पूजा एक धार्मिक आदर व्यक्त करने का एक धार्मिक आयोजन होता है जो भगवान, देवी-देवताओं, गुरु, या किसी पवित्र वस्तु की प्रतिमा, मूर्ति, के सामने किया जाता है
पुष्पमंजरी छन्द - रजरजर - गण तर्ज-देव आप दर्श से.............. सिंहसेन तात मात सूर्या पुत्र हो गये। हे अनन्तनाथ आप कर्म मुक्त हो गये॥ वीतराग वीतद्वेष आप वीतकाम हो। पूजने बुला रहे हृदै विराजमान हो॥ ओं ह्रीं तीर्थंकरअनन्तनाथजिनेन्द्र ! अत्र…
भारत छन्द -सात भगण दो गुरु धर्म जिनेन्द्र नमो कर जोड़, सुमात प्रभा प्रभु गर्भ सुहाये। भानु पितांगण में सुर इन्दर, गर्भ सुमंगल गान सुनाये॥ काश्यप गोत्र सुवंश महाकुरु देव घनी धन वृष्टि कराये। रत्नपुरी तज दीक्षित धर्म, महाभगवन्त हृदै…
दोहा वृषभदेव को आदि दे, शीतल जिन पर्यन्त । मंगलकर जिनवर नमूँ, होवे भव का अन्त ||१|| जिन शासन में व्रत कहे, एक शतक वसु जान । उनके उत्तम फल कहे, गति विधि को पहचान ॥२॥ व्रत सुगंध दशमी महा…
ज्ञानोदय छन्द इन्द्रिय मन को जीत अजित जिन, द्वितीय तीर्थंकर प्यारे । विजय अनुत्तर से आ जन्में, क्षेमंकर जग से न्यारे ॥ पूजन हित आह्वानन करते, मेरे उर में आ जाओ। आप समान बने यह आतम, समकित बोध जगा जाओ…
मातृकाछन्द-लय झूलना हे ऋषभ देव! तेरी, शरण आ गये, मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये। बड़े बाबा! तुम्हारी, शरण आ गये, मुझे दुख से उभरने, चरण भा गये ॥ नाभि मरुदेवी सुत, आदि जिन की शरण, नाशती है जरा…
ज्ञानोदय तीर्थ (अजमेर) भारत छन्द -लय-वीर हिमाचल तैं प्राणत स्वर्ग तजो जिनराज, सु राजगृही प्रभु जन्म लियो है। श्री सुखमित्र सुमित्र पिता, पद्मा जननी घर धन्य कियो है॥ हे मुनिसुव्रतनाथ जिनेश्वर !, है हृदयांगन देश हमारो । भूमि सुनिर्गत हे…
चतुर्थकालीन सांगानेर वाले बाबा ऋभदेव पूजन रचियता - लालचन्द जी जैन (राकेश) ऋषभदेव हैं धर्म - प्रवर्तक कर्म प्रवर्तक तीर्थंकर, कर्मनाश कर सिद्ध भये हैं, भक्त धन्य हैं दर्शनकर; साँगानेर वाले बाबा की प्रतिमा अतिशयकारी है, पाप नशाती संकट हरती,…
दोहा शुद्ध सुगुण छ्यालीस युत, समोशरण के ईश । निज आतम उद्धार हित, नमत चरण में शीश ॥१॥ आत्म-शुद्धि के अर्थ हम, जिनवर पूज रचाय । रत्नत्रय की प्राप्ति हित, श्री जिनेन्द्र गुण गाय ॥२॥ करूँ त्रिविधि शुधियोग से, आह्वानन…
श्रीअकम्पनाचार्यादि सप्तशत मुनि पूजा चाल जोगीरासा पूज्य अकम्पन साधु-शिरोमणि सात- शतक मुनि ज्ञानी । आ हस्तिनापुर के कानन में हुये अचल दृढ़ ध्यानी ॥ दुखद सहा उपसर्ग भयानक सुन मानव घबराये। आत्म-साधना के साधक वे, तनिक नहीं अकुलाये॥ योगिराज श्री…
(दोहा) जनम-जरा-मृतु क्षय करे, हरे कुनय जड़-रीति | भवसागर सों ले तिरे, पूजे जिनवच-प्रीति || ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । ॐ ह्रीं श्रीजिनमुखोद्भवसरस्वतीदेवि ! अत्र मम…
https://youtu.be/iDZfMZRVODI कविश्री मल्ल (छप्पय छन्द) अंग-क्षमा जिन-धर्म तनों दृढ़-मूल बखानो |सम्यक्-रतन संभाल हृदय में निश्चय जानो ||तज मिथ्या-विषमूल और चित निर्मल ठानो |जिनधर्मी सों प्रीति करो सब-पातक भानो ||रत्नत्रय गह भविक-जन, जिन-आज्ञा सम चालिए |निश्चय कर आराधना, कर्मराशि को जालिये…
दोहा - विषय-रोग औषध महा, दव-कषाय जल-धार | तीर्थंकर जाको धरे सम्यक् चारित्र सार || ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं त्रयोदशविध सम्यक् चारित्र!…