Dev Shastra Guru Pooja

ज्ञानोदय छन्द
इन्द्रिय मन को जीत अजित जिन, द्वितीय तीर्थंकर प्यारे ।
विजय अनुत्तर से आ जन्में, क्षेमंकर जग से न्यारे ॥
पूजन हित आह्वानन करते, मेरे उर में आ जाओ।
आप समान बने यह आतम, समकित बोध जगा जाओ ॥
ओं ह्रीं तीर्थंकर अजितनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ।

उज्ज्वल जल सम निर्मल मन हो, श्रद्धा गुण की प्याली हो ।
प्रभो! आपको नीर चढ़ाऊँ, आप दोष से खाली हो ॥
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
ओंह्रींश्रीअजितनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षमा कलश में समता चन्दन, प्रभु प्रताप से पा जाऊँ ।
हे जिन ! भव संताप मिटाने, गन्ध चढ़ाने को आऊँ
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

चारित गुण के अक्षत मोती, प्रभु चरणों में पाऊँ मैं ।
जब तक सिद्धि न पाऊँ भगवन्, तब तक अक्षत लाऊँ मैं ॥
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

आत्म बह्म में रमने भगवन्, शील सुमन उर में लाया ।
मदन भाव का मर्दन करके, अजितनाथ ध्याने आया ॥
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनाथी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

क्षुधा रोग की औषधि पाने, अनशन भाव बना लाये।
चरुवर के बदले में जिनवर, क्षुधा नाशने हम आये ||
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मोह तिमिर को हरने भगवन्, सूर्य समान रहो स्वामी ।
शिव पथ सदा प्रकाशित होवे, हो सर्वज्ञ अजितनामी ॥
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अष्ट कर्म की धूप बनाऊँ, ध्यान अग्नि को प्रजलाऊँ ।
हे जिनवर ! तुम सा बल पाकर, कर्म नष्ट कर शिव पाऊँ ॥
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
अह्रीं श्री अजितनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।

मोक्ष सुफल पाने प्रभु कर में, श्रीफल लेकर आये हैं।
कर्मफलों से विमुक्त कर दो, कष्टों से घबराये हैं |
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी ।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
ओं ह्रीं श्री अजितनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अनर्घ पद पाने समर्घ ले, प्रभु चरणों में आये हैं।
विषयों से मन सदा अजित हो, यही भाव हम भाये हैं ।
अजितनाथ जिन बने जितेन्द्रिय, हुए अतीन्द्रिय जगनामी।
मन इन्द्रिय को जीत सकूँ मैं, ऐसी शक्ति मिले स्वामी ॥
ओं ह्रीं श्री अजितनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा
अजित जीत कर कर्म को, बन गये सिद्ध महान ।
पाँचों कल्याणक भजूँ, पहुँचूँ मैं शिव थान ॥

पंचकल्याणक अर्घ
दोहा

विजय अनुत्तर से उतर, विजया गर्भ सुहाय ।
जितारि गृह साकेतपुर, सुरपति नग बरसाय ॥
ज्येष्ठ कृष्ण पन्द्रस रही, था रोहिणि नक्षत्र ।
ब्रह्ममुहूर्ते आ बसे, अजितनाथ बन पुत्र ॥
ओं ह्रीं ज्येष्ठकृष्णामावस्यायां गर्भकल्याणमण्डित श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अर्ध ।

माघ शुक्ल दशमी रही, रोहिणी था नक्षत्र ।
जनम अयोध्या में हुआ, होता गोत्र पवित्र ॥
ओं ह्रीं माघशुक्लदशम्यां जन्मकल्याणमण्डित श्रीअजितनाथजनेन्द्राय अर्धं ।

माघ शुक्ल नवमी दिना था ज्येष्ठा नक्षत्र ।
भव तन भोग विरक्त हो, बनते जग के क्षत्र ॥
बेला सह दीक्षा गही, अजितनाथ भगवान ।
नग्न दिगम्बर बन किया, कर में भोजन पान ॥
ओं ह्रीं माघशुक्लनवम्यां तपः कल्याणमण्डितश्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अर्धं ।

पौष कृष्ण एकादशी, पाया केवलज्ञान ।
भव्यों को उपदेश दे पाते पद निर्वाण ॥
ओं ह्रीं पौषशुक्लैकादश्यां ज्ञानकल्याणमण्डित श्री अजितनाथजिनेन्द्राय अर्धं ।

चैत्र शुक्ल पाँचे रही, पाया पद निर्वाण ।
हम प्रभु पूजा से करें, मोक्ष मार्ग निर्माण ॥
ओं ह्रीं चैत्रशुक्लपंचम्यां मोक्षकल्याणमण्डितश्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अर्ध ।

जयमाला (यशोगान)

अजितनाथ तीर्थेश को, वन्दन बारम्बार ।
यशोगान प्रभु आपका, करे भवार्णव पार ॥

ज्ञानोदय छन्द
ऋषभदेव के मोक्ष बाद जब, बीते लाख पचास करोड़ ।
सागर तब जिन अजितनाथ का, जन्म हुआ स्वर्गी सुख छोड़ ॥
इसमें अजित आयु शामिल थी, स्वर्ण वर्ण वाले प्रभु थे।
धनुष चार सौ पचास ऊँचे, तन अतिशय दश प्रभु के थे ॥1॥

इन्द्र गणों ने सुमेरु गिरि पर, जिनेन्द्र का अभिषेक किया।
तथा अजित का चिन्ह इन्द्र ने, हाथी यह उद्घोष किया ॥
इक दिन मेघ नष्ट होते लख, भोगों से सुविमुख होते ।
लौकान्तिक देवों से स्तुत हो, दीक्षा के अभिमुख होते ॥2॥

बैठे प्रभा पालकी में प्रभु, सहस्र राजा साथ लिये।
तप धरने सब सिद्धों के प्रति, अजितनाथ नत माथ हुये ॥
सहेतुवन में दीक्षा लेकर, बेला का उपवास किया।
अवधपुरी में ब्रह्म भूप घर, प्रभुवर ने आहार लिया ॥3॥

द्वादश वर्ष तपस्या करके, केवलज्ञानी हो जाते।
सिंहसेनादिक नब्बे गणधर, प्रधान श्रोता बन जाते॥
कुब्जा आदि प्रधान आर्यिका, जीवन का उद्धार करें।
अजितनाथ जिन देश देश में, दे उपदेश विहार करें ॥4॥

इक सौ सत्तर आर्य भूमि में, जब सब में तीर्थंकर थे।
तब तीर्थंकर अजितनाथ जिन, जम्बु भरत के जिनवर थे ॥
अन्त समय में सहस्त्र मुनि सह, गिरि सम्मेद शिखर आते ।
जहाँ कर्म से मुक्त जिनेश्वर, अष्टम वसुधा को भाते ॥5॥
ओंह्रीं श्रीअजितनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये पूर्णार्थं निर्वपामीति स्वाहा।

गज जिनेन्द्र पद शोभता, अजितनाथ पहचान ।
विद्यासागर सूरि से, मृदुमति पाती ज्ञान
॥ इति शुभम् भूयात् ॥

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Note

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