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Symbol Jainism: जैन धर्म का प्रतीक

जैन धर्म क्या है? इतिहास और तीर्थंकर

जैन धर्म की शुरुआत किसी एक व्यक्ति द्वारा नहीं हुई, बल्कि यह एक शाश्वत सत्य (सनातन धर्म) पर आधारित है, जिसे समय-समय पर **तीर्थंकरों** द्वारा प्रकट किया जाता है। ‘तीर्थंकर’ शब्द का अर्थ है ‘तीर्थ’ यानी घाट या पुल बनाने वाला, जो संसार रूपी सागर को पार करने का मार्ग दिखाता है।

जैन परम्परा मानती है कि इस कालचक्र में 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिन्होंने ज्ञान प्राप्त किया और फिर अपने ज्ञान को दूसरों के साथ साझा किया। इनमें पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) थे, और 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर (वर्धमान) थे, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में हुए थे। भगवान महावीर के उपदेशों ने जैन धर्म को एक संगठित और व्यापक रूप दिया, जिसके कारण उन्हें अक्सर इस युग के धर्म का संस्थापक मान लिया जाता है, जबकि जैन दर्शन उन्हें केवल ज्ञान के पुनर्स्थापक के रूप में देखता है।

जैन धर्म का इतिहास बताता है कि इसकी शिक्षाएं वेदों से भी पुरानी हैं, और यह भारतीय संस्कृति की एक मूलभूत धारा रही है। जैन धर्म अपने अनुयायियों को ‘जिन’ (विजेता) बनने का मार्ग सिखाता है – वह जिसने अपनी आंतरिक इच्छाओं, क्रोध, लोभ और अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली हो।

अहिंसा प्रतीक: जैन धर्म में अहिंसा के महान सिद्धांत का चिह्न

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जैन धर्म भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं में से एक है, जो अपनी गहन शिक्षाओं और सिद्धांतों के लिए प्रसिद्ध है। इन सिद्धांतों में अहिंसा सबसे महत्वपूर्ण है। जैन धर्म में अहिंसा केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि जीवन जीने की मुख्य राह है। इस राह को दर्शाने के लिए जैन धर्म में एक विशेष प्रतीक अपनाया गया है, जिसे अहिंसा का प्रतीक कहते हैं।

अहिंसा प्रतीक क्या है?

Jain symbol Swatika

Ahimsa Symbol Jainism अहिंसा प्रतीक में एक खुली हथेली दिखाई देती है, जिसके बीच में एक चक्र अंकित होता है और चक्र के अंदर “अहिंसा” शब्द लिखा रहता है। इस चिह्न में हथेली अभय देने वाली मुद्रा में है, जो हमें निर्भयता, करुणा और प्रेम से जीना सिखाती है।

चक्र के 24 आरे भगवान महावीर समेत 24 तीर्थंकरों के आदर्श जीवन से जुड़े हैं। इस चक्र के अंदर लिखा “अहिंसा” शब्द हमें बताता है कि हमें विचार, वाणी और कर्म से किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।

अहिंसा प्रतीक का गहरा अर्थ

अहिंसा प्रतीक केवल एक चित्र नहीं है, बल्कि जैन धर्म के गहरे दर्शन से जुड़ा एक संदेश है:

  • अभय मुद्रा वाली हथेली – प्रत्येक प्राणी के प्रति करुणा, मैत्री और सहअस्तित्व का प्रतीक।

  • चक्र के 24 आरे – 24 तीर्थंकरों के मार्गदर्शन की याद दिलाते हैं, ताकि हम उनके उपदेश के अनुसार चलें।

  • अहिंसा शब्द – हमें जीवन के हर पहलू में अहिंसा अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

जैन धर्म में अहिंसा क्यों महत्वपूर्ण है?

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भगवान महावीर ने कहा था, “अहिंसा परमोधर्म:” यानी अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। जैन धर्म में प्रत्येक जीव को आत्मा रूप में देखा जाता है, जिसमें अनंत ज्ञान, दर्शन, चारित्र और ऊर्जा होती है। इसीलिए, किसी प्राणी को नुकसान पहुँचाना अपनी ही आत्मा पर प्रहार करने जैसा है।

जैन साधना में अहिंसा के नियम सख्ती से पालन किए जाते हैं — साधु-मुनि पानी छानते हैं, रास्ते में झाड़ू से सफाई करते हैं, ताकि किसी सूक्ष्म जीव को भी हानि न पहुंचे।

आज के समय में अहिंसा प्रतीक की प्रासंगिकता

अहिंसा प्रतीक आज केवल जैन धर्म में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में शांति और अहिंसक विचारधारा के रूप में पहचाना जाता है। आधुनिक समाज में जब हिंसा, आतंकवाद, अन्याय और पर्यावरण क्षरण जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं, तब अहिंसा प्रतीक हमें एक शांतिपूर्ण भविष्य का मार्ग दिखाता है।

अहिंसा केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय स्तर पर बदलाव लाने में सहायक है।

अहिंसा प्रतीक से मिलने वाली शिक्षा

अहिंसा प्रतीक हमें सिखाता है कि हिंसा केवल शारीरिक हानि नहीं है — बल्कि नकारात्मक विचार, अपशब्द, ईर्ष्या, क्रोध और लोभ भी हिंसा के ही रूप हैं। इस प्रतीक के संदेश को अपनाकर हम अपने हृदय में करुणा, सहिष्णुता, क्षमा, प्रेम और परोपकार के बीज बो सकते हैं।

उपसंहार

अहिंसा प्रतीक जैन धर्म की अमूल्य विरासत है, जो हमें प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान और दया से व्यवहार करने की सीख देता है। आज के युग में इस संदेश को जीवन में उतारना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है। अहिंसा के इस मार्ग पर चलकर हम न केवल स्वयं को, बल्कि इस सुंदर पृथ्वी को भी खुशहाल, शांतिपूर्ण और करुणामय बना सकते हैं।

जैन धर्म के सिद्धांत एक नैतिक संरचना पर टिके हुए हैं, जिसे ‘पंच महाव्रत’ (Five Great Vows) कहा जाता है। ये व्रत गृहस्थों (अणुव्रत) के लिए कुछ लचीले होते हैं, लेकिन साधु-साध्वियों के लिए इनका पालन अत्यंत कठोर होता है। ये पाँच महाव्रत न केवल आत्म-नियंत्रण सिखाते हैं, बल्कि एक समतावादी और न्यायपूर्ण समाज की नींव भी रखते हैं।

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Note

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