पूजा एक धार्मिक आदर व्यक्त करने का एक धार्मिक आयोजन होता है जो भगवान, देवी-देवताओं, गुरु, या किसी पवित्र वस्तु की प्रतिमा, मूर्ति, के सामने किया जाता है
पुष्पमंजरी छन्द वीतराग देव आपका सुदर्श पा गया नमीश जैन जिनेश उर धर्म सौख्यदायि मुझको भा गया॥ जिनेश उर पधारिये मृदुल हृदय समाइये मोक्षमार्ग पे चलूँ सुमार्ग को बताइये॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरनमिनाथजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ! अत्र…
सखी छन्द शंभव जिन शिव सुख पाये, संभव सम्यक् भव भाये। ग्रैवेयक से तुम आये, तीर्थंकर पितु हरषाये॥ मैं करूँ प्रभो आह्वानन, स्वीकारो मम उर आसन। नहिं तुम बिन कोई सहारा, कर दो उद्धार हमारा॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरशंभवनाथजिनेन्द्र ! अत्र…
क्षमासखी छन्द अभिनन्दन जिनवर देवा, सुर नर मुनि करते सेवा । संवर नृप पिता सुहाये, गृह अवधपुरी में आये ॥ सिद्धार्था माँ कुलवन्ती, तुम जैसे सुत को जनती । प्रभु सोलह स्वप्न दिखाये, सत्रह में प्रवेश पाये ॥ हम पूजा…
ज्ञानोदय छन्द सुमतिनाथ जिन सुमति प्रदाता, बोधि समाधि प्रदान करो। मेरे उर के सिंहासन पर, हे जिनवर पग आन धरो ॥ मातु मंगला नगर विनीता, संजयन्त स्वर तज आये। पिता मेघ प्रभु के प्रांगण में, सुरपति बाजे बजवाये ॥ पंचम…
ज्ञानोदय छन्द धरणी नृप गृह जन्म लिया है, मात सुसीमा हरषाती। ऊर्ध्व उच्च ग्रैवेयक से प्रभु, आते अवनी गुण गाती॥ कौशाम्बी नगरी सुख पाती, इन्द्र महोत्सव करते हैं। ऐसे वीतराग पद्मप्रभ, प्रभु को उर में धरते हैं॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरपद्मप्रभजिनेन्द्र!…
ज्ञानोदय छन्द सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्व जिन, मध्यम ग्रीवक से आये । सुप्रतिष्ठ नृप पृथिवीसेना, नगर बनारस हरषाये ऐसे वीतराग जिनवर की पूजन करने हम आये । मेरे उर के सिंहासन पर, आप विराजो मन भाये ॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरसुपार्श्वनाथजिनेन्द्र! अत्र…
ज्ञानोदय महासेन सुत! अष्टम जिनवर, वीतराग तीर्थंकर हो। माँ सुलक्षणा लाल चन्द्रप्रभ! करुणाकर क्षेमंकर हो॥ शत इन्द्रों से वंदित प्रभुवर, समवसरण में राजित हो। द्वादश गण नक्षत्र मध्य में, चन्द्र समान विराजित हो॥ चन्द्रप्रभा सम कान्तिमान् हो, जग में अतिशय…
लय- लावनी- नर होनहार होतव्य न तिल भर टरती...... जिन पुष्पदन्त भगवन्त, अन्त किया भव का। हे सुविधिनाथ अब अन्त करो, मम भव का॥ हम पाप नाशने, तेरे दर पर आये। शाश्वत सुख दीजे, द्रव्य सजा कर लाये॥ ओं ह्रीं…
विद्यार्चना छंद -लय- गुरु विद्यासागर के चरणों में.. विदिशा नगरी भद्दलपुर में, आरण दिवि से अवतार लिया। श्रीमात सुनन्दा पितु दृढ़रथ ने, जिन्हें हृदय से प्यार किया| ऐसे हे शीतलनाथ प्रभो!, तुम दश धर्मों से पार हुये । हम भी…
वसंततिलका छंद - तभजज गण दो गुरु श्रेयांस नाथ जिन सिद्ध विशुद्ध स्वामी, आओ मदीय उर में जिनराज नामी। पूजूँ तुम्हें विनय से उर में बिठा के, जाके वसूँ विभव मोक्ष निजात्म ध्याके ॥ ॐ ह्रीं तीर्थंकर श्रेयांसजिनेन्द्र! अत्र अवतर…
कुसुमलता छन्द महाशुक्र हरि विमान तजकर, जम्बूद्वीप भरत में आय। चम्पापुर वसुपूज्य भूप की रानी जया गर्भ सुखदाय॥ वासुपूज्य है नाम तुम्हारा, प्रथम बाल ब्रह्मचारी ईश। द्वादशवें तीर्थंकर जिनवर, मेरे हृदय बसो जगदीश॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरवासुपूज्यजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर…
रेवती छन्द विमल जिन बारवां दिवि तज, कम्पिला नगर में आये। मातु जयश्यामा कृतधर्मा, पिता जिन बाल को पाये॥ जगत आनन्द में डूबा, खुशी के गीत सब गाये। बने सर्वज्ञ तीर्थंकर, पूजने हम हृदय लाये ओं ह्रीं तीर्थंकरविमलनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर…