मोह जाल में फंसे हुए हैं, कर्मो ने आ घेरा… Jain Bhajan

Abhinandannath

“मोह जाल में फंसे हुए हैं, कर्मों ने आ घेरा” Jain Bhajan एक अत्यंत मार्मिक और आत्म-जागृति से भरा हुआ जैन भजन है, जो जीव की वर्तमान स्थिति का सजीव चित्रण करता है। इस भजन के माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि वह संसार के आकर्षणों, इच्छाओं और कर्मों की जंजीरों में जकड़ा हुआ है, और अब वह प्रभु से मोक्ष का मार्ग मांग रहा है।

भजन की पंक्तियाँ आत्मा की उस पुकार को व्यक्त करती हैं, जहाँ वह संसार की असारता को समझकर सच्चे शरण की तलाश करती है। मोह, माया, क्रोध, लोभ, और राग-द्वेष — ये सब उस जाल का हिस्सा हैं जिसमें जीव अनंतकाल से उलझा हुआ है। और अब वह जाग चुका है, प्रभु से मार्गदर्शन चाहता है, ताकि वह इस बंधन से मुक्त होकर शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सके।

यह भजन सुनने और गाने वाले को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करता है और जैन धर्म के मूल संदेश — “अपना कल्याण स्वयं करो” — की ओर उन्मुख करता है।

Bhajan

मोह जाल में फँसे हुये हैं कर्मों ने आ घेरा,

कैसे तिरेंगे भव-सागर से, तुम बिन कौन है मेरा।

भूल हुई क्या हमसे भगवन क्या है दोष हमारा,

लिखा विधाता ने किन घड़ियों ऐसा लेख हमारा।।

लेख लिखा था शुभ घड़ियों में, शुभ घड़ियां हैं आई।

आत्मज्ञान की ज्योति जगा दो भव से पार उतरता है।।

मोह जाल में…

पहले ऋषभनाथ जिन बंदों, दूसरे अजितनाथ देवजी।

तीसरे संभवनाथ जिन बंदों, चौथे अभिनंद देवजी॥

पाचवें सुमतीनाथ जिन बंदों, छठवें पद्मप्रभु देवजी।

सातवें सुपार्श्वनाथ जिन बंदों, आठवें चंद्रदेवजी ।।

मोह जाल में…

नववें पुष्पदंत जिन बंदों, दसवें शीतलनाथ देवजी।

ग्यारवें श्रेयांसनाथ जिन बंदों, बारहवें वासुपूज्य देवजी।।

तेरहवें विमलनाथ जिन बंदों, चौदहवें अनंतनाथ देवजी।

पंद्रहवें धर्मनाथ जिन बंदों, सोलहवें शांतिनाथ देवजी।। 

मोह जाल में…

सतरहवें कुंथूनाथ जिन बंदों, अठारहवें अरहनाथ देवजी।

उन्नीसवें मल्लिनाथ जिन बंदों, बीसवें मुनिसुव्रत देवजी।।

इक्किसवें नमिनाथ जिन बंदों, बाइसवें नेमिनाथ देवजी। 

तेइसवें पार्श्वनाथ जिन बंदों, चोबिसवें महावीर देवजी।। 

मोह जाल में…

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Note

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Swarn Jain

My name is Swarn Jain, A blog scientist by the mind and a passionate blogger by heart ❤️, who integrates my faith into my work. As a follower of Jainism, I see my work as an opportunity to serve others and spread the message of Jainism.

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