Acharya Shri Vidhya Sagar Ji Maharaj

कवि श्री मनरंगलाल

(छप्पय छन्द)
प्रथम नाम श्रीमन्व दुतिय स्वरमन्व ऋषीश्वर |
तीसर मुनि श्रीनिचय सर्वसुन्दर चौथो वर ||
पंचम श्रीजयवान विनयलालस षष्ठम भनि |
सप्तम जयमित्राख्य सर्व चारित्र-धाम गनि ||
ये सातों चारण-ऋद्धि-धर, करूँ तास पद थापना |
मैं पूजूँ मन-वचन-काय कर, जो सुख चाहूँ आपना ||
ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर-श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्)
ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर – श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र तिष्ट तिष्ट ठ: ठ:! (स्थापनम्)
ॐ ह्रीं श्री चारणऋद्धिधर- श्रीसप्तऋषीश्वरा:! अत्र मम सत्रिहितो भव भव वषट्! (सत्रिधिकरणम्)

(गीता छन्द)
शुभ-तीर्थ-उद्भव-जल अनूपम, मिष्ट शीतल लायके |
भव-तृषा-कंद-निकंद-कारण, शुद्ध-घट भरवायके ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री चारण-ऋद्धिधर-श्रीमन्व-स्वरमन्व-निचय-सर्वसुन्दर जयवान- विनयलालस-जयमित्रऋषिभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१।

श्रीखंड कदलीनंद केशर, मंद-मंद घिसायके |
तस गंध प्रसरित दिग्-दिगंतर, भर कटोरी लायके ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: संसारताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।२।

अतिधवल अक्षत खंड-वर्जित, मिष्ट राजन भोग के |
कलधौत-थारी भरत सुन्दर, चुनित शुभ-उपयोग के ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।३।

बहु-वर्ण सुवरण-सुमन आछे, अमल कमल गुलाब के |
केतकी चंपा चारु मरुआ, चुने निज-कर चाव के ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।४।

पकवान नानाभाँति चातुर, रचित शुद्ध नये नये |
सद मिष्ट लाडू आदि भर बहु, पुरट के थारा लये ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।५।

कलधौत-दीपक जड़ित नाना, भरित गोघृत-सार सों |
अति-ज्वलित जगमग-ज्योति जाकी, तिमिर-नाशनहार सों ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: मोहांध्कार-विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।६।

दिक्-चक्र गंधित होत जाकर, धूप दश-अंगी कही |
सो लाय मन-वच-काय शुद्ध, लगाय कर खेऊँ सही ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: अष्टकर्म-दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।७।

वर दाख खारक अमित प्यारे, मिष्ट पुष्ट चुनायके |
द्रावड़ी दाड़िम चारु पुंगी, थाल भर-भर लायके ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: मोक्षफल-प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।८।

जल गंध अक्षत पुष्प चरुवर, दीप धूप सु लावना |
फल ललित आठों द्रव्य-मिश्रित, अर्घ कीजे पावना ||
मन्वादि चारण-ऋद्धि-धारक, मुनिन की पूजा करूँ |
ता करें पातक हरें सारे, सकल आनंद विस्तरूँ ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: अनर्घ्यपद-प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।९।

जयमाला
वंदूँ ऋषिराजा, धर्म-जहाजा, निज-पर-काजा करत भले|
करुणा के धारी, गगन-विहारी, दु:ख-अपहारी भरम दले||

काटत जम-फंदा, भवि-जन-वृंदा, करत अनंदा चरणन में|
जो पूजें ध्यावें, मंगल गावें, फेर न आवें भव-वन में ||

(छन्द पद्धरि)
जय ‘श्रीमनु’ मुनिराजा महंत, त्रस-थावर की रक्षा करंत |
जय मिथ्या-तम-नाशक पतंग, करुणा-रस-पूरित अंग-अंग ||

जय ‘श्रीस्वरमनु’ अकलंक रूप, पद-सेव करत नित अमर भूप |
जय पंच-अक्ष जीते महान्, तप तपत देह कंचन-समान ||

जय ‘निचय’ सप्त तत्त्वार्थ भास, तप-रमातनों तन में प्रकाश |
जय विषय-रोध संबोध भान, परपरिणति नाशन अचल ध्यान ||

जय जयहि ‘सर्वसुन्दर’ दयाल, लखि इंद्रजालवत् जगत्-जाल |
जय तृष्णाहारी रमण राम, निज परिणति में पायो विराम ||

जय आनंदघन कल्याणरूप, कल्याण करत सबको अनूप |
जय मद-नाशन ‘जयवान’ देव, निरमद विचरत सब करत सेव ||

जय जयहिं ‘विनयलालस’ अमान, सब शत्रु-मित्र जानत समान |
जय कृशित काय तप के प्रभाव, छवि-छटा उड़ति आनंद-दाय ||

‘जयमित्र’ सकल जग के सुमित्र, अनगिनत-अधम कीने पवित्र |
जय ‘चंद्र-वदन’ राजीव-नैन, कबहूँ विकथा बोलत न बैन ||

जय सातों मुनिवर एक संग, नित गगन-गमन करते अभंग |
जय आये मथुरापुर मँझार, तहँ मरी-रोग को अतिप्रसार ||

जय-जय तिन चरणनि के प्रसाद, सब मरी देवकृत भर्इ वाद |
जय लोक करे निर्भय समस्त, हम नमत सदा नित जोड़ हस्त ||

जय ग्रीषम-ऋतु पर्वत मँझार, नित करत अतापन योगसार |
जय तृष-परीषह करत जेर, कहुं रंच चलत नहि मन-सुमेर ||

जय मूल अठाइस गुणन धार, तप उग्र तपत आनंदकार |
जय वर्षा-ऋतु में वृक्ष-तीर, तहँ अतिशीतल झेलत समीर ||

जय शीत-काल चौपट मँझार, कै नदी-सरोवर-तट विचार |
जय निवसत ध्यानारूढ़ होय, रंचक नहिं मटकत रोम कोय ||

जय मृतकासन वज्रासनीय, गोदूहन इत्यादिक गनीय |
जय आसन नानाभाँति धार, उपसर्ग सहत ममता-निवार ||

जय जपत तिहारो नाम जोय, लख पुत्र-पौत्र कुलवृद्धि होय |
जय भरे लक्ष अतिशय भंडार, दारिद्र-तनो दु:ख होय छार ||

जय चोर अग्नि डाकिन पिशाच, अरु ईति भीति सब-नसत साँच |
जय तुम सुमरत सुख लहत लोक,सुर-असुर नमत पद देत धोक ||

(रोला छन्द)
ये सातों मुनिराज, महातप लक्ष्मीधारी |
परमपूज्य पद धरे, सकल जग के हितकारी ||

जो मन-वच-तन शुद्ध, होय सेवें औ ध्यावें|
सो जन ‘मनरंगलाल’, अष्ट-ऋद्धिन को पावें ||

(दोहा)
नमन करत चरनन परत, अहो गरीब-निवाज|
पंच-परावर्तननि तें, निरवारो ऋषिराज ||
ॐ ह्रीं श्री मन्वादिसप्तर्षिभ्य: जयमाला-पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
।। इत्याशीर्वाद: पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।

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Note

Jinvani.in मे दिए गए सभी स्तोत्र, पुजाये, आरती आदि Jain Saptarishi Pooja जिनवाणी संग्रह संस्करण 2022 के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

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