श्री वासुपूज्य चालीसा

है सीमंधर भगवान शरण ली तेरी… Jain Bhajan

“है सीमंधर भगवान, शरण ली तेरी” एक हृदयस्पर्शी जैन भजन है, जो वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी के चरणों में गहरी श्रद्धा और समर्पण प्रकट करता है। इस भजन में साधक, प्रभु सीमंधर स्वामी के पावन आश्रय में आकर संसार के दुख, क्लेश और कर्मबंधन से मुक्ति पाने की प्रार्थना करता है।

भजन की प्रत्येक पंक्ति में अहोभाव, भक्ति और विनय से भरी भावनाएँ झलकती हैं, जहाँ भक्त प्रभु से मार्गदर्शन, करुणा, और आत्मकल्याण की याचना करता है। सीमंधर स्वामी के दर्शन, वाणी, और उपदेश के स्मरण से साधक के हृदय में गहराई से अहिंसा, शांति, प्रेम, और मुक्ति-पथ पर अग्रसर होने की प्रबल इच्छा उत्पन्न होती है।

Jain Bhajan

Talking jinvani

हे ! सीमंधर भगवान शरण ली तेरी,

बस ज्ञाता दृष्टा रहे परिणति मेरी ||टेक||

निज को बिन जाने नाथ फिरा भव वन में |

सुख की आशा से झपटा उन विषयन में ||

ज्यों कफ में मक्खी बैठ पंख लिपटावे,

तब तड़फ-तड़फ दुःख में ही प्राण गमावे ||

त्यों इन विषयन में मिली, दुखद भवफेरी ||१|| (बस ज्ञाता…)

मिथ्यात्व राग वश दुखित रहा प्रतिपल ही,

अरु कर्म बंध भी रुक न सका पल भर भी |

Talking jinvani

सौभाग्य आज हे प्रभो तुम्हें लख पाया,

दुःख से मुक्ति का मार्ग आज मैं पाया ||

हो गयी प्रतीति नहीं मुक्ति में देरी ||२||(बस ज्ञाता…)

सार्थक सीमंधर नाम आपका स्वामी |

Talking jinvani

सीमित निज में हो गये आप विश्रामी ||

करते दर्शन कर भव सीमित भवि प्राणी |

फिर आवागमन विमुक्त बने शिवगामी ||

चिरतृप्ति प्रदायक शांति छवि प्रभु तेरी ||३||(बस ज्ञाता…)

आत्माश्रय का फल आज प्रभो लख पाया |

निज में रमने का भाव मुझे उमगाया ||

निज वैभव सन्मुख तुच्छ सभी कुछ भासा |

दर्शन से पलट गया परिणति का पासा ||

चैतन्य छवि अंतर में आज उकेरी ||४||(बस ज्ञाता…)

हे ! ज्ञायक के ज्ञायक चैतन्य विहारी |

Talking jinvani

मैं भाव वंदना करूँ परम उपकारी ||

अपनी सीमा में रहूँ यही वर पाऊँ |

प्रभु भेद भक्ति तज निज अभेद को ध्याऊँ ||

अब अंतर में ही दिखे मुझे सुख ढेरी ||५||(बस ज्ञाता…)

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Note

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