ-धान्योपम-मेकबीजं, संभिध-संश्रोतृपदानुसारि । चतुर्विधं बुद्धिबलं दधानाः, स्वस्ति क्रियासुः परमर्षयो नः ||२|| संस्पर्शनं संश्रवणं च दूरादास्वादन घ्राण-विलोकनानि । दिव्यान्मतिज्ञानबलाब्रहन्तः, स्वस्ति क्रियासुः…
कविवर भूधरदास ढाल परमादी अहो जगत-गुरु! देव' ! सुनिए अरज हमारी। तुम प्रभु दीनदयाल, मैं दुखिया संसारी ॥१॥ इस भव-वन में वादि, काल अनादि गमायो। भ्रभ्यो चहूँ गति माँहिं, सुख नहिं दुख बहु पायो ॥२॥ कर्म-महारिपु जोर, एक न कान…
कविवर दौलतराम दोहा सकल-ज्ञेय-ज्ञायक तदपि निजानन्द-रस-लीन। सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि-रज-रहस-विहीन॥ पद्धरि जय वीतराग-विज्ञान पूर, जय मोह तिमिर को हरन सूर। जय ज्ञान अनन्तानन्त धार, दृग-सुख-वीरज-मण्डित अपार॥ जय परम शान्त मुद्रा समेत, भविजन को निज अनुभूति हेत। भवि भागन बच-जोगे…
श्रीसिद्धभक्ति अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्रीसिद्धभक्तिकायोत्सर्गं कुर्वेऽहम्। (९ बार णमोकार ) सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं। अगुरुलहु-मव्वावाहं, अ_गुणा होंति सिद्धाणं॥ १॥ तवसिद्धे, णय-सिद्धे, संजम-सिद्धे, चरित्त-सिद्धे य। णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि॥ २॥ इच्छामि भंते। सिद्ध-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्म…
ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय-द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ओं ह्रीं क्रों अस्माकं पापं खण्डय खण्डय जहि-जहि दह-दह…