ॐ (औम) का जैन धर्म में अर्थ
जैन धर्म में “ॐ” (Aum) एक पवित्र ध्वनि और प्रतीक है, जो आध्यात्मिक और दार्शनिक महत्व रखता है। यह मंत्र जैन परंपराओं में गहन अर्थ लिए हुए है और इसे आत्मा की शुद्धता, आध्यात्मिक जागरूकता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ा जाता है। नीचे जैन धर्म में ॐ के अर्थ को विस्तार से समझाया गया है।
जैन धर्म में ॐ (AUM) का प्रतीकात्मक अर्थ
जैन धर्म में ॐ को पंच परमेष्ठी (पाँच सर्वोच्च आत्माओं) का प्रतीक माना जाता है। ये पंच परमेष्ठी जैन धर्म के आध्यात्मिक आदर्श हैं, जो आत्मा के उद्धार और मोक्ष के मार्ग को दर्शाते हैं। ॐ के प्रत्येक अक्षर को इन पंच परमेष्ठी से जोड़ा जाता है:
अ (A): अरिहंत (Arihant) – परमेष्ठी का प्रतिनिधित्व करता है। ‘अरि’ का अर्थ है शत्रु और ‘हंत’ का अर्थ है नष्ट करने वाला। अरिहंत वे आत्माएँ हैं जिन्होंने राग, द्वेष, मोह, काम, क्रोध जैसे **कर्म शत्रुओं** को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है। इन्हें **केवल ज्ञान** की प्राप्ति हो चुकी होती है, जिससे वे भूत, भविष्य और वर्तमान के सभी पदार्थों को एक ही समय में जान लेते हैं।
*महत्व: अरिहंत लोक में धर्मोपदेश देने वाले तीर्थंकर होते हैं। वे मोक्ष मार्ग का उपदेश देकर संसार को कल्याण का रास्ता दिखाते हैं। अरिहंत प्रभु **साकार रूप** में होते हैं और उनकी उपस्थिति जैन समुदाय के लिए प्रेरणा, ज्ञान और मार्गदर्शन का शाश्वत स्रोत है।
आ (Ā): आश्रित सिद्ध (Ashrita Siddha) – मूलतः ‘आ’ अक्षर को आश्रित सिद्ध से जोड़ा जाता है, पर व्यापक रूप से यह **सिद्ध** परमेष्ठी का प्रतीक है। सिद्ध वे आत्माएँ हैं जिन्होंने आठों प्रकार के कर्मों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है और अपने शुद्ध, अविनश्वर स्वरूप को प्राप्त कर लिया है।
* **महत्व:** सिद्ध **निराकार** और **विदेही** होते हैं। वे लोक के अग्रभाग, जिसे **सिद्धशिला** या **मोक्षधाम** कहते हैं, पर अनंत काल तक निवास करते हैं। सिद्धों की उपासना आत्मा को पूर्ण मुक्ति और परमानंद की अवस्था प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। वे स्वयं **परमात्मा** हैं, जो सिद्ध कर चुके हैं कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है।
उ (U): उपाध्याय (Upadhyaya) – यहाँ ‘उ’ या ‘आ’ अक्षर के विस्तार में कुछ मतभेद हैं, परंतु सामान्यतः यह आचार्य और उपाध्याय को सम्मिलित करता है।
उपाध्याय (Upādhyāya): ‘उ’ **उपाध्याय** परमेष्ठी का प्रतीक है। ये वे मुनि संत होते हैं जो जैन शास्त्रों (आगमों) के गहरे ज्ञानी होते हैं।
महत्व: उपाध्याय संत समुदाय को शास्त्रों का अध्ययन कराते हैं और धर्म के सही सिद्धांतों को समाज तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। वे स्वयं उच्च आध्यात्मिक अवस्था में रहते हुए भी, दूसरों को ज्ञान के प्रकाश से जोड़ने का दायित्व निभाते हैं।आचार्य (Ācārya): कुछ स्थानों पर ‘आ’ अक्षर को **आचार्य** (संघ प्रमुख) से भी जोड़ा जाता है। आचार्य मुनि संघ के प्रमुख होते हैं और वे सभी मुनियों, आर्यिकाओं और श्रावकों को मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। वे **सम्मेद चारित्र** (Right Conduct) का उत्कृष्ट पालन करते हैं और मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ते हैं।
म (M): मुनि (Muni) – ‘म’ अक्षर **मुनि** परमेष्ठी का प्रतिनिधित्व करता है। मुनि वे साधु होते हैं जिन्होंने संसार की सभी मोह-मायाओं का त्याग कर दिया है। वे पाँच **महाव्रतों** (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह) का कठोरता से पालन करते हैं।
* **महत्व:** मुनि अपना जीवन तप, संयम और आत्म-निरीक्षण (आत्म-शुद्धि) में लगाते हैं। वे आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर सक्रिय रूप से कार्यरत हैं और जैन जीवनशैली का सबसे शुद्ध रूप प्रस्तुत करते हैं। उनकी निस्वार्थ साधना समाज को त्याग और वैराग्य का सच्चा अर्थ सिखाती है।
ॐ (Om): संपूर्णता का प्रतीक – जैन जीवनशैली में ॐ का उपयोग केवल धार्मिक क्रियाकलापों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दैनिक जीवन की आध्यात्मिक साधना का आधार है।
इस प्रकार, ॐ का उच्चारण या ध्यान करना जैन धर्म में इन पाँच पवित्र आत्माओं के प्रति श्रद्धा और उनके गुणों को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।
ॐ का आध्यात्मिक महत्व
जैन धर्म में ॐ का उपयोग ध्यान, प्रार्थना और मंत्र जाप में किया जाता है। यह मंत्र आत्मा को शुद्ध करने, मन को शांत करने और आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने में सहायक माना जाता है। ॐ का उच्चारण न केवल मन को एकाग्र करता है, बल्कि यह व्यक्ति को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों – अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह – के प्रति प्रेरित करता है।
जैन परंपराओं में, ॐ को नमोकार मंत्र के साथ भी जोड़ा जाता है, जो जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र है। नमोकार मंत्र में पंच परमेष्ठी की वंदना की जाती है, और ॐ इस मंत्र की सार्वभौमिकता और पवित्रता को और गहरा करता है।
नमोकार मंत्र और ॐ का समन्वय
ॐ का आध्यात्मिक महत्व **नमोकार मंत्र** (णमोकार महामंत्र/Navkar Mantra) से भी जुड़ा हुआ है, जो जैन धर्म का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण मंत्र है। नमोकार मंत्र पंच परमेष्ठी को नमस्कार करता है:
> णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्व साहूणं॥
अक्सर, नमोकार मंत्र के जाप से पहले **”ॐ”** का उच्चारण किया जाता है। इस प्रकार, **ॐ एक बीज मंत्र** (Seed Mantra) के रूप में कार्य करता है, जो न केवल नमोकार मंत्र की पवित्रता और शक्ति को बढ़ाता है, बल्कि इसे एक सार्वभौमिक (Universal) ध्वनि से भी जोड़ता है। यह समन्वय स्पष्ट करता है कि **ॐ** संपूर्ण **जैन धर्म** के सिद्धांतों का संक्षिप्त और शक्तिशाली सार है।
ॐ का दार्शनिक अर्थ
जैन दर्शन में ॐ को विश्व की आदि ध्वनि माना जाता है, जो सृष्टि की रचना और उसकी अनंतता को दर्शाती है। यह आत्मा और विश्व के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करता है। ॐ का उच्चारण व्यक्ति को अपने भीतर की शांति और आत्मिक शक्ति से जोड़ता है, जिससे वह कर्म बंधनों से मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकता है।
जैन धर्म में ॐ का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक भी है। इसका उच्चारण शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है, जिससे तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है। यह ध्वनि व्यक्ति को ध्यान की गहरी अवस्था में ले जाती है, जो जैन धर्म में आत्म-निरीक्षण और आत्म-शुद्धि के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
जैन धर्म में ॐ एक शक्तिशाली प्रतीक और मंत्र है, जो आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व रखता है। यह पंच परमेष्ठी का प्रतीक होने के साथ-साथ आत्मा की शुद्धता और मोक्ष के मार्ग को दर्शाता है। ॐ का जाप और ध्यान जैन अनुयायियों को उनके धर्म के मूल सिद्धांतों के प्रति समर्पित रहने और आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ने में सहायता करता है।
यह एक ऐसा मंत्र है जो न केवल जैन धर्म के अनुयायियों को प्रेरित करता है, बल्कि सभी को शांति और आत्मिक जागरूकता की ओर ले जाता है। जैन धर्म में ॐ (AUM) एक बहुआयामी प्रतीक और मंत्र है, जो धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व रखता है। यह पंच परमेष्ठी का प्रतिनिधित्व करता है, जो जैन समुदाय के लिए सर्वोच्च आदर्श हैं। ॐ का जाप और ध्यान जैन अनुयायियों को आत्मिक शुद्धता, मानसिक एकाग्रता और मोक्ष की ओर बढ़ने में सहायता करता है।
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