श्री अरहनाथ चालीसा – Shri Arahnath Chalisa

bhagwan arnath

Talking jinvani

श्री अरहनाथ चालीसा जैन धर्म के अठारहवें तीर्थंकर, श्री अरहनाथ भगवान को समर्पित एक पवित्र भक्ति स्तोत्र है। भक्तगण अपनी श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने के लिए नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करते हैं। ऐसा विश्वास है कि श्री अरहनाथ चालीसा का भक्तिपूर्वक पाठ करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, मन को शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

यह चालीसा भक्त और भगवान के बीच एक सेतु का कार्य करती है, जिससे devotees प्रभु के करीब महसूस करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।

श्री अरहनाथ चालीसा

श्री अरहनाथ जिनेन्द्र गुणाकर, ज्ञान-दरस-सुरव-बल रत्ऩाकर ।
कल्पवृक्ष सम सुख के सागर, पार हुए निज आत्म ध्याकर ।

अरहनाथ नाथ वसु अरि के नाशक, हुए हस्तिनापुर के शासक ।
माँ मित्रसेना पिता सुर्दशन, चक्रवर्ती बन किया दिग्दर्शन ।

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

सहस चौरासी आयु प्रभु की, अवगाहना थी तीस धनुष की ।
वर्ण सुवर्ण समान था पीत, रोग शोक थे तुमसे भीत ।

Talking jinvani

ब्याह हुआ जब प्रिय कुमार का, स्वप्न हुआ साकार पिता का ।
राज्याभिषेक हुआ अरहजिन का, हुआ अभ्युदय चक्र रत्न का । ।

एक दिन देखा शरद ऋतु में, मेघ विलीन हुए क्षण भर मेँ ।
उदित हुआ वैराग्य हृदय में, तौकान्तिक सुर आए पल में ।

‘अरविन्द’ पुत्र को देकर राज, गए सहेतुक वन जिनराज ।
मंगसिर की दशमी उजियारी, परम दिगम्बर दीक्षाधारी ।

पंचमुष्टि उखाड़े केश, तन से ममन्व रहा नहीं लेश ।
नगर चक्रपुर गए पारण हित, पढ़गाहें भूपति अपराजित ।

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

प्रासुक शुद्धाहार कराये, पंचाश्चर्य देव कराये ।
कठिन तपस्या करते वन में, लीन रहैं आत्म चिन्तन में ।

कार्तिक मास द्वादशी उज्जवल, प्रभु विराज्ञे आम्र वृक्ष- तल ।
अन्तर ज्ञान ज्योति प्रगटाई, हुए केवली श्री जिनराई ।

Talking jinvani

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

देव करें उत्सव अति भव्य, समोशरण को रचना दिव्य ।
सोलह वर्ष का मौनभंग कर, सप्तभंग जिनवाणी सुखकर ।

चौदह गुणस्थान बताये, मोह – काय-योग दर्शाये ।
सत्तावन आश्रव बतलाये, इतने ही संवर गिनवाये ।

संवर हेतु समता लाओ, अनुप्रेक्षा द्वादश मन भाओ ।
हुए प्रबुद्ध सभी नर- नारी, दीक्षा व्रत धरि बहु भारी ।

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

कुम्भार्प आदि गणधर तीस, अर्द्ध लक्ष थे सकल मुनीश ।
सत्यधर्म का हुआ प्रचार, दूऱ-दूर तक हुआ विहार ।

Talking jinvani

एक माह पहले निर्वेद, सहस मुनिसंग गए सम्मेद ।
चैत्र कृष्ण एकादशी के दिन, मोक्ष गए श्री अरहनाथ जिन ।

नाटक कूट को पूजे देव, कामदेव-चक्री…जिनदेव ।
जिनवर का लक्षण था मीन, धारो जैन धर्म समीचीन ।

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

प्राणी मात्र का जैन धर्मं है, जैन धर्म ही परम धर्मं हैं ।
पंचेन्द्रियों को जीतें जो नर, जिनेन्द्रिय वे वनते जिनवर ।

त्याग धर्म की महिमा गाई, त्याग में ही सब सुख हों भाई ।
त्याग कर सकें केवल मानव, हैं सक्षम सब देव और मानव ।

हो स्वाधीन तजो तुम भाई, बन्धन में पीडा मन लाई ।
हस्तिनापुर में दूसरी नशिया, कर्म जहाँ पर नसे घातिया ।

जिनके चररणों में धरें, शीश सभी नरनाथ ।
हम सब पूजे उन्हें, कृपा करें अरहनाथ ।

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

जाप: – ॐ ह्रीं अर्हं श्री अरहनाथाय नमः

*****

Note

https://www.effectivecpmnetwork.com/s1dh10w4kk?key=b212196e3d68b5f5ef85fb67bed3c621

Jinvani.in मे दिए गए सभी श्री अरहनाथ चालीसा स्तोत्र, पुजाये और आरती जिनवाणी संग्रह के द्वारा लिखी गई है, यदि आप किसी प्रकार की त्रुटि या सुझाव देना चाहते है तो हमे Comment कर बता सकते है या फिर Swarn1508@gmail.com पर eMail के जरिए भी बता सकते है।

Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.