bhagwan mahaveer swami

Bhagwan Mahaveer Swami

भगवान महावीर स्वामी: जीवन, दर्शन और मानवता को उनकी अमर देन

(Bhagwan Mahaveer Swami: Life, Philosophy and Legacy)

परिचय भारतवर्ष की पावन धरा पर अनेकों महापुरुषों ने जन्म लिया है, जिन्होंने सत्य, अहिंसा और मानवता का मार्ग प्रशस्त किया। इनमें जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (Bhagwan Mahaveer Swami) का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है।

भगवान महावीर केवल एक धार्मिक महापुरुष नहीं थे, बल्कि वे एक क्रांतिकारी समाज सुधारक और महान दार्शनिक भी थे। उन्होंने उस समय के समाज में व्याप्त हिंसा, पशु-बलि, जाति-पांति के भेदभाव और अंधविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाई। उनके द्वारा दिया गया ‘जियो और जीने दो‘ का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना ढाई हजार वर्ष पूर्व था। यह लेख भगवान महावीर के प्रेरणादायक जीवन, उनकी कठोर तपस्या और उनके कल्याणकारी उपदेशों पर एक विस्तृत दृष्टि डालता है।

1. भगवान महावीर का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Birth and Early Life)

भगवान महावीर का जन्म ईसा से लगभग 540 वर्ष पूर्व (540 BC) चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन हुआ था। उस समय भारत में लिच्छवी गणराज्य का बोलबाला था और वैशाली दुनिया का पहला गणतंत्र माना जाता था। इसी वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डग्राम में राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला (जिन्हें विदेहदत्ता भी कहा जाता है) के यहाँ एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया।

जैन ग्रंथों के अनुसार, उनके जन्म से पूर्व माता त्रिशला ने 14 मंगल स्वप्न देखे थे, जो यह संकेत दे रहे थे कि उनका पुत्र एक महान चक्रवर्ती सम्राट या एक महान तीर्थंकर बनेगा। उनके जन्म के बाद राज्य में धन-धान्य और वैभव की अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिसके कारण उनका नाम ‘वर्धमान’ (Vardhaman) रखा गया।

वर्धमान बचपन से ही अत्यंत साहसी, निर्भीक और दयालु स्वभाव के थे। कहा जाता है कि एक बार उन्होंने खेल-खेल में एक मदमस्त हाथी को वश में कर लिया था और एक भयानक सर्प को बिना चोट पहुँचाए हटा दिया था। उनके इसी अदम्य साहस को देखकर उनका नाम ‘महावीर’ पड़ा। वे इक्ष्वाकु वंश के क्षत्रिय थे और उनका गोत्र कश्यप था।

युवावस्था में उनका विवाह यशोदा नामक सुकन्या से हुआ, जो कुण्डिय गोत्र की थीं। उनसे उन्हें एक पुत्री की प्राप्ति हुई, जिसका नाम अनोज्जा (या प्रियदर्शना) रखा गया। बाद में प्रियदर्शना का विवाह जामालि से हुआ, जो आगे चलकर भगवान महावीर के प्रथम शिष्य बने। यद्यपि महावीर स्वामी का जीवन राजसी सुख-सुविधाओं से भरा था, फिर भी उनका मन संसार के भोग-विलास में कभी नहीं रमा। वे सदैव आत्म-चिंतन और सत्य की खोज में लीन रहते थे।

2. वैराग्य और गृहत्याग (Renunciation)

वर्धमान महावीर के मन में संसार से विरक्ति के भाव बचपन से ही थे, लेकिन उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा को सर्वोपरि माना। जब वे लगभग 28 वर्ष के थे, तब उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। इसके बाद उनके मन में वैराग्य की भावना और तीव्र हो गई।

उन्होंने संन्यास लेने का निर्णय किया, परन्तु उनके बड़े भाई नन्दीवर्धन ने उनसे अनुरोध किया कि माता-पिता के वियोग के तुरंत बाद उनके जाने से परिवार को गहरा आघात लगेगा। भाई की आज्ञा और स्नेह का मान रखते हुए महावीर स्वामी ने दो वर्ष और घर में व्यतीत किए।

अंततः 30 वर्ष की आयु में, सत्य और मोक्ष की खोज के लिए उन्होंने राज-पाट, पत्नी, बच्चे और समस्त वैभव का त्याग कर दिया। उन्होंने ‘अशोक वृक्ष’ के नीचे अपने राजसी वस्त्रों और आभूषणों का त्याग किया और ‘केशलोच’ (अपने हाथों से बालों को उखाड़ना) कर दिगंबर साधु का कठिन मार्ग अपनाया। यह घटना ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहलाती है।

3. कठोर तपस्या और साधना (Penance and Meditation)

गृहत्याग के पश्चात भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्षों तक घोर तपस्या की। यह समय उनके जीवन का सबसे कठिन काल था। उन्होंने सर्दी, गर्मी, बारिश, भूख और प्यास की परवाह किए बिना अपनी साधना जारी रखी। जैन ग्रंथों में उल्लेख है कि इस दौरान उन्हें अनेक उपसर्गों (कष्टों) का सामना करना पड़ा। कभी दुष्ट व्यक्तियों ने उन्हें प्रताड़ित किया, तो कभी जानवरों ने उन पर हमले किए, लेकिन महावीर सुमेरु पर्वत की भांति अडिग रहे।

अपनी साधना के दौरान उन्होंने मौन व्रत धारण किया और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त की। उन्होंने अधिकांश समय ध्यान में बिताया। शुरुआत में उन्होंने 13 महीने तक वस्त्र धारण किए, लेकिन बाद में स्वर्णवालूका नदी के तट पर उन्होंने वह भी त्याग दिए और पूर्णतः दिगंबर (दिशाओं को ही अपना वस्त्र मानने वाले) अवस्था में रहने लगे। उनकी यह अवस्था अपरिग्रह की पराकाष्ठा थी।

4. कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति (Attainment of Kevalgyan)

दीर्घकालीन कठोर तपस्या के बाद, 42 वर्ष की आयु में उन्हें वैशाख शुक्ल दशमी के दिन जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे ‘कैवल्य ज्ञान’ (Omniscience) की प्राप्ति हुई। यह ज्ञान का सर्वोच्च स्तर है, जहाँ आत्मा को सम्पूर्ण ब्रह्मांड के भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान हो जाता है।

ज्ञान प्राप्ति के बाद वे ‘जिन’ (विजेता), ‘अर्हत’ (पूज्य), ‘निर्गन्थ’ (बंधन रहित) और ‘महावीर’ कहलाए। उन्होंने अपनी इंद्रियों और कर्मों को जीत लिया था, इसलिए वे ‘जिनेन्द्र’ कहलाए और उनके अनुयायी ‘जैन’ कहलाए।

5. भगवान महावीर के पंचशील सिद्धांत (The Five Vows)

भगवान महावीर का दर्शन अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक था। उन्होंने मोक्ष प्राप्ति और सुखी जीवन के लिए पाँच महाव्रतों (Panch Mahavratas) का उपदेश दिया। मजे की बात यह है कि इनमें से पहले चार व्रत (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह) 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ द्वारा पहले ही दिए गए थे। भगवान महावीर ने इसमें पाँचवां व्रत ‘ब्रह्मचर्य’ जोड़कर इसे पूर्णता प्रदान की।

ये पांच सिद्धांत निम्नलिखित हैं:

  1. अहिंसा (Non-Violence): यह जैन धर्म का मूल मंत्र है—“अहिंसा परमो धर्मः”। महावीर स्वामी के अनुसार, अहिंसा केवल किसी को न मारने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना ही सच्ची अहिंसा है। उन्होंने सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की रक्षा करने का भी उपदेश दिया।

  2. सत्य (Truth): मनुष्य को सदैव सत्य बोलना चाहिए। क्रोध, लोभ, भय या हंसी-मजाक में भी झूठ नहीं बोलना चाहिए। सत्य ही ईश्वर है और सत्य के मार्ग पर चलकर ही मोक्ष संभव है।

  3. अस्तेय (Non-Stealing): अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। किसी की वस्तु को उसकी आज्ञा के बिना ग्रहण करना, यहाँ तक कि रास्ते में पड़ी हुई वस्तु को उठाना भी चोरी माना गया है। यह वृत्ति मनुष्य को ईमानदार बनाती है।

  4. अपरिग्रह (Non-Possessiveness): आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना अपरिग्रह है। महावीर स्वामी का मानना था कि परिग्रह (संग्रह) ही आसक्ति और दुखों का मूल कारण है। धन, संपत्ति और वस्तुओं के प्रति मोह का त्याग ही सच्ची मुक्ति है।

  5. ब्रह्मचर्य (Celibacy): यह व्रत भगवान महावीर की विशेष देन है। उन्होंने इन्द्रिय संयम को सर्वोच्च तप बताया। ब्रह्मचर्य का पालन करने से आत्मबल बढ़ता है और चित्त एकाग्र होता है।

महावीर स्वामी का जीवन परिचय
जन्म – 540 ई. पू., चैत्र शुक्ल त्रयोदशी
जन्मस्थान – वैशाली के निकट कुण्डग्राम
मृत्यु – 468 ई. पू. (72 वर्ष), कार्तिक अमावस्या
मोक्ष स्थान – पावापुरी (बिहार)
बचपन का नाम – वर्धमान
अन्य नाम – वीर, अतिवीर, सन्मति, निकंठनाथपुत्त (भगवान बुद्ध), विदेह, वैशालियें
जाति – ज्ञातृक क्षत्रिय
वंश – इक्ष्वाकु वंश
राशि – कश्यप
पिता – सिद्धार्थ
माता – त्रिशला/विदेहदत्ता
भाई – नंदीवर्धन
बहन – सुदर्शना
पत्नी – यशोदा (कुण्डिय गोत्र की कन्या)
पुत्री – अणोज्जा/प्रियदर्शना
दामाद – जामालि (प्रथम शिष्य – प्रथम विद्रोही)
गृहत्याग – 30 वर्ष की आयु में
ज्ञान प्राप्ति की अवस्था – 42 वर्ष (12 वर्ष बाद)
ज्ञान प्राप्ति – जृम्भिकग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के किनारे साल के वृक्ष के नीचे
ज्ञान प्राप्ति के बाद इनके नाम – जिन, अर्हत, महावीर, निर्गन्थ, केवलिन।
प्रथम उपदेश – राजगृह के समीप विपुलांचल पर्वत में बराकर नदी के किनारे
प्रथम वर्षावास – अस्तिका ग्राम में
अन्तिम वर्षावास – पावापुरी
प्रतीक चिह्न – सिंह

6. अनेकांतवाद और स्याद्वाद (Anekantavada and Syadvada)

भगवान महावीर ने वैचारिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता का एक अद्भुत सिद्धांत दिया जिसे ‘अनेकांतवाद’ कहते हैं। इसका अर्थ है कि सत्य को देखने के अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं। कोई भी विचार पूर्णतः सही या गलत नहीं होता, वह किसी एक अपेक्षा से सही हो सकता है। इसे समझाने के लिए उन्होंने ‘स्याद्वाद’ (शायद या सापेक्षता का सिद्धांत) का प्रयोग किया। यह सिद्धांत आज के दौर में धार्मिक और वैचारिक कट्टरता को समाप्त करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

7. धर्म संघ और गणधर (Sangha and Ganadharas)

कैवल्य ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने राजगृह के विपुलांचल पर्वत पर अपना प्रथम उपदेश दिया। उनके उपदेश की भाषा ‘अर्धमागधी’ (प्राकृत) थी, जो उस समय जनसाधारण की भाषा थी। इससे उनका संदेश आम लोगों तक आसानी से पहुँचा।

उनके संघ में 11 प्रमुख शिष्य थे जिन्हें ‘गणधर’ कहा जाता है। ये सभी प्रकांड विद्वान ब्राह्मण थे जिन्होंने महावीर के तर्कों से प्रभावित होकर उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। इनके नाम हैं:

  • इंद्रभूति गौतम (सबसे प्रमुख)
  • अग्निभूमि
  • वायुभूमि
  • व्यक्त
  • सुधर्मण
  • मंडिकपुत्र
  • मौर्यपुत्र
  • अकंपित
  • अचलभ्राता
  • मेतार्य
  • प्रभास

इन गणधरों ने ही भगवान महावीर के ज्ञान को सूत्रों में पिरोकर आगे बढ़ाया। इन्द्रभूति गौतम और सुधर्मण स्वामी का नाम जैन परंपरा में विशेष आदर से लिया जाता है।

8. निर्वाण (Moksha)

30 वर्षों तक जन-जन में सत्य और अहिंसा का प्रचार करने के बाद, 72 वर्ष की आयु में ईसा पूर्व 468 में कार्तिक अमावस्या (दीपावली) के दिन बिहार के पावापुरी में भगवान महावीर को निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति हुई। जैन धर्म में दीपावली का त्यौहार भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में ही मनाया जाता है। पावापुरी का जल मंदिर आज भी उनका पवित्र निर्वाण स्थल है।

9. भगवान महावीर की आज के युग में प्रासंगिकता (Relevance in Modern World)

आज जब विश्व आतंकवाद, हिंसा, ग्लोबल वार्मिंग और मानसिक तनाव से जूझ रहा है, भगवान महावीर के उपदेश संजीवनी बूटी के समान हैं।

  • पर्यावरण संरक्षण: उनका अहिंसा और संयम का सिद्धांत पर्यावरण रक्षा का आधार है। वनस्पति और जल में भी जीव मानने का उनका सिद्धांत हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाता है।

  • विश्व शांति: ‘अनेकांतवाद’ हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करना सिखाता है, जो युद्ध और संघर्ष को रोकने का एकमात्र उपाय है।

  • शाकाहार: आज वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य और पृथ्वी दोनों के लिए लाभकारी है, जिसका प्रचार महावीर स्वामी ने सदियों पहले किया था।

भगवान महावीर के उपदेश

महावीर स्वामी (Mahaveer Swami) ने इन पंचशील सिद्धातों को अपनाने वालों को सच्चा जैन अनुयायी कहा है।

1. अहिंसा – अपने मन, वचन तथा कर्म से हिंसा नहीं करनी चाहिए। जैन धर्म को मानने वाले सभी अनुयायियों के लिए अहिंसा को मानना अनिवार्य था। महावीर स्वामी का सबसे बङा सिद्धांत अहिंसा का है। इनके समस्त दर्शन, चरित्र तथा आचार-विचार सभी अहिंसा के सिद्धांत हैं। इन्होंने बताया कि – ’’अहिंसा ही परम धर्म है।’’ अहिंसा ही परम ब्रह्म है, अहिंसा ही सुख-शांति देने वाली है। यह मनुष्य का सच्चा कर्म है।

2. सत्य – महावीर स्वामी ने बताया कि मनुष्य को हमेशा सत्य वचन बोलना चाहिए। उनका कहना था कि सत्य वचन बोलने वाले व्यक्ति को ही मोक्ष तथा मुक्ति की प्राप्ति होती है, जो जीवन का सबसे बङा लक्ष्य है।

3. अस्तेय – भगवान महावीर ने बताया है कि व्यक्ति को कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिए। चोरी करना एक पाप तथा अपराध है और कोई भी मनुष्य पापी तथा अपराधी बनकर मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता है।

4. अपरिग्रह – महावीर स्वामी ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि यदि कोई व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति चाहता है, वह सदा के लिए ईश्वर में मिल जाना चाहता है, तो उसे अपने धन का संचय नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब तक हमारे पास धन रहता हैं, हमारी लालच तथा इच्छाओं का लोप नहीं होता हैं तथा लालची व्यक्ति को कभी भी मुक्ति नहीं मिलती है। उनका कहना था कि जितना धन हम स्वयं के लिए खर्च करते हैं, उससे हमारी इच्छाएं और प्रबल होती है, इसलिए धन का संचय न करें। सम्पत्ति से मोह व आसक्ति उत्पन्न होती है।

5. ब्रह्मचर्य – जैन भिक्षुओं को अपने जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना पङता था। अपनी इन्द्रियों को वश में करना। ब्रह्मचर्य के अंतर्गत किसी नारी से वार्तालाप, उसे देखना, उससे संसर्ग का ध्यान करने की भी मनाही थी। इन पाँच व्रतों में ऊपर के चार पार्श्वनाथ ने दिये थे, जबकि पाँचवाँ व्रत ब्रह्मचर्य महावीर स्वामी ने जोङा।

इस प्रकार भगवान महावीर ने अपने ये सारे उपदेश दिए, जो जैन धर्म को मानने वाले सभी साधु, श्रविक, श्राविका, अनुयायी आदि सभी के लिए मानना तथा उसका पालन करना अनिवार्य था।

निष्कर्ष भगवान महावीर स्वामी का जीवन त्याग और तपस्या की एक ऐसी गाथा है जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी। उन्होंने न केवल मोक्ष का मार्ग दिखाया, बल्कि समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना की। उनका यह संदेश कि “आत्मा ही परमात्मा है” (Appa So Paramappa), मनुष्य को अपनी अनंत शक्तियों को पहचानने की प्रेरणा देता है। हमें उनके बताए अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

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Note

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