श्री अरनाथ जिन पूजा 2022 || New Shri Arnath Jin Pooja

Dev Shastra Guru Pooja

तर्ज- दयालु प्रभु से………..
अरनाथ स्वामी, शरण तेरी आये, दुख दूर होवें कर्म के सताये।
हथिनापुर  में  जन्म  लिया  है, मित्रा  माता  धन्य  किया  है।
तात सुदर्शन नृप हरषाये, सुर नर किन्नर मंगल गाये ॥ अरनाथ स्वामी…….. |

षट्खण्ड  स्वामी  कामदेव नामी, त्याग परिग्रह बने मोक्षगामी।
वीतराग सर्वज्ञ सुहाये, आज हृदय में हमने बुलाये ॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं तीर्थंकर अरनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम्।

जन्म मरण से भीत हुए हैं, निज हित करने प्रीत हुए हैं।
प्रभु आपने भव भ्रमण मिटाये, तब तुम पद में जल ले आये ॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

संसार दुख से तप्त हुए हैं, चारों गति में जप्त हुए हैं।
प्रभु आपने भव ताप मिटाये, तब तुम पद में चन्दन लाये॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।

इन्द्रिय सुख में दुख ही पाया, सुख पाने को मैं अकुलाया।
अक्षय सुख प्रभु तुमने पाये, तब तुम पद में अक्षत लाये॥
अरनाथ स्वामी, शरण तेरी आये, दुख दूर होवे कर्म के सताये।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।

कामबाण को सहता आया, इससे गति गति में दुख पाया।
आप शील के सिन्धु कहाये, तब जिन पद में सुमन चढ़ाये॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।

रोग क्षुधा का सहते आये, कोई न सुनता कहते आये।
हे जिन! तुमने दोष नशाये, तब तुम पद में नेवज लाये ॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।

मैं अज्ञान तिमिर में भटका, नहिं सुख पाया जो निज घट का।
तुममें केवलज्ञान सुहाये, तब पूजन को दीपक लाये ॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

अगर तगर की न धूप बनाई, कर्मों की तुम्हें धूप सुहायी।
ध्यान अग्नि में कर्म जलाये, तभी जिनेश्वर सुरभित भाये॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीतिस्वाहा।

कर्म फलों को निशदिन भोगा, समता का नित होवे योगा।
जिनवर तुमने कर्म नशाये, तभी श्रेष्ठ फल पद में लाये॥ अरनाथ स्वामी…….।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

मूल्य वस्तु से अनमोल पाते, ऐसे जिनेश्वर के पद भाते।
अर्घ चढ़ाकर अनर्घ पायें, तभी आपको अर्घ चढ़ायें॥
अरनाथ स्वामी, शरण तेरी आये, दुख दूर होवें कर्म के सताये।
ओं ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घं निर्वपामीति स्वाहा।

पंचकल्याणक अर्घ
सखी छन्द

फाल्गुन सित तीज सुहाई, गरभागम मंगलदायी।
मित्रा देवी उर आये, अरनाथ जिनेश्वर पाय॥
ओं ह्रीं फाल्गुनशुक्लातृतीयायां गर्भकल्याणमण्डितश्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्घं।

मगसिर सित चतुर्दशी थी, गजपुर में अमित खुशी थी।
सुरगिरि सुमेरु ले जाते, हरि प्रभु का स्नान कराते॥
ओं ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लचतुर्दश्यां जन्मकल्याणमण्डित श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्धं।

मगसिर सित दशमी प्यारी, गजपुर में अमित खुशी थी।
अपराजित नृप गृह पारन, यश गाता चक्रपुरी जन॥
ओं ह्रीं मार्गशीर्षशुक्लादशम्यां तपः कल्याणमण्डित श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्धं।

कार्तिक सित द्वादशी आयी, अरिहंत सभा हर्षायी।
प्रभु ने उपदेश सुनाया, धनपति कर्त्तव्य निभाया॥
ॐ ह्रीं कार्तिकशुक्लाद्वादश्यां ज्ञानकल्याणमण्डितश्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्धं।

अलि चैत्र अमावस आयी, प्रभु कर्म नाशने भायी।
तुम गुण अनंत भण्डारी, गुण पायें शरण तुम्हारी॥
ओं ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यां मोक्षकल्याणमण्डित श्रीअरनाथजिनेन्द्राय अर्ध।

जयमाला (यशोगान)
दोहा

वर्ष सहस्त्र करोड़ कम, गया पल्य चौथांश।
कुन्धु बाद अरनाथ का, जन्म हुआ कुरुवंश॥
सहस चुरासी वर्ष की आयु वर्ण स्वर्णाभ।
तीस धनुष उत्तुंग प्रभु, विजय अनुत्तर आभ॥

ज्ञानोदय छन्द
कुरु जांगल था देश आपका, हस्तिनागपुर में जन्मे।
सोमवंश काश्यप गोत्री हो, रत्न वृष्टि पितु आंगन में॥
आयु तीसरा भाग रहा तब, शरद काल परिवर्तन से।
विरक्त लख लौकान्तिक आये, ब्रह्म लोक सुर स्वर्गन से॥
राज दिया अरविन्द पुत्र को, बैठ पालकी वैजन्ती।
तेला के उपवास साथ नृप, सहस्त्र दीक्षित श्रीमन्ती॥
षोडश वर्ष तपस्या करके, अर जिन केवलज्ञानी हों।
द्वादश सभा सुनें प्रवचन को, दिव्य वचन कल्याणी हों॥
कुम्भ आर्य थे तीस गणाधिप, सहस पचास मुनीश सभी।
मुख्य यक्षिला आर्या गणिनी, साठ सहस थी संख्य सभी॥
दे उपदेश शिखरजी आये, कर्म नाश शिव पद पाया।
ऐसे अर प्रभु मृदु भव्यों को, देवें नित हितकर छाया॥
ॐ ह्रीं श्री अरनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये पूर्णार्थं निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा
मत्स्य चिन्ह प्रभु पाद में, अरजिन की पहचान।
विद्यासागर सूरि से, मृदुमति पाती ॥
॥ इति शुभम् भूयात् ॥

*****

Note

Jinvani.in मे दिए गए सभी स्तोत्र, पुजाये, आरती और श्री अरनाथ जिन पूजा 2022 जिनवाणी संग्रह संस्करण 2022 के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.